सोमवार, नवंबर 21, 2011

पत्नी चाहे छूट जाये सिगरेट नहीं छूट सकती

ये दोनों यात्राएं समान नहीं हैं । क्योंकि ऊपर जाने में तुम्हें बदलना पड़ेगा । क्योंकि ऊपर जाना है । तो ऊपर जाने के योग्य होना पड़ेगा । प्रतिपल तुम्हारे चेतना के तल को ऊपर उठना पड़ेगा । तभी तुम सीढ़ी पार कर सकोगे । नीचे गिरने में तो कुछ भी नहीं करना पड़ता ।
मुल्ला नसरुद्दीन अपने बेटों के लिए एक साइकिल खरीद लाया था । दो बेटे । तो उसने कहा कि दोनों आधा आधा साइकिल से खेलना । कोई झगड़ा खड़ा न हो । एक दिन उसने देखा कि बड़ा बेटा बारबार ऊपर टेकरी पर जाता है । और वहां से साइकिल पर बैठकर नीचे आता है । कई बार उसे टेकरी से साइकिल पर बैठे हुए देखा । तो उसने बुलाकर कहा कि मैंने कहा था । छोटे बेटे को भी आधा आधा । उसने कहा । आधा ही आधा कर रहे हैं । छोटा बेटा ऊपर की तरफ ले जाता है साइकिल । हम ऊपर से नीचे की तरफ लाते हैं । आधा आधा । अब पहाड़ी पर साइकिल को ले जाना । चढ़ने का तो सवाल ही नहीं । किसी तरह हांफता हुआ छोटा बेटा ऊपर तक पहुंचा देता है । और बड़ा बेटा उस पर बैठकर नीचे की यात्रा कर लेता है । समान नहीं है । आधी आधी नहीं है यात्रा । नीचे की यात्रा यात्रा ही नहीं है । गिरना है । पतन है । तुम जहां थे । वहां से भी नीचे उतरना है ।
तो जो व्यक्ति प्रेम को ईर्ष्या । आधिपत्य । पजेशन बना लेगा । वह जल्दी ही पाएगा । प्रेम तो खो गया  आग तो खो गई । प्रेम की आंखों को अंधा करने वाला धुआं छूट गया है । घाटी के अंधकार में जीने लगा । पहाड़ की ऊंचाई तो खो गई । और पहाड़ की ऊंचाई से दिखने वाले सूर्योदय सूर्यास्त सब खो गए । अंधी घाटी है । और रोज अंधी होती चली जाती है । तुम्हारे भीतर का पशु प्रकट हो जाता है । सरलता से । उसके लिए कोई साधना नहीं करनी पड़ती । जिसको प्रेम को ऊपर ले जाना है । उसे प्रेम को तो वैसे ही साधना होगा । जैसे कोई योग को साधता है । क्योंकि दोनों ऊपर जा रहे हैं । तब साधना शुरू हो जाती है । प्रेम तप है ।  जैसे कोई तप को साधता है । वैसे ही प्रेम की तपश्चर्या है । और तप इतना बड़ा तप नहीं है । क्योंकि तुम अकेले होते हो । प्रेम और भी बड़ा तप है । क्योंकि एक दूसरा व्यक्ति भी साथ होता है । तुम्हें अकेले ही ऊपर नहीं जाना है । एक दूसरे व्यक्ति को भी हाथ का सहारा देना है । ऊपर ले जाना है । कई बार दूसरा बोझिल मालूम पड़ेगा । कई बार दूसरा ऊपर जाने को आतुर न होगा । इनकार करेगा । कई बार दूसरा नीचे उतर जाने की आकांक्षा करेगा । लेकिन अगर हृदय में प्रेम है । तो तुम दूसरे को भी सहारा दोगे ।  सम्हालोगे । उसे नीचे न गिरने दोगे । तुम्हारा हाथ करुणा न खोएगा । तुम्हारा प्रेम जल्दी ही क्रोध में न बदलेगा । कई बार तुम्हें धीमे भी चलना पड़ेगा । क्योंकि दूसरा साथ चल रहा है । तुम दौड़ न सकोगे । इसलिए मैं कहता हूं  । तप इतना बड़ा तप नहीं है । क्योंकि तप में तो तुम अकेले हो । जब चाहो । दौड़ सकते हो । प्रेम और भी बड़ा तप है ।
लेकिन प्रेम के द्वार पर तो । तुम ऐसे पहुंच जाते हो । जैसे तुम तैयार ही हो । यहीं भूल हो जाती है । दुनिया में हर आदमी को यह खयाल है कि प्रेम करने के योग्य तो वह है ही । यहीं भूल हो जाती है । और सब तो तुम सीखते हो । छोटी छोटी चीजों को सीखने में बड़े जीवन का समय गंवाते हो । प्रेम को तुमने कभी सीखा ? प्रेम को कभी तुमने सोचा ? प्रेम को कभी तुमने ध्यान दिया ? प्रेम क्या है ? तुम ऐसा मान कर बैठे हो कि जैसे प्रेम को तुम जानते ही हो । तुम्हारी ऐसी मान्यता तुम्हें नीचे उतार देगी । तुम्हें नरक की तरफ ले जाएगी । प्रेम सबसे बड़ी कला है । उससे बड़ा कोई ज्ञान नहीं है । सब ज्ञान उससे छोटे हैं । क्योंकि और सब ज्ञान से तो तुम जान सकते हो । बाहर बाहर से । प्रेम में ही तुम अंतर्गृह में प्रवेश करते हो । और परमात्मा अगर कहीं छिपा है । तो परिधि पर नहीं । केंद्र में छिपा है ।
और एक बार जब तुम । एक व्यक्ति के अंतर्गृह में । प्रवेश कर जाते हो । तो तुम्हारे हाथ में कला आ जाती है । वही कला सारे अस्तित्व के अंतर्गृह में प्रवेश करने के काम आती है । तुमने अगर एक को प्रेम करना सीख  लिया । तो तुम उस एक के द्वारा प्रेम करने की कला सीख गए । वही तुम्हें एक दिन परमात्मा तक पहुंचा देगी ।
इसलिए मैं कहता हूं कि प्रेम मंदिर है । लेकिन तैयार मंदिर नहीं है । एक एक कदम तुम्हें तैयार करना पड़ेगा । रास्ता पहले से पटा पटाया तैयार नहीं है । कोई राजपथ है नहीं कि तुम चल जाओ । चलोगे एक एक कदम । और चल चलकर रास्ता बनेगा । पगडंडी जैसा । खुद ही बनाओगे । खुद ही चलोगे । इसलिए मैं प्रेम के विरोध में नहीं हूं । मैं प्रेम के पक्ष में हूं । और तुमसे मैं कहना चाहूंगा कि अगर प्रेम ने तुम्हें दुख में उतार दिया हो । तो अपनी भूल स्वीकार करना । प्रेम की नहीं । क्योंकि बड़ा खतरा है । अगर तुमने प्रेम की भूल स्वीकार कर ली । तो यह मैं जानता हूं कि तुम साधु संतों की बातों में पड़कर छोड़ दे सकते हो । प्रेम का मार्ग । क्योंकि वहां तुमने दुख पाया है । तुम थोड़े सुखी भी हो जाओगे । लेकिन आनंद की वर्षा तुम पर फिर कभी न हो पाएगी । कैसे तुम चढ़ोगे ? तुम सीढ़ी ही छोड़ आए । गिरने के डर से तुम सीढ़ी से ही उतर आए । चढ़ोगे कैसे ? गिरोगे नहीं । यह तो पक्का है ।
जिसको हम सांसारिक कहते हैं । गृहस्थ कहते हैं । वह गिरता है सीढ़ी से । जिसको हम संन्यासी कहते हैं । पुरानी परंपरा धारणा से । वह सीढ़ी छोड़कर भाग गया । मैं उसको संन्यासी कहता हूं । जिसने सीढ़ी को नहीं छोड़ा । अपने को बदलना शुरू किया । और जिसने प्रेम से ही । प्रेम की घाटी से ही । धीरे धीरे प्रेम के शिखर की तरफ यात्रा शुरू की ।
कठिन है । जीवन की संपदा मुफ्त नहीं मिलती । कुछ चुकाना पड़ेगा । अपने से ही पूरा चुकाना पड़ेगा ।  अपने को ही दांव पर लगाना पड़ेगा । और प्रेम जितनी कसौटी मांगता है । कोई चीज कसौटी नहीं मांगती । इसलिए कमजोर भाग जाते हैं । और भाग कर कोई कहीं नहीं पहुंचता । प्रेम के द्वार से गुजरना ही होगा । हां । उसके पार जाना है । वहीं रुक नहीं जाना है । वह सिर्फ द्वार है । जापान में एक मंदिर है । वैसे ही सब मंदिर होने चाहिए । वह मंदिर सिर्फ एक द्वार है । उसमें कोई दीवाल नहीं है । और भीतर कुछ भी नहीं है  । सिर्फ एक द्वार है ।
मंदिर एक द्वार है । किसी अज्ञात लोक की तरफ खुलता है । अतीत पीछे छूट जाता है । भविष्य की तरफ खुलता है ।  समय पीछे छूट जाता है । कालातीत की तरफ खुलता है । क्षुद्र । क्षण भंगुर पीछे छूट जाता है ।  शाश्वत के प्रति खुलता है । लेकिन सिर्फ एक द्वार है । जो मंदिर में रुक गया । वह नासमझ है । मंदिर कोई रुकने की जगह नहीं । पड़ाव कर लेना । रात भर के लिए विश्राम कर लेना । लेकिन सुबह यात्रा पर निकल जाना है ।
प्रेम को कैसे मंदिर बनाओगे ? आधिपत्य मत करना । जिससे प्रेम करो । जिससे प्रेम करो । उस प्रेम के आसपास ईष्या को खड़े मत होने देना । जिसको प्रेम करो । उससे अपेक्षा मत करना । कुछ  दे सको । देना मांगना मत । और तुम पाओगे । प्रेम रोज गहरा होता है । रोज ऊपर उठता है । और तुम पाओगे कि धीरे धीरे धीरे धीरे नये पंख उगने लगे । तुम्हारे जीवन में । चेतना नयी यात्रा पर जाने के लिए समर्थ होने लगी । लेकिन इन भूलों के प्रति सजग रहना । ये भूलें बिलकुल सामान्य हैं । और तुम प्रेम में पड़ते भी नहीं कि ये भूलें शुरू हो जाती हैं । तुम अपेक्षा शुरू कर देते हो । जहां अपेक्षा की । वहां सौदा शुरू हो गया । प्रेम न रहा ।
तुम जिसको प्रेम करो । उसे स्वयं होने की पूरी स्वतंत्रता देना । कई बार मौके होंगे । बहुत सी बातें होंगी । जो तुम न चाहोगे । लेकिन तुम्हारी चाह का सवाल क्या है ? दूसरा व्यक्ति पूरा व्यक्ति है । अपनी निजता में । तुम हो कौन ? वह जैसा है । तुम उसे प्रेम करने के अधिकारी हो । लेकिन तुम उसे काट छांट मत करना । तुम यह मत कहना कि तू ऐसा हो जा । तब हम तुझे प्रेम करेंगे । एक महिला मेरे पास आती है । प्रेम विवाह किया था । लेकिन एक छोटी सी बात पर । सब नष्ट हो गया कि पति सिगरेट पीते हैं । वह यह बरदाश्त नहीं कर सकती । उनके मुंह से बास आती है । रात उनके साथ सो नहीं सकती ।  दूसरे कमरे में पति सोते हैं । बीस साल इस छोटी सी बात की कलह में बीत गए हैं कि पति पर जिद है कि वह सिगरेट छोड़े । पति की भी जिद है कि पत्नी चाहे छूट जाए । सिगरेट नहीं छूट सकती । और दोनों प्रेम में थे । और मां बाप के विरोध में शादी की थी । शादी बड़ी मुश्किल थी । दोनों अलग अलग जाति के हैं । अलग धर्मों के हैं । दोनों के परिवार विरोध में थे । सब दांव पर लगाकर शादी की थी । और सब दांव सिगरेट पर लग गया । मैंने उन्हें कहा । तुम कभी यह भी तो सोचो कि तुमने किस छोटी सी बात के लिए सब खो दिया है । लेकिन अहंकार प्रबल है । और पत्नी कहती है कि मैं अपनी शर्त से नीचे उतरने को राजी नहीं हूं । बीस साल गए । और जिंदगी चली जाएगी ।
लेकिन जब तुम किसी एक व्यक्ति को प्रेम करते हो । समझ लो । उसे पायरिया हो जाए । तो क्या करोगे ? उसके मुंह से थोड़ी बास आने लगे । तो क्या करोगे ? क्या प्रेम इतना छोटा है कि उतनी सी बास न झेल सकेगा ? समझो कि कल वह आदमी बीमार हो जाए । लंगड़ा । लूला हो जाए । बिस्तर से लग जाए । तो तुम क्या करोगे ? कल बूढ़ा होगा । शरीर कमजोर होगा । तो तुम क्या करोगे ? प्रेम बेशर्त है । प्रेम सभी सीमाओं को पार करके मौजूद रहेगा । सुख में । दुख में । जवानी में । बुढ़ापे में ।
सिगरेट को पत्नी नहीं झेल पाती । प्रेम सिगरेट से छोटा मालूम पड़ता है । सिगरेट बड़ी मालूम पड़ती है । उसके लिए प्रेम खोने को राजी है । लेकिन प्रेम के लिए सिगरेट की बास झेलने को राजी नहीं है । पति पत्नी से दूर रहने को राजी है । लेकिन सिगरेट छोड़ने को राजी नहीं है । धुआं बाहर भीतर लेना ज्यादा मूल्यवान मालूम पड़ता है । पत्नी कौड़ी की मालूम पड़ती है । यह कैसा प्रेम है ? लेकिन अक्सर सभी प्रेम इसी जगह अटके हैं । सिगरेट की जगह दूसरे बहाने होंगे । दूसरी खूंटियां होंगी । लेकिन अटके हैं ।
अगर तुमने चाहा कि दूसरा ऐसा व्यवहार करें । जैसा मैं चाहता हूं । बस तुमने प्रेम के जीवन में विष डालना शुरू कर दिया । और जैसे ही तुम यह चाहोगे । दूसरा भी अपेक्षाएं शुरू कर देगा । तब तुम एक दूसरे को सुधारने में लग गए । प्रेम किसी को सुधारता नहीं । यद्यपि प्रेम के माध्यम से आत्मक्रांति हो जाती है । लेकिन प्रेम किसी को सुधारने की चेष्टा नहीं करता । सुधार घटता है । सुधार अपने से होता है । जब तुम किसी को आपूर प्रेम करते हो । इतना प्रेम करते हो । जितना कि तुम्हारे प्राण कर सकते हैं । रत्ती भर बाकी नहीं रखते । तो क्या प्रेमी में इतनी समझ न आ सकेगी । तुम्हारे इतने प्रेम के बाद भी कि सिगरेट छोड़ दे ? इतनी समझ न आ सकेगी । इतने बड़े प्रेम के बाद ? तब तो प्रेम बहुत नपुंसक है । और प्रेम नपुंसक नहीं है । प्रेम से बड़ी कोई शक्ति नहीं है । तुम्हारा प्रेम ही छुड़ा देगा । लेकिन अपेक्षा मत करना । अपेक्षा की कि घाटी की तरफ तुम उतरने लगे । अपेक्षा की और सुधारना चाहा कि बस मुसीबत हो गई ।
छोटे छोटे बच्चे तुम्हारे घर में पैदा होंगे । उनको तुम प्रेम करते हो । लेकिन प्रेम से ज्यादा उनकी सुधार की चिंता बनी रहती है । बस उसी सुधार में तुम्हारा प्रेम मर जाता है । कोई बच्चा अपने मां बाप को कभी माफ नहीं कर पाता । नाराजगी आखिर तक रहती है । पैर भी छू लेता है । क्योंकि उपचार है । छूना पड़ता है ।  लेकिन भीतर ? भीतर मां बाप दुश्मन ही मालूम होते रहते हैं । क्योंकि ऐसी छोटी छोटी चीजों पर उन्होंने बच्चे को सुधारने की कोशिश की । बच्चे को क्या समझ में आता है ? उसे समझ में आता है कि जैसा मैं हूं । वैसा प्रेम के योग्य नहीं । जैसा मैं हूं । उतना काफी नहीं ।  जैसा मैं हूं । उसको काटना पीटना  बनाना पड़ेगा ।  तब प्रेम के योग्य हो पाऊंगा । बच्चे को इसमें निंदा का स्वर मालूम पड़ता है । निंदा का स्वर है ।
ध्यान रखना । प्रेम सिर्फ प्रेम करता है । किसी को सुधारना नहीं चाहता । और प्रेम बड़े सुधार पैदा करता है । प्रेम की छाया में बड़ी क्रांतियां घटती हैं । अगर मां बाप ने बच्चे को सच में प्रेम किया है । बस काफी है । बस काफी है । उतना प्रेम ही उसे सम्हालेगा । उतना प्रेम ही उसे गलत जाने से रोकेगा । उतना प्रेम ही  जब भी वह राह से नीचे उतरने लगेगा । मार्ग में बाधा बन जाएगा । याद आएगी मां की । पिता की ।  उनके प्रेम की । और उनके बेशर्त प्रेम की । बच्चे के पैर पीछे लौट आएंगे ।
लेकिन तुम प्रेम नहीं करते । तुम सुधारते हो । जब तुम सुधारते हो । तब तुम्हारे सुधारने की आकांक्षा ही बच्चे के पैरों को गलत मार्ग पर जाने का आकर्षण बन जाती है । बच्चे झूठ बोलेंगे । सिगरेट पीएंगे । गालियां बकेंगे । अभद्रता करेंगे । सिर्फ इसलिए कि तुम सुधारना चाहते हो । तुम उनके अहंकार को चोट पहुंचा रहे हो । वे भी अहंकार से उत्तर देंगे । एक संघर्ष शुरू हो गया । और संघर्ष बड़ा मूल्यवान है । क्योंकि मां बाप से बच्चों को पहली दफा प्रेम की खबर मिलती थी । वह विषाक्त हो गई ।

लेकिन स्वतंत्र विचार की तो जन्म के पूर्व ही हत्या कर दी जाती है

शिक्षक के माध्यम से मनुष्य के चित्त को परतंत्रताओं की अत्यंत सूक्ष्म जंजीरों में बांधा जाता रहा है । यह सूक्ष्म शोषण बहुत पुराना है । शोषण के अनेक कारण हैं । धर्म हैं । धार्मिक गुरु हैं । राजतंत्र हैं । समाज के न्यस्त स्वार्थ हैं । धनपति हैं । सत्ताधिकारी हैं ।
सत्ताधिकारी ने कभी भी नहीं चाहा है कि मनुष्य में विचार हो । क्योंकि जहां विचार है । वहां विद्रोह का बीज है । विचार मूलतः विद्रोह है । क्योंकि विचार अंधा नहीं है । विचार के पास अपनी आंखें हैं । उसे हर कहीं नहीं ले जाया जा सकता । उसे हर कुछ करने और मानने को राजी नहीं किया जा सकता है । उसे अंधानुयायी नहीं बनाया जा सकता है । इसलिए सत्ताधिकारी विचार के पक्ष में नहीं हैं । वे विश्वास के पक्ष में हैं । क्योंकि विश्वास अंधा है । और मनुष्य अंधा हो । तो ही उसका शोषण हो सकता है । और मनुष्य अंधा हो । तो ही उसे स्वयं उसके ही अमंगल में संलग्न किया जा सकता है ।
मनुष्य का अंधापन उसे सब भांति के शोषण की भूमि बना देता है । इसलिए विश्वास सिखाया जाता है । आस्था सिखाई जाती है । श्रद्धा सिखाई जाती है । धर्मों ने यही किया है । राजनीतिज्ञों ने यही किया है । विचार से सभी भांति के सत्ताधिकारियों को भय है । विचार जागृत होगा । तो न तो वर्ण हो सकते हैं । न वर्ग हो सकते हैं । धन का शोषण भी नहीं हो सकता है । और शोषण को पिछले जन्मों के पाप पुण्यों के आधार पर भी नहीं समझाया और बचाया जा सकता है ।
विचार के साथ आएगी क्रांति । सब तलों पर । और सब संबंधों में । राजनीतिज्ञ भी उसमें नहीं बचेंगे । और राष्ट्रों की सीमाएं भी नहीं बचेंगी । मनुष्य को मनुष्य से तोड़ने वाली कोई दीवाल नहीं बच सकती है । इससे विचार से भय है । पूंजीवादी राजनीतिज्ञों को भी । साम्यवादी राजनीतिज्ञों को भी । और इस भय से सुरक्षा के लिए शिक्षा के ढांचे की ईजाद हुई है । यह तथाकथित शिक्षा सैकड़ों वर्षों से चल रहे एक बड़े षडयंत्र का हिस्सा है । धर्म पुरोहित पहले इस पर हावी थे । अब राज्य हावी है ।
विचार के अभाव में व्यक्ति निर्मित ही नहीं हो पाता है । क्योंकि व्यक्तित्व की मूल आधारशिला ही उसमें अनुपस्थित होती है । व्यक्तित्व की मूल आधारशिला क्या है ? क्या विचार की स्वतंत्र क्षमता ही नहीं ? लेकिन स्वतंत्र विचार की तो जन्म के पूर्व ही हत्या कर दी जाती है । गीता सिखाई जाती है । कुरान और बाइबिल सिखाए जाते हैं । कैपिटल और कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो सिखाए जाते हैं । उनके आधार पर । उनके ढांचे में विचार करना भी सिखाया जाता है । ऐसे विचार से ज्यादा मिथ्या और क्या हो सकता है ? ऐसे अंधी पुनरुक्ति सिखाई जाती है । और उसे ही विचार करना कहा जाता है । इसे एक दिशा से और समझने की कोशिश करें ।
सागर हमारे अनुभव में । दिखाई पड़ने वाले । अनुभव में । आंखों । इंद्रियों के जगत में । घटता बढ़ता मालूम नहीं पड़ता । घटता बढ़ता है । बहुत बड़ा है । अनंत नहीं । विराट है । नदियां गिरती रहती हैं । सागर में । बाहर नहीं आतीं । आकाश से बादल पानी को भरते रहते हैं । उलीचते रहते हैं । सागर को । कमी नहीं आती । अभाव नहीं हो जाता । फिर भी घटता है । विराट है । अनंत नहीं है । असीम नहीं है । विराट है सागर । इतनी नदियां गिरती हैं । कोई इंच भर फर्क मालूम नहीं पड़ता । बृह्मपुत्र । और गंगाएं । और ह्वांगहो । और अमेजान । कितना पानी डालती रहती हैं प्रतिपल । सागर वैसा का वैसा रहता है । हर रोज सूरज उलीचता रहता है । किरणों से पानी को । आकाश में जितने बादल भर जाते हैं । वे सब सागर से आते हैं । फिर भी सागर जैसा था । वैसा रहता है । फिर भी मैं कहता हूं कि सागर का अनुभव सच में ही घटने बढ़ने का नहीं है । घटता बढ़ता है । लेकिन इतना बड़ा है कि हमें पता नहीं चलता ।
आकाश हमारे अनुभव में एक दूसरी स्थिति है । सब कुछ आकाश में है । आकाश का अर्थ है । जिसमें सब कुछ है । अवकाश । स्पेस । जिसमें सारी चीजें हैं । ध्यान रहे । इसलिए आकाश किसी में नहीं हो सकता । और अगर हम सोचते हों कि आकाश को भी होने के लिए किसी में होना पड़े । तो फिर हमें एक और महत आकाश की कल्पना करनी पड़े । और फिर हम मुश्किल में पड़ेंगे । फिर जिसको तार्किक कहते हैं । इनफिनिट रिग्स । फिर हम अंतहीन नासमझी में पड़ जाएंगे । क्योंकि फिर वह जो महत आकाश है । वह किसमें होगा ? फिर इसका कोई अंत नहीं होगा । फिर और महत आकाश । फिर फिर वही सवाल होगा ।
नहीं । इसलिए आकाश में सब है । और आकाश किसी में नहीं है । आकाश सबको घेरे हुए है । और आकाश अनघिरा है । आकाश का अर्थ है । जिसमें सब हैं । और जो किसी में नहीं है । इसलिए आकाश के भीतर सब कुछ निर्मित होता रहता है । आकाश उससे बड़ा नहीं हो जाता । और आकाश के भीतर सब कुछ विसर्जित होता रहता है । आकाश उससे छोटा नहीं हो जाता । आकाश जैसा है । वैसा है । जस का तस । ऐज़ इट इज़ । आकाश अपनी सचनेस में । अपनी तथाता में रहता है ।
आप मकान बना लेते हैं । आप महल खड़ा कर लेते हैं । आपका महल गिर जाएगा । कल खंडहर हो जाएगा । मिट्टी होकर नीचे गिर जाएगा । आकाश चूमने वाले महल जमीन पर खो जाएंगे वापस । आकाश को पता भी नहीं चलेगा । आपने जब महल बनाया था । तब आकाश छोटा नहीं हो गया था । आपका जब महल गिर जाएगा । तो आकाश बड़ा नहीं हो जाएगा । आकाश में ही बनता है महल । और आकाश में ही खो जाता है । आकाश में कोई अंतर पैदा इससे नहीं होता है । शायद । आकाश और भी निकटतर । जिस बात को मैं आपको समझाना चाहता हूं । उसके और निकटतर है ।
फिर भी । आकाश कितना ही अछूता मालूम पड़ता हो । कितना ही अस्पर्शित मालूम पड़ता हो । हमारे निर्माण से । फिर भी हमारे साधारण अनुभव में ऐसा आता है कि आकाश कम ज्यादा होता होगा । क्योंकि जहां मैं बैठा हूं । अगर आप वहीं बैठना चाहें । तो नहीं बैठ सकेंगे । इसका मतलब यह हुआ कि जिस आकाश को मैंने घेर लिया । अन्यथा आप भी मेरी जगह बैठ सकते हैं । एक जगह हम एक ही मकान बना सकते हैं । उसी जगह दूसरा मकान न बना सकेंगे । उसी जगह तीसरा तो बिलकुल न बना सकेंगे । क्यों ? क्योंकि जो एक मकान हमने बनाया । उसने आकाश को घेर लिया । अगर आकाश को उसने घेर लिया । तो आकाश किसी खास अर्थ में कम हो गया । इसीलिए तो मकान हमें ऊपर उठाने पड़ रहे हैं । मकान इसीलिए ऊपर उठाने पड़ रहे हैं कि जमीन की सतह पर जो आकाश है । वह कम पड़ता जा रहा है । जमीन के दाम बढ़ते चले जाते हैं । तो मकान ऊपर उठने शुरू हो जाते हैं । क्योंकि नीचे दाम बढ़ने लगते हैं । नीचे का आकाश महंगा होने लगा । भरने लगा । ज्यादा भरने लगा । अब वहां जगह कम रह गई । तो मकान को ऊपर उठाना पड़ता है । जल्दी ही हम मकान को जमीन के नीचे भी ले जाना शुरू करेंगे । क्योंकि ऊपर उठाने की भी सीमा है । ऊपर का आकाश भी भरा जाता है ।
आकाश भी भरता मालूम पड़ता है । और जब भरता है । तो उसका अर्थ है कि उतनी जगह कम हो गई । उतना रिक्त स्थान कम हो गया । उतनी एम्पटी स्पेस कम हो गई । जिस जमीन पर हम बैठे हैं । इस जगह पर अब दूसरी जमीन पैदा नहीं हो सकती । माना कि अनंत आकाश चारों तरफ शून्य की तरह फैला हुआ है । कोई कमी नहीं है । लेकिन इतनी जगह पर तो रुकावट हो गई । इतना आकाश तो कम हुआ । भर गया ।
नहीं । परमात्मा इतना भी नहीं भरता । सागर मैंने कहा कि बहुत छोटा है । परमात्मा के हिसाब से । हमारे हिसाब से बहुत बड़ा है । गंगाओं और बृह्मपुत्रों के हिसाब से बहुत बड़ा है । कोई अंतर नहीं पड़ता । उनके गिरने से । फिर भी अंतर पड़ता है । नापतौल में नहीं आता । लेकिन अंतर पड़ता है । आकाश और भी बड़ा है । हमारे सागरों महासागरों से बहुत बड़ा है । फिर भी । आकाश भी भर जाता मालूम होता है ।

तूने स्‍वयं को जाना जिसे जानने से सब जान लिया जाता है

उपनिषद में 1 कथा है । उद्दालक का बेटा श्‍वेतकेतु ज्ञान लेकर घर लौटा । विश्‍वविद्यालय से घर आया । बाप ने देखा । दूर गांव की पगडंडी से आते हुए । उसकी चाल में मस्‍ती कम । और अकड़ ज्‍यादा थी । सुर्य पीछे से उग रहा था । अंबर में लाली फेल रही थी । पक्षी सुबह के गीत गा रहे थे । पर उद्दालक सालों बाद अपने पुत्र को घर लौटते देखकर भी उदास हो गया ।
क्‍योंकि पिता ने सोचा था । विनमृ होकर लौटेगा । वह बड़ा अकड़ा हुआ आ रहा था । अकड़ तो हजारों कोस दूर से ही खबर दे देती है अपनी । अकड़ तो अपनी तरंगें चारों तरफ फैला देती है । वह ऐसा नहीं आ रहा था कि - कुछ जानकर आ रहा है । वह ऐसे आ रहा था । जैसे मूढ़ता से भरा हुआ । ऊपर ऊपर ज्ञान तो संगृहीत कर लिया है । पंडित होकर आ रहा है । विद्वान होकर आ रहा है । प्रज्ञावान होकर नहीं आ रहा । ज्ञानी होकर नहीं आ रहा । कोई अपनी समझ की ज्‍योति नहीं जली है । अंधेरे शास्‍त्रों का बोझ लेकर आ रहा है । बाप दुखी और उदास हो गया ।
बेटा आया । उद्दालक ने पूछा कि - क्‍या क्‍या तू सीखकर आया ?
उसने कहा - सब सीखकर आया हूं । कुछ छोड़ा नहीं ।
यही तो मूढ़ता का वक्‍तव्‍य है । उसने गिनती करा दी । कितने शास्‍त्र सीखकर आया हूं । सब वेद कंठस्थ कर लिए है । सब उपनिषद जान लिए है । इतिहास  भूगोल । पुरान । काव्‍य । तर्क । दर्शन । धर्म सब जान लिया है । कुछ छोड़ा नहीं है । सब परीक्षाए पूरी करके आया हूं । गोल्ड मैडल लेकर आया हूं ।
पिता ने कहा -  लेकिन तूने उस 1 को जाना । जिसे जानकर सब जान लिया जाता है ?
उसने कहा - कैसा 1 ? किस 1 की बात कर रहे है आप ?
बाप ने कहा - तूने स्‍वयं को जाना । जिसे जानने से सब जान लिया जाता है । श्वेतकेतु उदास हो गया । उसने कहा - उस 1 की तो कोई चर्चा वहाँ हुई ही नहीं ।
तो बाप ने कहा - तुझे फिर जान पड़ेगा । क्‍योंकि हमारे कुल में हम सिर्फ जन्‍म से ही ब्राह्मण नही होते रहे है । हम जान से ब्राह्मण होते है । यह हमारे कुल की परम्‍परा है । मेरे बाप ने भी मुझे ऐसे ही वापस लौटा दिया था । 1 दिन तेरी  तरह मैं भी अकड़कर घर आया था । सोचकर कि सब जान लिया है । सब जानकर आ रहा हूं । झुका था बाप के चरणों में । लेकिन मैं झुका नहीं था । अंदर से । भीतर तो मेरे यही ख्‍याल था कि मैं अब बाप से ज्‍यादा विद्वान हो गया हूं । ज्‍यादा जान गया हूं । लेकिन मेरे पिता उदास हो गये । और उन्‍होंने कहा - वापस जा । उस 1 को जान ।  जिसे जानने से सब जान लिया जाता है । बृह्म को जानकर ही हम ब्राह्मण होते है । तुझे भी वापस जाना होगा । श्‍वेतकेतु ।
श्‍वेतकेतु की आंखों मैं पानी आ गया । और अपने पिता के चरण छुए । और वापस चला गया । घर के अंदर भी न गया था ।
मां ने कहा - बेटा आया हैं । सालों बाद  बैठने को भी नहीं कहा । और कुछ खाने को भी नहीं । कैसे पिता हो ?
लेकिन श्‍वेतकेतु ने मां के पैर छुए । और जल पिया । और कहा - मां अब  उस 1 को जानकर ही तुम्हारे चरणों में आऊँगा । जिसे पिताजी ने जाना है । या जिसे हमारे पुरखों ने जाना है । मैं कुल पर कलंक नहीं बनूंगा ।
श्‍वेतकेतु गया गुरु के पास । और पूछा - गुरूवर उस 1 को जानने के लिए आया हूं ।
तब गुरु हंसा । और कहां 400 गायें बंधी है गोशाला में । उन्‍हें जंगल में ले जा । जब तक वह 1000 न हो जाये । तब तक न लौटना । श्वेतकेतु 400 गायों को ले जंगल में चला गया । गाये चरती रहती । उनको देखता रहता । अब 1000 होने में तो समय लगेगा । बैठा रहता । पेड़ो के नीचे । झील के किनारे । गाय चरती रहती । शाम जब गायें विश्राम करती । तब वह भी विश्राम करता । दिन आये । रातें आई । चाँद उगा । चाँद ढला । सूरज निकला । सूरज गया । समय की धीरे धीरे बोध ही नहीं रहा ।
क्‍योंकि समय का बोध आदमी के साथ है । कोई चिंता नहीं । न सुबह की । न शाम की । अब गायें ही तो साथी है । और न वहां ज्ञान जो सालों पढ़ा था । उसे ही जुगाल कर ले । किसके साथ करे । खाली होता चला गया । श्‍वेतकेतु गायों की मनोरम स्‍फटिक आंखे आसमान की तरह पारदर्शी । देखना कभी गायों की आंखों में झांककर तुम किसी और ही लोक में पहुंच जाओगे । कैसे निर्दोष और मासूम  कोरी  0 शून्यवत होती है । गायें की आंखे । उनका ही संग साथ करते । कभी बैठकर बांसुरी बजा लेता । अपने अन्‍दर की बांसुरी भी धीरे धीरे बजने लगी । सालों गुजर गये ।
और अचानक गुरु का आगमन हो गया । तब पता चला । मैं यहां किसलिये आया था ।
तब गुरु ने कहा - श्‍वेतकेतु हो गयीं 1000 एक गाय । अब तू भी गऊ के समान निर्दोष हो गया है । और तूने उसे भी जान लिया । जो पूर्ण से पूर्ण है । पर श्वेतकेतु इतना पूर्ण हो गया कि उसमे कहीं मैं का भाव ही नहीं था । श्‍वेतकेतु बुद्ध हो गया । अरिहंत हो गया । जान लिया बृह्म को ।
जब श्वेतकेतु अपने घर आया । तो ऐसे आया कि उसके पदचाप भी धरा पर नहीं छू रहे थे । तब ऐसे आया विनमृता आखिरी गहराइयों को छूती हो । मिटकर आया । और जो मिटकर आया । वहीं होकर आया । अपने को खोकर आया । वह अपने का पाकर आया । ये कैसा विरोधाभास है ।
शास्‍त्र का बोझ नहीं था अब सत्‍य की निर्भार दशा थी । विचारों की भीड़ न थी । अब ध्‍यान की ज्‍योति थी । भीतर 1 विराट शून्य 0 था । भीतर 1 मंदिर बनाकर आया । 1 पूजाग्रह का भीतर जन्‍म हुआ । अपने होने का जो हमे भेद होता है । वह सब गिर गया श्वेतकेतु का  अभेद हो गया । वही जो उठता है । निशब्द में । शब्‍दों के पास ।
आज का इंसान भी कुछ ऐसा ही हो गया है । जो शिक्षा चाहता है ।  गोल्ड मैडल चाहता है । सबसे आगे रहना चाहता है । प्रमाणपत्र चाहता है । पर ज्ञान नहीं । ज्ञान के लिए विनमृता जरुरी है । स्वयं का ज्ञान होना ही बृह्म का ज्ञान है ।

खुद से तो पीठ फेर लोगे लेकिन उस अल्लाह से कैसे फेरोगे

1 टेलर था । दर्जी था । यह बीमार पडा ।  करीब करीब मरने के करीब पहुंच गया था । आखिरी घड़िया गिनता था । अब मरा कि तब मरा । रात उसने 1 सपना देखा कि वह मर गया । और कब्र में दफनाया जा रहा है । बड़ा हैरान हुआ । कब्र में रंग बिरंगी बहुत सी झंडियां लगी हुई है । उसने पास खड़े 1 फ़रिश्ते से पूछा कि ये झंडियां यहाँ क्‍यों लगी है ? दर्जी था । कपड़े में उत्‍सुकता भी स्‍वभाविक थी । उसे फ़रिश्ते ने कहा । जिन जिनके तुमने कपड़े चुराए है । जितने जितने कपड़े चुराए है । उनके प्रतीक के रूप में ये झंडियां लगी है । god इससे तुम्‍हारा हिसाब करेगा । कि ये तुम्‍हारी चोरी का रहस्‍य खोल देंगी । ये झंडिया तुम्‍हारे जीवन का बहीखाता है ।
वह घबरा गया । उसने कहा - हे अल्‍लाह । रहम कर । झंडियों को कोई अंत ही न था । दूर तक झंडियां ही झंडियां लगी थी । जहां तक आंखें देख पा रही थी । और अल्‍लाह की आवाज से घबराहट में उसकी नींद खुल गई । बहुत घबरा गया । पर न जाने किस अंजान कारण के वह एकदम से ठीक हो गया ।
फिर वह दुकान पर आया । तो उसके 2 शागिर्द थे । जो उसके साथ काम करते थे । वह उन्‍हें काम सिखाता भी था । उसने उन दोनों को बुलाया । और कहा । सुनो । अब 1 बात का ध्‍यान रखना । मुझे अपने पर भरोसा नहीं है । अगर कपड़ा कीमती आ जाये । तो मैं चुराऊंगा जरूर । पुरानी आदत है समझो । और अब इस बुढ़ापे में बदलना बड़ी कठिन है । तुम 1 काम करना । तुम जब भी देखो कि मैं कोई कपड़ा चुरा रहा हूं । तुम इतना ही कह देना । उस्‍ताद जी झंन झंडी । जोर से कह देना । दोबारा भी । गुरुजी झंन झंडी । ताकि में सम्‍हल जाऊँ । शिष्‍यों ने बहुत पूछा कि - इसका क्‍या मतलब है गुरुजी । उसने कहा । वह तुम न समझ सकोगे । और इस बात में न ही उलझो । तो अच्छा हे । तुम बस इतना भर मुझे याद दिला देना । गुरुजी झंन झंडी । बस मेरा काम हो जाएगा ।  ऐसे 3 दिन बीते । दिन में कई बार शिष्‍यों को चिल्‍लाना पड़ता । उस्‍ताद जी । झंडी । वह रूक जाता ।
चौथे दिन लेकिन मुश्‍किल हो गई । 1 जज महोदय की अचकन बनने आई । बड़ा कीमती कपड़ा था । विलायती था । उस्‍ताद घबड़ाया कि अब ये चिल्‍लाते ही हैं । झंन झंडी । तो उसने जरा पीठ कर ली । शिष्‍यों की तरफ से । और कपड़ा मारने ही जा रहा था । कि शिष्‍य चिल्‍लाया - उस्‍ताद जी  झंन झंडी । दर्जी ने इसे अनसुना कर दिया । पर शिष्‍य फिर चिल्‍लाया - उस्‍ताद जी  झंन झंडी । उसने कहा - बंद करो नालायको । इस रंग के कपड़े की झंडी वहां पर थी ही नहीं । क्‍या झंन झंडी लगा रखी है । और फिर हो भी तो क्‍या फर्क पड़ता है । जहां पर इतनी झंडी लगी है । वहां 1 और सही । ऊपर ऊपर के नियम बहुत गहरे नहीं जाते । सपनों में सीखी बातें जीवन का सत्‍य नहीं बन सकती । भय के कारण कितनी देर सम्‍हलकर चलोगे । और लोभ कैसे पुण्‍य बन सकता है ?  ओशो एस धम्‍मो सनंतनो  ।
जीवन में नियम बनाना जितना आसान है । और फिर नियम तुम्हे तय करने है । तो कोई मुश्किल काम नहीं है । उतना ही कठिन होता है । उनका पालन करना । खुद से तो पीठ फेर लोगे । लेकिन उस अल्लाह से । उस god से कैसे फेरोगे । जो सबको देखता है ।

परमात्मा भी मिल जाएगा तो भी तुम मांगोगे दण्ड ही

स्वार्थ शब्द का अर्थ समझते हो ? शब्द बड़ा प्यारा है । लेकिन गलत हाथों में पड़ गया है । स्वार्थ का अर्थ होता है - आत्मार्थ । अपना सुख । स्व का अर्थ । तो मैं तो स्वार्थ शब्द में कोई बुराई नहीं देखता । मैं तो बिलकुल पक्ष में हूं । मैं तो कहता हूं । धर्म का अर्थ ही स्वार्थ है । क्योंकि धर्म का अर्थ स्वभाव है ।
और 1 बात खयाल रखना कि जिसने स्वार्थ साध लिया । उससे परार्थ सधता है । जिससे स्वार्थ ही न सधा । उससे परार्थ कैसे सधेगा । जो अपना न हुआ । वह किसी और का कैसे होगा । जो अपने को सुख न दे सका । वह किसको सुख दे सकेगा । इसके पहले कि तुम दूसरों को प्रेम करो । मैं तुम्हें कहता हूं । अपने को प्रेम करो । इसके पहले कि तुम दूसरों के जीवन में सुख की कोई हवा ला सको । कम से कम अपने जीवन में तो हवा ले आओ । इसके पहले कि दूसरे के अंधेरे जीवन में प्रकाश की किरण उतार सको । कम से कम अपने अंधेरे में तो प्रकाश को निमंत्रित करो । इसको स्वार्थ कहते हो । चलो स्वार्थ ही सही । शब्द से क्या फर्क पड़ता है । लेकिन यह स्वार्थ बिलकुल जरूरी है । यह दुनिया ज्यादा सुखी हो जाए । अगर लोग ठीक अर्थों में स्वार्थी हो जाएं ।
और जिस आदमी ने अपना सुख नहीं जाना । वह जब दूसरे को सुख देने की कोशिश में लग जाता है । तो बड़े खतरे होते हैं । उसे पहले तो पता नहीं कि सुख क्या है ? वह जबर्दस्ती दूसरे पर सुख थोपने लगता है । जिस सुख का उसे भी अनुभव नहीं हुआ । तो करेगा क्या ? वही करेगा । जो उसके जीवन में हुआ है ।
समझो कि तुम्हारे मां बाप ने तुम्हें 1 तरह की शिक्षा दी । तुम mussalman घर में पैदा हुए कि हिंदू घर में पैदा हुए  कि जैन घर में । तुम्हारे मां बाप ने जल्दी से तुम्हें jain  हिंदू या मुसलमान बना दिया । उन्होंने यह सोचा ही नहीं कि उनके जैन होने से । हिंदू होने से उन्हें सुख मिला है ? नहीं । वे एकदम तुम्हें सुख देने में लग गए । तुम्हें हिंदू बना दिया । मुसलमान बना दिया । तुम्हारे मां बाप ने तुम्हें धन की दौड़ में लगा दिया । उन्होंने यह सोचा भी नहीं 1 भी बार कि हम धन की दौड़ में जीवन भर दौड़े । हमें धन मिला है ? धन से सुख मिला है ? उन्होंने जो किया था । वही तुम्हें सिखा दिया । उनकी भी मजबूरी है । और कुछ सिखाएंगे भी क्या ? जो हम सीखे होते हैं । उसी की शिक्षा दे सकते हैं । उन्होंने अपनी सारी बीमारियां तुम्हें सौंप दीं । तुम्हारी धरोहर बस इतनी ही है । उनके मां बाप उन्हें सौंप गए थे बीमारियां । वे तुम्हें सौंप गए । तुम अपने बच्चों को सौंप जाओगे ।
कुछ स्वार्थ कर लो । कुछ सुख पा लो । ताकि उतना तुम अपने बच्चों को दे सको । उतना तुम अपने पड़ोसियों को दे सको । यहां हर आदमी दूसरे को सुखी करने में लगा है । और यहां कोई सुखी है नहीं । जो स्वाद तुम्हें नहीं मिला । उस स्वाद को तुम दूसरे को कैसे दे सकोगे ? असंभव है ।
मैं तो बिलकुल स्वार्थ के पक्ष में हूं । मैं तो कहता हूं । मजहब मतलब की बात है । इससे बड़ा कोई मतलब नहीं है । धर्म यानी स्वार्थ । लेकिन बड़ी अपूर्व घटना घटती है । स्वार्थ की ही बुनियाद पर परार्थ का मंदिर खड़ा होता है ।
तुम जब धीरे धीरे अपने जीवन में शांति । सुख । आनंद की झलकें पाने लगते हो । तो अनायास ही तुम्हारा जीवन दूसरों के लिए उपदेश हो जाता है । तुम्हारे जीवन से दूसरों को इंगित और इशारे मिलने लगते हैं । तुम अपने बच्चों को वही सिखाओगे । जिससे तुमने शांति जानी । तुम फिर प्रतिस्पर्धा न सिखाओगे । प्रतियोगिता न सिखाओगे । संघर्ष वैमनस्य न सिखाओगे  । तुम उनके मन में जहर न डालोगे ।
इस दुनिया में अगर लोग थोड़े स्वार्थी हो जाएं । तो बड़ा परार्थ हो जाए । अब तुम कहते हो कि क्या ऐसी स्थिति में ध्यान आदि करना निपट स्वार्थ नहीं है ?
निपट स्वार्थ है । लेकिन स्वार्थ में कहीं भी कुछ बुरा नहीं है । अभी तक तुमने जिसको स्वार्थ समझा है । उसमें स्वार्थ भी नहीं है । तुम कहते हो । धन कमाएंगे । इसमें स्वार्थ है । पद पा लेंगे । इसमें स्वार्थ है । बड़ा भवन बनाएंगे । इसमें स्वार्थ है । मैं तुमसे कहता हूं । इसमें स्वार्थ कुछ भी नहीं है । मकान बन जाएगा । पद भी मिल जाएगा । धन भी कमा लिया जाएगा । अगर पागल हुए । तो सब हो जाएगा । जो तुम करना चाहते हो । मगर स्वार्थ हल नहीं होगा । क्योंकि सुख न मिलेगा । और स्वयं का मिलन भी नहीं होगा । और न जीवन में कोई अर्थवत्ता आएगी । तुम्हारा जीवन व्यर्थ ही रहेगा । कोरा । जिसमें कभी कोई वर्षा नहीं हुई । जहां कभी कोई अंकुर नहीं फूटे । कभी कोई हरियाली नहीं । और कभी कोई फूल नहीं आए । तुम्हारी वीणा ऐसी ही पड़ी रह जाएगी । जिसमें कभी किसी ने तार नहीं छेड़े । कहां का अर्थ । और कहां का स्व ।
तुमने जिसको स्वार्थ समझा है । उसमें स्वार्थ नहीं है । सिर्फ मूढ़ता है । और जिसको तुम स्वार्थ कहकर कहते हो कि कैसे मैं करूं ? मैं तुमसे कहता हूं । उसमें स्वार्थ है । और परम समझदारी का कदम भी है । तुम यह स्वार्थ करो । इस बात को तुम जीवन के गणित का बहुत आधारभूत नियम मान लो कि अगर तुम चाहते हो । दुनिया भली हो । तो अपने से शुरू कर दो । तुम भले हो जाओ ।
फिर तुम कहते हो । परमात्मा मुझे यदि मिले भी । तो उससे अपनी शांति मांगने के बजाय मैं उन लोगों के लिए दंड ही मांगना पसंद करूंगा । जिनके कारण संसार में शोषण है । दुख है । और अन्याय है ।
क्या तुम सोचते हो । तुम उन लोगों में सम्मिलित नहीं हो ? क्या तुम सोचते हो । वे लोग कोई और लोग हैं ? तुम उन लोगों से भी तो पूछो कभी । वे भी यही कहते हुए पाए जाएंगे कि दूसरों के कारण । कौन है । दूसरा यहां ? किसकी बात कर रहे हो ? किसको दंड दिलवाओगे ? तुमने शोषण नहीं किया है ? तुमने दूसरे को नहीं सताया है ? तुम दूसरे की छाती पर नहीं बैठ गए हो । मालिक नहीं बन गए हो ? तुमने दूसरों को नहीं दबाया है ? तुमने वही सब किया है । मात्रा में भले भेद हों । हो सकता है । तुम्हारे शोषण की प्रक्रिया बहुत छोटे दायरे में चलती हो । लेकिन चलती है । तुम जी न सकोगे । तुम अपने से नीचे के आदमी को उसी तरह सता रहे हो । जिस तरह तुम्हारे ऊपर का आदमी तुम्हें सता रहा है । यह सारा जाल जीवन का शोषण का जाल है । इसमें तुम एकदम बाहर नहीं हो । दंड किसके लिए मांगोगे ?
और जरा खयाल करना । दंड भी तो दुख ही देगा दूसरों को । तो तुम दूसरों को दुखी ही देखना चाहते हो । परमात्मा भी मिल जाएगा । तो भी तुम मांगोगे दंड ही । दूसरों को दुख देने का उपाय ही । तुम अपनी शांति तक छोड़ने को तैयार हो ।
इसे थोड़ा समझना पड़ेगा । और इसे हम न समझ पाएं । तो ईशावास्य के पहले और अंतिम सूत्र को भी नहीं समझ पाएंगे । 1 चित्रकार 1 चित्र बनाता है । अगर हम हिसाब लगाने बैठें । तो रंगों की कितनी कीमत होती है ? कुछ ज्यादा नहीं । कैनवस की कितनी कीमत होती है ? कुछ ज्यादा नहीं । लेकिन कोई भी श्रेष्ठ कृति । कोई भी श्रेष्ठ चित्र । रंग और कैनवस का जोड़ नहीं है । जोड़ से कुछ ज्यादा है । something more । 1 कवि 1 गीत लिखता है । उसके गीत में जो भी शब्द होते हैं । वे सभी शब्द सामान्य होते हैं । उन शब्दों को हम रोज बोलते हैं । शायद ही उस कविता में एकाध ऐसा शब्द मिल जाए । जो हम न बोलते हों । न भी बोलते हों । तो परिचित तो होते हैं । फिर भी कोई कविता शब्दों का सिर्फ जोड़ नहीं है । शब्दों के जोड़ से कुछ ज्यादा है - समथिंग मोर । 1 व्यक्ति सितार बजाता है । सितार को सुनकर हृदय पर जो परिणाम होते हैं । वे केवल ध्वनि के आघात नहीं हैं । ध्वनि के आघात से कुछ ज्यादा हम तक पहुंच जाता है । इसे ऐसा समझें । 1 व्यक्ति आंख बंद करके आपके हाथ को प्रेम से छूता है । स्पर्श वही होता है । वही व्यक्ति क्रोध से भरकर आपके हाथ को छूता है । स्पर्श वही होता है । जहां तक स्पर्श के शारीरिक मूल्यांकन का सवाल है । दोनों स्पर्श में कोई बुनियादी फर्क नहीं होता । फिर भी जब कोई प्रेम से भरकर हृदय को छूता है । तो उसी छूने में से कुछ निकलता है । जो बहुत भिन्न है । और जब कोई क्रोध से छूता है । तो कुछ निकलता है । जो बिलकुल और है । और कोई अगर बिलकुल निष्पक्षता से । तटस्थता से छूता है । तो कुछ भी नहीं निकलता है । छूना 1 सा है । स्पर्श 1 सा है । अगर हम भौतिकशास्त्री से पूछने जाएंगे । तो वह कहेगा कि हाथ पर 1 आदमी ने हाथ को छुआ । कितना दबाव पड़ा । दबाव नापा जा सकता है । हाथ पर कितना विद्युत का आघात पड़ा । वह भी नापा जा सकता है । 1 हाथ से दूसरे हाथ में कितनी ऊष्मा । कितनी गर्मी गई । वह भी नापी जा सकती है । लेकिन वह ऊष्मा । वह हाथ का दबाव । किसी भी रास्ते से बता न सकेगा कि जिस आदमी ने छुआ । उसने क्रोध से छुआ था कि प्रेम से छुआ था । फिर भी स्पर्श के भेद हम अनुभव करते हैं । निश्चित ही स्पर्श । केवल हाथ की गर्मी । हाथ का दबाव । विद्युत के प्रभाव का जोड़ नहीं है । कुछ ज्यादा है । जीवन कुछ श्रेष्ठतर गणित पर निर्भर है । यहां जिन चीजों को हमने जोड़ा था । उनसे नई चीज पैदा हो जाती है । उनसे श्रेष्ठतर का जन्म हो जाता है । उनसे महत्वपूर्ण पैदा हो जाता है । क्षुद्रतम से भी महत्वपूर्ण पैदा हो जाता है । जिंदगी साधारण गणित नहीं है । बहुत श्रेष्ठतर । गहरा । सूक्ष्म गणित है । ऐसा गणित है । जहां आंकड़े बेकार हो जाते हैं । जहां गणित के जोड़ और घटाने के नियम बेकार हो जाते हैं । और जिस आदमी को गणित के पार । जिंदगी के रहस्य का पता नहीं है । उस आदमी को जिंदगी का कोई भी पता नहीं है ।

अगर इतना बड़ा संसार बनाकर परमात्मा पीछे गृहस्थ नहीं बन जाता

इस सूत्र को ठीक से कोई साधक समझ ले । और मैं तो आपको इसीलिए कह रहा कि आपको साधना की दृष्टि से खयाल में आ जाए । अगर साधना की दृष्टि से खयाल में आ जाए । तो आप सब करके भी अकर्ता रह जाते हैं । आपने जो भी किया । अगर परमात्मा इतना करके और पीछे अछूता रह जाता है । तो आप भी सब करके पीछे अछूते रह जाते हैं । लेकिन इस सत्य को जानने की बात है । इसको पहचानने की बात है ।
अगर इतना बड़ा संसार बनाकर परमात्मा पीछे गृहस्थ नहीं बन जाता । तो एक छोटा सा घर बनाकर एक आदमी गृहस्थ बन जाए । पागलपन है । इतने विराट संसार के जाल को खड़ा करके अगर परमात्मा वैसे का वैसा रह जाता है । जैसा था । तो आप एक दुकान छोटी सी चलाकर और नष्ट हो जाते हैं ? कहीं कुछ भूल हो रही है । कहीं कुछ भूल हो रही है । कहीं अनजाने में आप अपने कर्मों के साथ अपने को एक आइडेंटिटी कर रहे हैं । एक मान रहे हैं । तादात्म्य कर रहे हैं । आप जो कर रहे हैं । समझ रहे हैं कि मैं कर रहा हूं । बस कठिनाई में पड़ रहे हैं । जिस दिन आप इतना जान लेंगे कि जो हो रहा है । वह हो रहा है । मैं नहीं कर रहा हूं । उसी दिन आप संन्यासी हो जाते हैं ।
गृहस्थ मैं उसे कहता हूं । जो सोचता है । मैं कर रहा हूं । संन्यासी मैं उसे कहता हूं । जो कहता है । हो रहा है । कहता ही नहीं । क्योंकि कहने से क्या होगा ? जानता है । जानता ही नहीं । क्योंकि अकेले जानने से क्या होगा ? जीता है ।
इसे देखें । मेरे समझाने से शायद उतना आसानी से दिखाई न पड़े । जितना प्रयोग करने से दिखाई पड़ जाए । कोई एक छोटा सा काम करके देखें । और पूरे वक्त जानते रहें कि हो रहा है । मैं नहीं कर रहा हूं । कोई भी काम करके देखें । खाना खाकर देखें । रास्ते पर चलकर देखें । किसी पर क्रोध करके देखें । और जानें कि हो रहा है । और पीछे खड़े देखते रहें कि हो रहा है । और तब आपको इस सूत्र का राज मिल जाएगा । इसकी सीक्रेट - की । इसकी कुंजी आपके हाथ में आ जाएगी । तब आप पाएंगे कि बाहर कुछ हो रहा है । और आप पीछे अछूते वही के वही हैं । जो करने के पहले थे । और जो करने के बाद भी रह जाएंगे । तब बीच की घटना सपने की जैसी आएगी । और खो जाएगी ।
संसार परमात्मा के लिए एक स्वपन से ज्यादा नहीं है । आपके लिए भी संसार एक स्वपन हो जाए । तो आप भी परमात्मा से भिन्न नहीं रह जाते । फिर दोहराता हूं । संसार परमात्मा के लिए एक स्वपन से ज्यादा नहीं है । और जब तक आपके लिए संसार एक स्वपन से ज्यादा है । तब तक आप परमात्मा से कम होंगे । जिस दिन आपको भी संसार एक स्वपन जैसा हो जाएगा । उस दिन आप परमात्मा हैं । उस दिन आप कह सकते हैं । अहं बृह्मास्मि । मैं बृह्म हूँ ।
जीवन प्रतिपल नया है । जीवन हर सांस में बदल रहा है । लेकिन हम और हमारा समाज । विशेषकर भारत में । ठहर सा गया है । इसमें कोई प्रवाह नहीं । कोई गतिशीलता नहीं । उसका दुष्परिणाम यह हुआ कि हम जीवन से ही कट गये हैं । हम पुराने से पुराने हो गये हैं । एकदम ठूंठ । हम विकासमान विश्व के प्रवाह से अलग थलग हो गये हैं । और हम बुरी तरह पिछड़ गये हैं ।
इस पुस्तक में ओशो हमें झकझोरते हुए कहते हैं । सारी दुनिया में नए को लाने का आमंत्रण है । हम नये को स्वीकार करते हैं । ऐसे । जैसे कि पराजय हो । इसीलिए 5000 वर्ष पुरानी संस्कृति । 300 वर्ष । 50 वर्ष पुरानी संस्कृतियों के सामने हाथ जोड़ कर भीख मांगती है । और हमें कोई शर्म भी मालूम नहीं होती है । हम 5000 वर्षों में इस योग्य भी न हो सके कि गेहूं पूरा हो सके । कि मकान पूरे हो सकें । अमरीका की कुल उम्र 300 वर्ष है । 300 वर्ष में अमरीका इस योग्य हो गया । और कि सारी दुनिया के पेट को भरे ।
और रूस की उम्र तो केवल 70 वर्ष ही है । 70 वर्ष की उम्र में रूस गरीब मुल्कों की कतार से हटकर अमीर मुल्कों की आखिरी कतार में खड़ा हो गया है । 70 वर्ष पहले । जिसके बच्चे भूखे थे । आज उसके बच्चे चांद तारों पर जाने की योजनाएं बना रहे हैं । 70 सालों में क्या हो गया है ? कोई जादू सीख गये हैं वे ? जादू नहीं सीख गया है । उन्होंने 1 राज़ सीख लिया है कि पुराने से चिपके रहने वाली कौम धीरे धीरे मरती है । सड़ती है, गलती है ।
भारत में हमारा चिंतन पुरातनवादी है । लेकिन हम एक बात भूल गए हैं कि यह जीवन का स्वभाव नहीं है । जीवन का विराट प्रवाह प्रतिपल परिवर्तनशील है । प्रगतिशील है । जीवन निरंतर नये प्रश्न खड़े करता है । नयी समस्याएं लाता है । लेकिन हम उन प्रश्नों और समस्याओं के उत्तर और समाधान गीता और कुरान में ढूंढ़ते हैं । इन ग्रंथों को कंठस्थ करके हम ज्ञानी तो हो जाते हैं । लेकिन हमारी एक भी समस्या का समाधान नहीं हुआ है ।
ओशो कहते हैं कि हमें फिर से अज्ञानी होने की हिम्मत जुटानी होगी । और यह सूत्र साधना के जगत में तो सर्वाधिक जरूरी है । हम मन के भीतर सब संगृहीत ज्ञान से मुक्त हों । पूरी तरह शून्य हों । मन उसे पूरी तरह विदा कर दें ।  पुराना जाना पहचाना होत है । इसलिए मन उससे चिपके रहने का आग्रह करता है । उसमें उसकी सुरक्षा है ।
जीवन प्रतिपल न केवल नया है । बल्कि अनजाना भी है । मन को इसका सामना करने में असुरक्षा प्रतीत होती है । इसलिए हज़ारों वर्षों से हमारे देश को नये का साक्षात्कार करने का साहस नहीं रहा । आक्रमणकारी आते रहे । इसे गुलाम बनाते रहे । और हम अपने घरों के बंद कमरों में बैठे गीता और वेद पढ़ते रहे । यज्ञ हवन करते रहे । और जो दुर्गति होनी भी । वह हुई ।
जीवन हमारी प्रतिपल प्रतीक्षा कर रहा है । हम इससे पलायन न करें । आओ हम जीवन के साथ लयबद्ध हों । नाचें । गाएं । और उत्सव मनाएं । और स्मरण रहे । ओशो कहते हैं । अगर हम अस्तित्व के सत्य को खोजने चले हैं । तो सत्य भी आतुर है कि कोई आवश्यकता नहीं है । जितना विराट अज्ञात हो । उसमें उतरने से उतनी ही विराट आत्मा तुम्हारी हो जाएगी । जितनी बड़ी चुनौती स्वीकार करोगे । उतना ही बड़ा तुम्हारा नव जन्म हो जाएगा । तैयारी हो जीवन के आनंद को अंगीकार करने की । तो आओ । द्वार खुले हैं । तो आओ । स्वागत है । तो आओ । बुलावा है । निमंत्रण है ।

तुम सोचते हो इस स्त्री के पास श्वास ले सकोगे तुम मुर्दा हो जाओगे ।

जो लड़का अपनी mother को प्रेम नहीं कर सका । वह किसी स्त्री को कभी प्रेम नहीं कर पाएगा । हमेशा अड़चन खड़ी होगी । क्योंकि हर स्त्री में कहीं न कहीं छिपी मां मौजूद है । हर जगह हर स्त्री मां है । मां होना स्त्री का गहरा स्वभाव है । छोटी सी बच्ची भी पैदा होती है । तो वह मां की तरह ही पैदा होती है । इसलिए गुड्डियों को लगा लेती है । बिस्तर से और सम्हालने लगती है । घर गृहस्थी बसाने लगती है ।
मुल्ला नसरुद्दीन की wife बाहर गई थी । और छोटी लड़की ने । जिसकी age केवल 7 साल है । उस दिन भोजन की टेबल पर सारा कार्य भार सम्हाल लिया था । और बड़ी गुरु गंभीरता से 1 प्रौढ़ स्त्री का काम अदा कर रही थी । लेकिन उससे छोटा बच्चा 5 साल का । उसे यह बात न जंच रही थी । तो उसने कहा कि अच्छा मान लिया । मान लिया कि तुम मां हो । लेकिन मेरे 1 सवाल का जवाब दो कि 7 में 7 का गुणा करने से कितने होते हैं ? उस लड़की ने गंभीरता से कहा । मैं काम में उलझी हूं । तुम डैडी से पूछो ।
छोटी सी बच्ची । लेकिन हर लड़की मां पैदा होती है । और हर पुरुष अंतिम जीवन के क्षण तक भी छोटा बच्चा बना रहता है । कोई पुरुष कभी छोटे बच्चे के पार नहीं जाता । हर पुरुष की आकांक्षा स्त्री में मां को खोजने की होती है । और स्त्री की आकांक्षा पुरुष में बच्चे को खोजने की होती है । इसलिए जब कोई 1 पुरुष 1 स्त्री को गहरा प्रेम करता है । तो वह छोटे शिशु जैसा हो जाता है । और प्रेम के गहरे क्षण में स्त्री मां जैसी हो जाती है । उपनिषद के ऋषियों ने आशीर्वाद दिया है । नवविवाहित युगलों को कि तुम्हारे 10 बच्चे पैदा हों । और अंत में 11वां तुम्हारा पति तुम्हारा बेटा हो जाये । उन्होंने बड़ी ठीक बात कही है ।
लेकिन मां से अगर बच्चे को प्रेम की सीख न मिल पाई । बेशर्त प्रेम की । फिर कहां सीखेगा ? पहली पाठशाला ही चूक गई । और अगर लड़की को अपने father से प्रेम न मिल पाया । वह किसी भी पुरुष को प्रेम न कर पाएगी । कुआं पहले झरने पर ही जहरीला हो गया । और फिर जब तुम प्रेम से उलझन में पड़ते हो । तब तुम्हारे साधु संन्यासी खड़े हैं । सदा तैयार कि जब तुम उलझन में पड़ो । वे कह दें । हमने पहले ही कहा था कि बचना कामिनी कांचन से । कि स्त्री सब दुख का मूल है । वे कहेंगे । हमने पहले ही कहा था कि स्त्री नरक की खान है ।
तुम्हारे शास्त्र भरे पड़े हैं । स्त्रियों की निंदा से । पुरुषों की निंदा नहीं है । क्योंकि किसी स्त्री ने शास्त्र नहीं लिखा । नहीं तो इतनी ही निंदा पुरुषों की होती । क्योंकि स्त्री भी तो उतने ही hell में जी रही है । जितने नरक में तुम जी रहे हो । लेकिन चूंकि लिखने वाले सब पुरुष थे । पक्षपात था । स्त्रियों की निंदा है । किसी तुम्हारे संत पुरुषों ने नहीं कहा कि पुरुष नरक की खान । स्त्रियों के लिए । तो वह भी नरक की खान है । अगर स्त्रियां पुरुष के लिए नरक की खान हैं । नरक दोनों साथ साथ जाते हैं । हाथ में हाथ । अकेला पुरुष तो जाता नहीं । अकेली स्त्री तो जाती नहीं । लेकिन चूंकि स्त्रियों ने कोई शास्त्र नहीं लिखा । स्त्रियों ने ऐसी भूल ही नहीं की । शास्त्र वगैरह लिखने की चूंकि पुरुषों ने लिखे हैं । इसलिए सभी शास्त्र पोलिटिकल हैं । उनमें राजनीति है । वे पक्षपात से भरे हैं ।
अगर तुम्हारी पत्नी किसी के साथ थोड़ी हंसकर भी बोल रही है । प्राण कंपित हो गए । यह तो पत्नी तुम्हारे कारागृह के बाहर जाने के लिए कोई झरोखा बना रही है । यह तो सेंध मालूम पड़ती है । दीवाल तोड़कर बाहर निकलने का उपाय है । तुम्हारी wife और किसी और के साथ हंसे ? तुम्हारी wife और किसी और से बात करे ? तुम्हारा पति किसी और स्त्री के सौंदर्य का गुणगान करे ? नहीं । यह असंभव है । क्योंकि यह तो प्रथम से ही खतरा है । यह तो स्वतंत्र होने की चेष्टा है । इसको पहले ही प्रेमी मार डालते हैं । ईर्ष्या का जन्म होता है ।
और ध्यान रखना । अगर तुम 1 स्त्री को प्रेम करते हो । तो वस्तुतः उस स्त्री के द्वारा तुम सभी स्त्रियों को प्रेम करते हो । वह स्त्री प्रतिनिधि है । वह प्रतीक है । उस स्त्री में तुमने स्त्रैणता को प्रेम किया है । जब तुम किसी 1 पुरुष को प्रेम करते हो । तो उस पुरुष में तुमने सारे जगत के पुरुषों को प्रेम कर लिया । जो आज मौजूद हैं । जो कभी मौजूद थे । जो कभी मौजूद होंगे । व्यक्तित्व तो ऊपर ऊपर है । भीतर तो शुद्ध ऊर्जा है । पुरुष होने की या स्त्री होने की  । जब तुम 1 स्त्री के सौंदर्य का गुणगान करते हो । तब यह कैसे हो सकता है कि सौंदर्य को परखने वाली ये आंखें राह से गुजरती दूसरी स्त्री को । जब वह सुंदर हो । तो उसमें सौंदर्य न देखें ? यह कैसे हो सकता है ? यह तो असंभव है । लेकिन इस सौंदर्य के देखने में कुछ पाप नहीं है । यह कैसे हो सकता है कि जब तुमने 1 दीये में रोशनी देखी । और आह्लादित हुए । तो दूसरे दीये में रोशनी देख कर तुम आह्लादित न हो जाओ ?
लेकिन 1 स्त्री कोशिश करेगी कि तुम्हें अब सौंदर्य कहीं । और दिखाई न पड़े । और 1 पुरुष कोशिश करेगा । अब स्त्री को यह सारा संसार पुरुष से शून्य 0 हो जाए । बस मैं ही 1 पुरुष दिखाई पडूं । तब 1 बड़ी संकटपूर्ण स्थिति पैदा होती है । स्त्री कोशिश में लग जाती है । इस पुरुष को कहीं कोई सुंदर स्त्री दिखाई न पड़े । धीरे धीरे यह पुरुष अपनी संवेदनशीलता को मारने लगता है । क्योंकि संवेदनशीलता रहेगी । तो सौंदर्य दिखाई पड़ेगा । सौंदर्य का किसी ने ठेका नहीं लिया है । जहां होगा । वहां दिखाई पड़ेगा । और अगर प्रेम स्वतंत्र हो । तो हर जगह हर सौंदर्य में इस व्यक्ति को अपनी प्रेयसी दिखाई पड़ेगी । और प्रेम गहरा होगा ।
लेकिन स्त्री काटेगी । संवेदनशीलता को । पुरुष काटेगा । स्त्री की संवेदनशीलता को । दोनों 1- दूसरे की संवेदना को मार डालेंगे । और जब पुरुष को कोई भी स्त्री सुंदर नहीं दिखाई पड़ेगी । तो तुम सोचते हो । घर में जो स्त्री बैठी है । वह सुंदर दिखाई पड़ेगी ? वह सबसे ज्यादा । कुरूप स्त्री हो जाएगी । उसी के कारण सौंदर्य का बोध ही मर गया । तो तुम सोचते हो । जिस स्त्री को कोई पुरुष सुंदर दिखाई न पड़ेगा । उसे घर का पुरुष सुंदर दिखाई पड़ेगा ? जब पुरुष ही सुंदर नहीं दिखाई पड़ते । तो इस भीतर का जो पुरुषत्व है । वह भी अब आकर्षण नहीं लाता ।
तुम ऐसा ही समझो कि तुमने तय कर लिया हो कि तुम जिस स्त्री को प्रेम करते हो । बस उसके पास ही श्वास लोगे । शेष समय श्वास बंद रखोगे । और तुम्हारी स्त्री कहे कि देखो । तुम और कहीं श्वास मत लेना । तुमने खुद ही कहा है कि तुम्हारा जीवन बस तेरे लिए है । तो जब मेरे पास रहो । श्वास लेना । जब और कहीं रहो । तो श्वास बंद रखना । तब क्या होगा ? अगर तुमने यह कोशिश की । तो दुबारा जब तुम इस स्त्री के पास आओगे । तुम लाश होओगे । जिंदा आदमी नहीं । और जब तुम और कहीं श्वास न ले सकोगे । तो तुम सोचते हो । इस स्त्री के पास श्वास ले सकोगे ? तुम मुर्दा हो जाओगे ।
ऐसे प्रेम कारागृह बनता है । प्रेम बड़े आश्वासन देता है । और आश्वासनों को पूरा कर सकता है । लेकिन वे पूरे हो नहीं पाते । इसलिए हर व्यक्ति प्रेम के विषाद से भर जाता है । क्योंकि प्रेम ने बड़े सपने दिए थे । बड़े इंद्रधनुष निर्मित किए थे । सारे जगत के काव्य का वचन दिया था कि तुम्हारे ऊपर वर्षा होगी । और जब वर्षा होती है । तो तुम पाते हो कि वहां न तो कोई काव्य है । न कोई सौंदर्य । सिवाय कलह । उपद्रव । संघर्ष । क्रोध । ईर्ष्या । वैमनस्य के सिवाय कुछ भी नहीं । तुम गए थे । किसी व्यक्ति के साथ स्वतंत्रता के आकाश में उड़ने । तुम पाते हो कि पंख कट गए । तुम गए थे । स्वतंत्रता की सांस लेने । तुम पाते हो गर्दन घुट गई ।
प्रेम फांसी बन जाता है । 100 में 99 मौके पर । लेकिन प्रेम के कारण नहीं । तुम्हारे कारण । तुम्हारे धर्मगुरुओं ने कहा है । प्रेम के कारण । वहां मेरा फर्क है । और तुम्हारे धर्मगुरु । तुम्हें ज्यादा ठीक मालूम पड़ेंगे । क्योंकि जिम्मेवारी तुम्हारे ऊपर से उठा रहे हैं वे । वे कह रहे हैं । यह प्रेम का ही उपद्रव है । पहले ही कहा था कि पड़ना ही मत इस उपद्रव में । दूर ही रहना । तो तुम्हारे धर्मगुरु प्रेम की निंदा करते रहे हैं । तुम्हें भी जंचती है बात । जंचती है । इसलिए कि तुम्हारे धर्मगुरु तुम्हें दोषी नहीं ठहराते । प्रेम को दोषी ठहराते हैं । मन हमेशा राजी है । दोष कोई और पर जाए । तुम हमेशा प्रसन्न हो । मैं तुम्हें दोषी ठहराता हूं । 100% तुम्हें दोषी ठहराता हूं । प्रेम की जरा भी भूल नहीं है । और प्रेम अपने आश्वासन पूरे कर सकता था । तुमने पूरे न होने दिए । तुमने गर्दन घोंट दी । सीढ़ी ऊपर ले जा सकती थी । तुम नीचे जाने लगे । नीचे जाना आसान है । ऊपर जाना श्रम साध्य है । प्रेम साधना है । और प्रेम को कारागृह बनाना ऐसे ही है । जैसे पत्थर पहाड़ से नीचे की तरफ लुढ़क रहा हो । जमीन की कशिश ही उसे खींचे लिए जाती है ।

सूर्य और पृथ्वी के बीच ऐसा ही कम्युनिकेशन है

सूर्य के संबंध में कुछ बातें जाननी जरूरी हैं । सबसे पहली तो यह बात जान लेनी जरूरी है । कि वैज्ञानिक दृष्टि से सूर्य से समस्त सौर परिवार का । मंगल का । बृहस्पति का । चंद्र का । पृथ्वी का जन्म हुआ है । ये सब सूर्य के ही अंग हैं । फिर पृथ्वी पर जीवन का जन्म हुआ । पौधों से लेकर मनुष्य तक । मनुष्य पृथ्वी का अंग है । पृथ्वी सूरज का अंग है । अगर हम इसे ऐसा समझें । 1 मां है । उसकी 1 बेटी है । और उसकी 1 बेटी है । उन तीनों के शरीर में 1 ही रक्त प्रवाहित होता है । उन तीनों के body का निर्माण 1 ही तरह के सेल्स से । 1 ही तरह के कोष्ठों से होता है । और वैज्ञानिक 1 शब्द का प्रयोग करते हैं । empathy का । जो चीजें 1 से ही पैदा होती हैं । उनके भीतर 1 अंतर समानुभूति होती है । सूर्य से पृथ्वी पैदा होती है । पृथ्वी से हम सबके शरीर निर्मित होते हैं । थोड़ा ही दूर फासले पर सूरज हमारा महापिता है । सूर्य पर जो भी घटित होता है । वह हमारे रोम रोम में स्पंदित होता है । होगा ही । क्योंकि हमारा रोम रोम भी सूर्य से ही निर्मित है । सूर्य इतना दूर दिखाई पड़ता है, इतना दूर नहीं है । हमारे रक्त के 1-1 कण में । और हड्डी के 1-1 टुकड़े में । सूर्य के ही अणुओं का वास है । हम sun के ही टुकड़े हैं । और यदि सूर्य से हम प्रभावित होते हों । तो इसमें कुछ आश्चर्य नहीं । empathy है । समानुभूति है । समानुभूति को भी थोड़ा समझ लेना जरूरी है । तो ज्योतिष के 1 आयाम में प्रवेश हो सकेगा । कल मैंने twin बच्चों की बात आपसे की । अगर 1 ही अंडे से पैदा हुए 2 बच्चों को 2 कमरों में बंद कर दिया जाए । और इस तरह के बहुत से experiment पिछले 50 वर्षों में किए गए हैं । 1 ही अंडज जुड़वां बच्चों को 2 कमरों में बंद कर दिया गया है । फिर दोनों कमरों में 1 साथ घंटी बजाई गई है । और दोनों बच्चों को कहा गया है । उनको जो पहला खयाल आता हो । वे उसे कागज पर लिख लें । या जो पहला चित्र उनके दिमाग में आता हो । वे उसे कागज पर बना लें । और बड़ी हैरानी की बात है कि अगर 20 चित्र बनवाए गए हैं । दोनों बच्चों से । तो उसमें 90% दोनों बच्चों के चित्र 1 जैसे हैं । उनके मन में जो पहली विचारधारा पैदा होती है । जो पहला शब्द बनता है । या जो पहला चित्र बनता है । ठीक उसके ही करीब । वैसा ही विचार । और वैसा ही शब्द । दूसरे जुड़वां बच्चे के भीतर भी बनता । और निर्मित होता है । इसे वैज्ञानिक कहते हैं - एम्पैथी । इन दोनों के बीच इतनी समानता है कि ये 1 से प्रतिध्वनित होते हैं । इन दोनों के भीतर अनजाने मार्गों से जैसे जोड़ है । कोई कम्युनिकेशन है ।
सूर्य और पृथ्वी के बीच ऐसा ही कम्युनिकेशन है । ऐसा ही संवाद है प्रतिपल  । और पृथ्वी और मनुष्य के बीच भी इसी तरह का संवाद है प्रतिपल । तो सूर्य । पृथ्वी । और मनुष्य । उन तीनों के बीच निरंतर संवाद है । 1 निरंतर dialogue है । लेकिन वह जो संवाद है ।  dialogue है । वह बहुत गुह्य है । और बहुत आंतरिक है । और बहुत सूक्ष्म है । उसके संबंध में थोड़ी सी बातें समझेंगे । तो खयाल में आएगा । america में 1 रिसर्च सेंटर है ।  tree ring research सेंटर । वृक्षों में जो । वृक्ष आप काटें । तो वृक्ष के तने में आपको बहुत से रिंग्स । बहुत से वर्तुल दिखाई पड़ेंगे । फर्नीचर पर जो सौंदर्य मालूम पड़ता है । वह उन्हीं वर्तुलों के कारण है । 50 वर्ष से यह रिसर्च केंद्र । वृक्षों में जो वर्तुल बनते हैं । उन पर काम कर रहा है  । तो प्रोफेसर डगलस अब उसके डायरेक्टर हैं । जिन्होंने अपने life का अधिकांश हिस्सा । वृक्षों में जो वर्तुल बनते हैं । चक्र बन जाते हैं । उन पर ही पूरा व्यय किया है । बहुत से तथ्य हाथ लगे हैं । पहला तथ्य तो सभी को ज्ञात है । साधारणतः कि वृक्ष की age उसमें बने हुए rings के द्वारा जानी जा सकती है । जानी जाती है । क्योंकि प्रतिवर्ष 1 रिंग वृक्ष में निर्मित होता है । एक छाल वृक्ष छोड़ देता है । अपनी चमड़ी छोड़ देता है । और 1 रिंग निर्मित हो जाता है । वृक्ष की कितनी उम्र है । उसके भीतर कितने ring बने हैं । इनसे तय हो जाता है । अगर वह 50 साल पुराना है । उसने 50 पतझड़ देखे हैं । तो 50 रिंग उसके तने में निर्मित हो जाते हैं । और हैरानी की बात यह है । कि इन तनों पर जो रिंग निर्मित होते हैं । वे मौसम की भी खबर देते हैं । अगर मौसम बहुत गर्म और गीला रहा हो । तो जो रिंग है । वह चौड़ा निर्मित होता है । अगर मौसम बहुत सर्द और सूखा रहा हो । तो जो रिंग है । वह बहुत संकरा निर्मित होता है । हजारों साल पुरानी लकड़ी को काटकर पता लगाया जा सकता है कि उस वर्ष जब यह रिंग बना था । तो मौसम कैसा था । बहुत वर्षा हुई थी । या नहीं हुई थी । सूखा पड़ा था । या नहीं पड़ा था  । अगर बुद्ध ने कहा है कि इस वर्ष बहुत वर्षा हुई । तो जिस बोधिवृक्ष के नीचे वे बैठे थे । वह भी खबर देगा । कि वर्षा हुई कि नहीं हुई । बुद्ध से भूल चूक हो जाए । वह जो वृक्ष है । बोधिवृक्ष । उससे भूल चूक नहीं होती । उसका रिंग बड़ा होगा । छोटा होगा । डगलस इन वर्तुलों की खोज करते करते 1 ऐसी जगह पहुंच गया । जिसकी उसे कल्पना भी नहीं थी । उसने अनुभव किया कि प्रत्येक 11 वर्ष पर रिंग जितना बड़ा होता है । उतना फिर कभी बड़ा नहीं होता । और वह 11 वर्ष । वही वर्ष है । जब सूरज पर सर्वाधिक गतिविधि होती है । हर 11वें वर्ष पर । सूरज में 1 रिदम । 1 लयबद्धता है । हर 11 वर्ष पर सूरज बहुत सक्रिय हो जाता है । उस पर रेडियो एक्टिविटी बहुत तीव्र होती है । सारी पृथ्वी पर उस वर्ष सभी वृक्ष मोटा रिंग बनाते हैं  । एकाध जगह नहीं । एकाध जंगल में नहीं । सारी पृथ्वी पर । सारे वृक्ष उस वर्ष उस रेडियो एक्टिविटी से अपनी रक्षा करने के लिए मोटा रिंग बनाते हैं । वह जो सूरज पर तीव्र घटना घटती है । ऊर्जा की । उससे बचाव के लिए उनको मोटी चमड़ी बनानी पड़ती है । उस वर्ष । हर 11 वर्ष । इससे वैज्ञानिकों में 1 नया शब्द और 1 नयी बात शुरू हुई । मौसम सब जगह अलग होते हैं । यहां सर्दी है । कहीं गर्मी है । कहीं वर्षा है । कहीं शीत है । सब जगह मौसम अलग हैं । इसलिए अब तक कभी पृथ्वी का मौसम । climate of the earth । ऐसा कोई शब्द प्रयोग नहीं होता था । लेकिन अब डगलस ने इस word का प्रयोग करना शुरू किया है । क्लाइमेट ऑफ दि अर्थ । ये सब छोटे मोटे फर्क तो हैं ही । लेकिन पूरी पृथ्वी पर भी सूरज के कारण 1 विशेष मौसम चलता है । जो हम नहीं पकड़ पाते । लेकिन वृक्ष पकड़ते हैं । हर 11वें वर्ष पर वृक्ष मोटा रिंग बनाते हैं । फिर रिंग छोटे होते जाते हैं । फिर 5 साल के बाद बड़े होने शुरू होते हैं । फिर 11वें साल पर जाकर पूरे बड़े हो जाते हैं ।

आपकी पूरी व्यवस्था सिखा रही है कि घृणा करो ईर्ष्या करो

मेरी दृष्टि में कोई भी व्यक्ति ठीक अर्थों में शिक्षक तभी हो सकता है । जब उसमें विद्रोह की एक अत्यंत ज्वलंत अग्नि हो । जिस शिक्षक के भीतर विद्रोह की अग्नि नहीं है । वह केवल किसी न किसी निहित स्वार्थ का । चाहे समाज । चाहे धर्म । चाहे राजनीति । उसका एजेंट होगा । शिक्षक के भीतर एक ज्वलंत अग्नि होनी चाहिए । विद्रोह की । चिंतन की । सोचने की । लेकिन क्या हममें सोचने की अग्नि है । और अगर नहीं है । तो आप भी एक दुकानदार हैं । शिक्षक होना बड़ी और बात है । शिक्षक होने का मतलब क्या है ? क्या हम सोचते हैं । आप बच्चों को सिखाते होंगे । सारी दुनिया में सिखाया जाता है । बच्चों को । बच्चों को सिखाया जाता है । प्रेम करो । लेकिन कभी आपने विचार किया है कि आपकी पूरी शिक्षा की व्यवस्था प्रेम पर नहीं । प्रतियोगिता पर आधारित है । किताब में सिखाते हैं । प्रेम करो । और आपकी पूरी व्यवस्था । पूरा इंतजाम प्रतियोगिता का है ।
जहां प्रतियोगिता है । वहां प्रेम कैसे हो सकता है । जहां काम्पिटीशन है । प्रतिस्पर्धा है । वहां प्रेम कैसे हो सकता है । प्रतिस्पर्धा तो ईर्ष्या का रूप है । जलन का रूप है । पूरी व्यवस्था तो जलन सिखाती है । एक बच्चा प्रथम आ जाता है । तो दूसरे बच्चों से कहते हैं कि देखो तुम पीछे रह गए । और यह पहले आ गया । आप क्या सिखा रहे हैं ? आप सिखा रहे हैं कि इससे ईर्ष्या करो । प्रतिस्पर्धा करो । इसको पीछे करो । तुम आगे आओ । आप क्या सिखा रहे हैं ? आप अहंकार सिखा रहे हैं कि जो आगे है । वह बड़ा है । जो पीछे है । वह छोटा है । लेकिन किताबों में आप कह रहे हैं कि विनीत बनो । और किताबों में आप समझा रहे हैं कि प्रेम करो । और आपकी पूरी व्यवस्था सिखा रही है कि घृणा करो । ईर्ष्या करो । आगे निकलो । दूसरे को पीछे हटाओ । और आपकी पूरी व्यवस्था उनको पुरस्कृत कर रही है । जो आगे आ रहे हैं । उनको गोल्ड मेडल दे रही है । उनको सर्टिफिकेट दे रही है । उनके गलों में मालाएं पहना रही है । उनके फोटो छाप रही है । और जो पीछे खड़े हैं । उनको अपमानित कर रही है । तो जब आप पीछे खड़े आदमी को अपमानित करते हैं । तो क्या आप उसके अहंकार को चोट नहीं पहुंचाते कि वह आगे हो जाए ? और जब आगे खड़े आदमी को आप सम्मानित करते हैं । तो क्या आप उसके अहंकार को प्रबल नहीं करते हैं ? क्या आप उसके अहंकार को नहीं फुसलाते । और बड़ा करते हैं ? और जब ये बच्चे इस भांति अहंकार में । ईर्ष्या में । प्रतिस्पर्धा में पाले जाते हैं । तो यह कैसे प्रेम कर सकते हैं । प्रेम का हमेशा मतलब होता है कि जिसे हम प्रेम करते हैं । उसे आगे जाने दें । प्रेम का हमेशा मतलब है । पीछे खड़े हो जाना ।
एक छोटी सी कहानी कहूं । उससे खयाल में आए । तीन सूफी फकीरों को फांसी दी जा रही थी । और दुनिया में हमेशा धार्मिक आदमी संतों के खिलाफ रहे हैं । तो धार्मिक लोग उन फकीरों को फांसी दे रहे थे । तीन फकीर बैठे हुए थे । कतार में । जल्लाद एक एक का नाम बुलाएगा । और उनको काट देगा । उसने चिल्लाया कि - नूरी कौन है । उठकर आ जाए । लेकिन नूरी नाम का आदमी तो नहीं उठा । एक दूसरा युवक उठा । और वह बोला कि - मैं तैयार हूं । मुझे काट देंगे । उसने कहा । लेकिन तेरा तो नाम यह नहीं है । इतनी मरने की क्या जल्दी है ? उसने कहा । मैंने प्रेम किया । और जाना कि जब मरना हो । तो आगे हो जाओ । और जब जीना हो । तो पीछे हो जाओ । मेरा मित्र मरे । उसके पहले मुझे मर जाना चाहिए । और अगर जीने का सवाल हो । तो मेरा मित्र जीए । उसके पीछे मुझे जीना चाहिए ।
प्रेम तो यही कहता है । लेकिन प्रतियोगिता क्या कहती है ? प्रतियोगिता कहती है । मरने वाले के पीछे हो जाना । और जीने वाले के आगे हो जाना । और हमारी शिक्षा क्या सिखाती है ? प्रेम सिखाती है । या प्रतियोगिता सिखाती है ? और जब सारी दुनिया में प्रतियोगिता सिखाई जाती हो । और बच्चों के दिमाग में काम्पिटीशन और एंबीशन का जहर भरा जाता हो । तो क्या दुनिया अच्छी हो सकती है ? जब हर बच्चा हर दूसरे बच्चे से आगे निकलने के लिए प्रयत्नशील हो । और जब हर बच्चा हर बच्चे को पीछे छोड़ने के लिए उत्सुक हो । 20 साल की शिक्षा के बाद जिंदगी में वह क्या करेगा ? यही करेगा । जो सीखेगा । वही करेगा । हर आदमी हर दूसरे आदमी को खींच रहा है कि पीछे आ जाओ । नीचे के चपरासी से लेकर ऊपर के राष्ट्रपति तक । हर आदमी एक दूसरे को खींच रहा है कि पीछे आ जाओ । और जब कोई खींचते खींचते चपरासी राष्ट्रपति हो जाता है । तो हम कहते हैं । बड़ी गौरव की बात हो गई । हालांकि किसी को पीछे करके आगे होने से बड़ा हीनता का । हिंसा का कोई काम नहीं है । लेकिन यह वायलेंस हम सिखा रहे हैं । यह हिंसा हम सिखा रहे हैं । और इसको हम कहते हैं । यह शिक्षा है । अगर इस शिक्षा पर आधारित दुनिया में युद्ध होते हों । तो आश्चर्य कैसा । अगर इस शिक्षा पर आधारित दुनिया में रोज लड़ाई होती हो । रोज हत्या होती हो । तो आश्चर्य कैसा । अगर इस शिक्षा पर आधारित दुनिया में झोपड़ों के करीब बड़े महल खड़े होते हों । और उन झोपड़ों में मरते लोगों के करीब भी लोग अपने महलों में खुश रहते हों । तो आश्चर्य कैसा । इस दुनिया में भूखे लोग हों । और ऐसे लोग हों । जिनके पास इतना है कि क्या करें । उनकी समझ में नहीं आता । यह इस शिक्षा की बदौलत है । यह इस शिक्षा का परिणाम है । यह दुनिया इस शिक्षा से पैदा हो रही है । और शिक्षक इसके लिए जिम्मेवार है । और शिक्षक की नासमझी इसके लिए जिम्मेवार है । वह शोषण का हथियार बना हुआ है । वह हजार तरह के स्वार्थों का हथियार बना हुआ है । इस नाम पर कि वह शिक्षा दे रहा है । बच्चों को शिक्षा दे रहा है । अगर यही शिक्षा है । तो भगवान करे कि सारी शिक्षा बंद हो जाए । तो भी आदमी इससे बेहतर हो सकता है । जंगली आदमी शिक्षित आदमी से बेहतर है । उसमें ज्यादा प्रेम है । और कम प्रतिस्पर्धा है । उसमें ज्यादा हृदय है । और कम मस्तिष्क है । लेकिन इससे बेहतर वह आदमी है । लेकिन हम इसको शिक्षा कह रहे हैं । और हम करीब करीब जिन जिन बातों को कहते हैं कि तुम यह करना । उनसे उलटी बातें हम । पूरा सरंजाम हमारा । उलटी बातें सिखाता है ।
ज्ञान के लिए पिपासा है । कितनी प्यास है ? प्रत्येक में देखता हूं । कुछ भीतर प्रज्ज्वलित है । जो शांत होना चाहता है । और मनुष्य कितनी दिशाओं में खोजता है । शायद अनंत जन्मों से । उसकी यह खोज चली आ रही है । पर हर चरण पर निराशा के अतिरिक्त और कुछ भी हाथ नहीं आता है । कोई रास्ता पहुंचता हुआ नहीं दिखता है । क्या रास्ते कहीं भी नहीं ले जाते हैं ? इस प्रश्न का उत्तर नहीं देना है । जीवन स्वयं इसका उत्तर है । क्या अनंत मार्गो और दिशाओं में चलकर उत्तर नहीं मिल गया है ? बौद्धिक उत्तर खोजने में । उसके धुएं में । वास्तविक उत्तर खो जाता है । बुद्धि चुप हो । तो अनुभूति बोलती है । विचार मौन हों । तो विवेक जाग्रत होता है । वस्तुत: जीवन के आधारभूत प्रश्नों के उत्तर नहीं होते हैं । समस्याएं हल नहीं होती हैं । गिर जाती हैं । केवल पूछने और शून्य हो जाने की बात है । बुद्धि केवल पूछ सकती है । समाधान उससे नहीं शून्य से आता है । समाधान शून्य से आता है ।  इसी सत्य को जानते ही एक नये आयाम पर जीवन का उद्घाटन प्रारंभ हो जाता है । चित्त की इसी स्थिति का नाम समाधि है । पूछें । और चुप हो जाएं । बिलकुल चुप । और समाधान को आने दें । उसे फलने दें । चित्त की इस निस्तरंग स्थिति में दर्शन होता है । उसका जो है । जो मैं हूं । स्वयं को जाने बिना ज्ञान की प्यास नहीं मिटती है । सब मार्ग छोड़कर स्वयं पर पहुंचना होता है । चित्त जब किसी मार्ग पर नहीं है । तब स्वयं में है । और स्वयं को जानना ज्ञान है । शेष सब जानकारी है । क्योंकि परोक्ष है । विज्ञान ज्ञान नहीं है । वह सत्य को नहीं । केवल उपयोगिता को जानना है । सत्य केवल अपरोक्ष ही जाना जा सकता है । और ऐसी सत्ता केवल स्वयं की ही है । जो कि अपरोक्ष जानी जा सकती है । चित्त जिस क्षण खोज की व्यर्थता को जानकर चुप और थिर रह जाता है । उसी क्षण अनंत के द्वार खुल जाते हैं । दिशा शून्य चेतना । प्रभु में विराजमान हो जाती है । और ज्ञान की प्यास का अंत केवल प्रभु में ही है ।

यदि तुम मुझसे प्रेम करती हो तो किसी अन्य से प्रेम नहीं कर सकती

शिक्षा तो चित्त को बूढ़ा करती है । यह चित्त को जगाती नहीं । भरती है । और भरने से चित्त बूढ़ा होता है । विचार भरने से चित्त थकता । बोझिल होता । और बूढ़ा होता है । विचार देना । स्मृति को भरना है । वह विचार या विवेक का जागरण नहीं है । स्मृति विवेक नहीं है । स्मृति तो यांत्रिक है । विवेक है - चैतन्य । विचार नहीं देना है । विचार को जगाना है । विचार जहां जागृत है । वहां चित्त सदा युवा है । और जहां चित्त युवा है । वहां जीवन का सतत संघर्ष है । वहां चेतन के द्वार खुले हैं । और वहां सुबह की ताजी हवाएं भी आती हैं । और नये उगते सूरज का प्रकाश भी आता है । व्यक्ति जब दूसरों के विचारों । और शब्दों की कैद में हो जाता है । तो सत्य के आकाश में उसकी स्वयं की उड़ने की क्षमता ही नष्ट हो जाती है । लेकिन शिक्षा क्या करती है ? क्या वह विचार करना सिखाती है । या कि मात्र मृत और उधार विचार देकर ही तृप्त हो जाती है ? विचार से जीवंत । और शक्ति कौन सी है । लेकिन मात्र दूसरों के विचारों को सीख लेने से जड़ । और मृत भी कोई दूसरी जड़ता नहीं है । विचार संगृह जड़ता लाता है । विचार संगृह से विचार और विवेक का जन्म नहीं होता है ।
विचार और विवेक के आविर्भाव के लिए यांत्रिक स्मृति पर अत्यधिक बल घातक है । उसके लिए तो विचार और विवेक के समुचित अवसर होने आवश्यक हैं । उसके लिए तो श्रद्धा की जगह संदेह सिखाना अनिवार्य है । श्रद्धा और विश्वास बांधते हैं । संदेह मुक्त करता है ।
लेकिन संदेह से मेरा अर्थ अविश्वास नहीं है । क्योंकि अविश्वास तो विश्वास का ही नकारात्मक रूप है । न विश्वास । न अविश्वास । वरन संदेह । विश्वास और अविश्वास दोनों ही संदेह की मृत्यु हैं । और जहां संदेह की मुक्तिदायी तीवृता नहीं है । वहां न सत्य की खोज है । न प्राप्ति है । संदेह की तीवृता खोज बनती है । संदेह है । प्यास । संदेह है । अभीप्सा । संदेह की अग्नि में ही प्राणों का मंथन होता है । और विचार का जन्म होता है । संदेह की पीड़ा विचार के जन्म की प्रसव पीड़ा है । और जो उस पीड़ा से पलायन करता है । वह सदा के लिए विचार के जागरण से वंचित रह जाता है ।
क्या हममें संदेह है ? क्या हममें जीवन के मूलभूत अर्थों और मूल्यों के प्रति संदेह है ? यदि नहीं । तो निश्चय ही हमारी शिक्षा गलत हुई है । सम्यक शिक्षा का सम्यक संदेह के अतिरिक्त और कोई आधार ही नहीं है । संदेह नहीं । तो खोज कैसे होगी ? संदेह नहीं । तो असंतोष कैसे होगा ? संदेह नहीं । तो प्राण सत्य को जानने और पाने को आकुल कैसे होंगे ? इसलिए तो हम सब अत्यंत छिछली तृप्ति के डबरे बन गए हैं । और हमारी आत्माएं सतत सागर की खोज में बहने वाली सरिताएं नहीं हैं । चूंकि मैं अपनी स्वतंत्रता चाहता हूं । अपनी प्रेयसी को हर संभव स्वतंत्रता देता हूँ । लेकिन मैं पाता हूं कि पहले उसका ध्यान रखने का नतीजा यह होता है कि अंततः मैं स्वयं को ही चोट पहुंचाता हूं ।
अपनी प्रेयसी को स्वतंत्रता देने का तुम्हारा विचार ही गलत है । अपनी प्रेयसी को स्वतंत्रता देने वाले तुम कौन होते हो ? तुम प्रेम कर सकते हो । और तुम्हारे प्रेम में स्वतंत्रता निहित है । यह ऐसी चीज नहीं है । जो किसी को दी जा सके । यदि इसे दिया जाता है । तो वही समस्याएं आएंगी । जिसका तुम सामना करते हो ।
सबसे पहले तुम कुछ गलत करते हो । वास्तव में तुम स्वतंत्रता देना नहीं चाहते हो । तुम चाहोगे कि कोई ऐसी परिस्थिति उत्पन्न न हो । जिसमें तुम्हें स्वतंत्रता देनी पड़े । लेकिन तुमने कई बार मुझे यह कहते हुए सुना होगा कि प्रेम स्वतंत्रता देता है । इसलिए बिना सचेत हुए स्वतंत्रता देने के लिए स्वयं पर दबाव डालते हो । क्योंकि अन्यथा तुम्हारा प्रेम । प्रेम नहीं रह जाता ।
तुम एक कठिन समस्या में घिरे हो । यदि तुम स्वतंत्रता नहीं देते हो । तो तुम अपने प्रेम पर संदेह करने लगते हो । यदि तुम स्वतंत्रता देते हो । जो कि तुम दे नहीं सकते । अहंकार बहुत ही ईर्ष्यालु होता है । इससे हजारों प्रश्न खड़े होंगे । क्या तुम अपनी प्रेमिका के लिए काफी नहीं हो कि वह किसी और का साथ पाने के लिए तुमसे स्वतंत्रता चाहती है ? इससे चोट पहुंचती है । और तुम सोचने लगते हो कि तुम अपने को किसी से कम महत्व देते हो ।
उसे स्वतंत्रता देकर तुमने किसी अन्य को पहले रखा । और स्वयं को बाद में । यह अहम के विरुद्ध है । और इससे कोई लाभ भी नहीं मिलने वाला है । क्योंकि तुमने जो स्वतंत्रता दी है । उसके लिए तुम बदला लोगे । तुम चाहोगे कि ऐसी ही स्वतंत्रता तुम्हें मिले । चाहे तुम्हें उसकी आवश्यकता है । या नहीं । बात यह नहीं है । ऐसा केवल यह सिद्ध करने के लिए किया जाता है कि तुम ठगे तो नहीं जा रहे हो ।
दूसरी बात । यदि तुम्हारी प्रेमिका किसी अन्य के साथ रही है । तो तुम अपनी प्रेमिका के साथ रहने पर अजीब सा महसूस करोगे । यह तुम्हारे और उसके बीच बाधा बनकर खड़ा हो जाएगा । उसने किसी और को चुन लिया है । और तुम्हारा त्याग कर दिया है । उसने तुम्हारा अपमान किया है ।
और तुमने उसे इतना कुछ दिया है । तुम इतने उदार रहे हो । तुमने उसे स्वतंत्रता दी है । चूंकि तुम आहत महसूस कर रहे हो । इसलिए तुम किसी न किसी रूप में उसे चोट पहुंचाओगे ।
लेकिन यह सब कुछ गलतफहमी के कारण पैदा होता है । मैंने यह नहीं कहा है कि तुम प्रेम करते हो । तो तुम्हें स्वतंत्रता देनी होगी । नहीं । मैंने कहा है कि प्रेम स्वतंत्रता है । यह देने का प्रश्न नहीं है । यदि तुम्हें यह देना पड़ता है । तो इसे न देना बेहतर है । जो जैसा है । उसे वैसे रहने दो । बिना कारण जटिलता क्यों उत्पन्न की जाए ? पहले से ही बहुत समस्याएं हैं ।
यदि तुम्हारे प्रेम में वह स्तर आ गया है कि स्वतंत्रता उसका अंग बन गया है । तब तुम्हारी प्रेमिका को अनुमति लेने की आवश्यकता ही नहीं रह जाएगी । वास्तव में । यदि मैं तुम्हारी जगह होता । और मेरी प्रेमिका यदि अनुमति मांगती । तो मुझे चोट पहुंचती । इसका अर्थ यह कि उसे मेरे प्रेम पर भरोसा नहीं । मेरा प्रेम स्वतंत्रता है । मैंने उससे प्रेम किया है । इसका अर्थ यह नहीं है कि मुझे सारे दरवाजे और खिड़कियां बंद कर देना चाहिए । ताकि वह किसी के साथ हंस न सके । किसी के साथ नृत्य न कर सके । किसी से प्रेम न कर सके । क्योंकि हम कौन होते हैं ?
यही मूल प्रश्न है । जिसे सभी को करना चाहिए । हम कौन हैं ? हम सभी अजनबी हैं । और इस आधार पर क्या हम इतने दबंग हो सकते हैं कि हम कह सकते हैं - मैं तुम्हें स्वतंत्रता दूंगा । अथवा - मैं तुम्हें स्वतंत्रता नहीं दूंगा । यदि तुम मुझसे प्रेम करती हो । तो किसी अन्य से प्रेम नहीं कर सकती ?  ये सभी मूर्खतापूर्ण मान्यताएं हैं । लेकिन ये सभी मानव पर शुरू से हावी रहे हैं । और हम अभी भी असभ्य हैं । हम अभी भी नहीं जानते कि प्रेम क्या होता है ।
यदि मैं किसी से प्रेम करता हूं । तो मैं उस व्यक्ति के प्रति कृतज्ञ होता हूं कि उसने मुझे प्रेम करने दिया । उसने मेरे प्रेम को अस्वीकार नहीं किया । यह पर्याप्त है । मैं उसके लिए एक कैदखाना नहीं बन जाता । उसने मुझसे प्रेम किया । और इसके बदले मैं उसके चारों ओर एक कैदखाना बना रहा हूं ? मैंने उससे प्रेम किया । और इसके बदले वह मेरे चारों ओर एक कैदखाना बना रही है ? हम एक दूसरे को अच्छा पुरस्कार दे रहें हैं ।
यदि मैं किसी से प्रेम करता हूं । तो मैं उसका कृतज्ञ होता हूं । और उसकी स्वतंत्रता बनी रहती है । मैंने उसे स्वतंत्रता दी नहीं है । यह उसका जन्मसिद्ध अधिकार है । और मेरा प्रेम उससे उसका यह अधिकार नहीं छीन सकता । कैसे । प्रेम किसी व्यक्ति से उसकी स्वतंत्रता छीन सकता है । खासकर उस व्यक्ति से जिससे तुम प्रेम करते हो ? तुम यह भी नहीं कह सकते कि - मैं उसे स्वतंत्रता देता हूं । सबसे पहले तुम कौन होते हो ? केवल एक अजनवी । तुम दोनों सड़क पर मिले हो । संयोग से । और वह महान है कि उसने तुम्हारे प्रेम को स्वीकार किया । उसके प्रति कृतज्ञ रहो । और जिस तरह से जीना चाहती है । उसे उस तरह से जीने दो । और तुम जिस तरह से जीना चाहते हो । उस तरह से जीवन जीओ । तुम्हारी जीवन शैली में कोई हस्तक्षेप नहीं करे । इसे ही स्वतंत्रता कहते हैं । तब प्रेम तुम्हें कम तनावपूर्ण । कम चिंताग्रस्त होने । कम क्रुद्ध । और अधिक प्रेसन्न होने में सहायक होगा ।
दुनिया में ठीक इसका उलटा हो रहा है । प्रेम काफी दुख दर्द देता है । और ऐसे भी लोग हैं । जो अंततः निर्णय ले लेते हैं कि किसी से प्रेम न करना बेहतर है । वे अपने हृदय के द्वार को बंद कर देते हैं । क्योंकि यह केवल नरक रह जाता । और कुछ भी नहीं ।
लेकिन प्रेम के लिए द्वार बंद करने का अर्थ है । वास्तविकता के लिए द्वार बंद करना । अस्तित्व के लिए द्वार बंद करना । इसलिए मैं इसका समर्थन नहीं करूंगा । मैं कहूंगा कि प्रेम के संपूर्ण स्वरूप को बदल दो । तुमने प्रेम को बड़ी विचित्र परिस्थिति में धकेल दिया । इस परिस्थिति को बदलो
प्रेम को अपनी आध्यात्मिक उन्नति में सहायक बनने दो । प्रेम को अपने हृदय और साहस का पोषण बनने दो । ताकि तुम्हारा हृदय किसी व्यक्ति के प्रति ही नहीं । बल्कि संपूर्ण विश्व के प्रति खुल सके ।

न ही मौत आयेगी तो पूछकर आयेगी

हरिः ॐ । ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत । तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः मा गृधः कस्यस्विद्धनम । 1
जगत में जो कुछ स्थावर जंगम संसार है । वह सब ईश्वर के द्वारा आच्छादनीय है । उसके त्याग भाव से तू अपना पालन कर । किसी के धन की इच्छा न कर ।1 ।
ईशावास्य उपनिषद की आधारभूत घोषणा । सब कुछ परमात्मा का है । इसीलिए ईशावास्य नाम है ।  ईश्वर का है । सब कुछ ।
मन करता है । मानने का कि हमारा है । पूरे जीवन इसी भ्राँति में हम जीते हैं । कुछ हमारा है । मालकियत । स्वामित्व । मेरा है । ईश्वर का है । सब कुछ । तो फिर मेरे मैं को खड़े होने की कोई जगह नहीं रह जाती ।
ध्यान रहे । अहंकार भी निर्मित होने के लिए आधार चाहता है । मैं को भी खड़ा होने के लिए मेरे का सहारा चाहिए । मेरे का सहारा न हो । तो मैं को निर्मित करना असंभव है । साधारणतः देखने पर लगता है कि मैं पहले है । मेरा बाद में है । असलियत उलटी है । मेरा पहले निर्मित करना होता है । तब उसके बीच में मैं का भवन निर्मित होता है ।
सोचें । आपके पास जो जो भी ऐसा है । जिसे आप कहते हैं मेरा । वह छीन लिया जाए सब । तो आपके पास मैं भी बच नहीं रहेगा । मेरे का जोड़ है मैं । मेरा धन । मेरा मकान । मेरा धर्म । मेरा मंदिर । मेरी मस्जिद । मेरा पद । मेरा नाम । मेरा कुल । मेरा वंश । इन सारे लाखों मेरे के बीच में मैं निर्मित होता है । एक-एक मेरे को हम गिराते चले जाएं । तो मैं की भूमि छिनती चली जाती है । अगर एक भी मेरा न बचे । तो मैं के बचने की कोई जगह नहीं रह जाती ।
मैं के लिए मेरे का नीड़ चाहिए । निवास चाहिए । घर चाहिए । मैं के लिए मेरे के बुनियादी पत्थर चाहिए । अन्यथा मैं का पूरा मकान गिर जाता है ।
ईशावास्य की पहली घोषणा उस पूरे मकान को गिरा देने वाली है । कहता है ऋषि: । सब कुछ परमात्मा का है । मेरे का कोई उपाय नहीं । मैं भी अपने को मेरा कह सकूं । इसका भी उपाय नहीं । कहता हूं अगर । तो नाजायज । अगर कहता ही चला जाता हूं । तो विक्षिप्त । मैं भी मेरा नहीं हूं । और तो सब ठीक ही है ।
इसे 2-3 दिशाओं से समझने की कोशिश करनी जरूरी है ।
पहला तो । आप जन्मते हैं । मैं जन्मता हूं । लेकिन मुझसे कोई पूछता नहीं  । मेरी इच्छा कभी जानी नहीं जाती कि मैं जन्मना चाहता हूं । जन्म मेरी इच्छा । मेरी स्वीकृति पर निर्भर नहीं है । मैं जब भी अपने को पाता हूं जन्मा हुआ पाता हूं । जन्मने के पहले मेरा कोई होना नहीं है ।
इसे ऐसा सोचें । आप 1 मकान बनाते हैं । मकान से पूछते नहीं कि तू बनना भी चाहता है । या नहीं बनना चाहता है । मकान की कोई मर्जी नहीं । आप बनाते हैं । मकान बन जाता है । कभी आपने सोचा कि आपसे भी तो आपकी मर्जी कभी नहीं पूछी गई है । ईश्वर जन्माता है । आप जन्म जाते हैं । god बनाता है । आप बन जाते हैं । मकान को भी होश आ जाए । तो वह कहे - मैं । मकान को भी होश आ जाए । तो वह बनाने वाले को मालिक नहीं मानेगा । मकान भी कहेगा कि बनाने वाला मेरा नौकर है । मुझे बनाया है इसने । मेरा साधन है । मेरी सेवा की है । मैं बनना चाहता था ।
लेकिन मकान को होश नहीं है । आदमी को होश है । और कौन जाने कि मकान को होश नहीं है । हो भी सकता है । होश के भी हजार तल हैं ।
आदमी का होश का 1 ढंग है । 1 तरह की कांशसनेस है । जरूरी नहीं है । वैसी ही कांशसनेस सबकी हो । मकान की और तरह की हो सकती है । पत्थर की और तरह की हो सकती है । पौधे की और तरह की हो सकती है । वे भी । हो सकता है । अपने अपने मैं में जीते हों । और माली जब पौधे में पानी डालता हो । तो पौधा यह न सोचता हो कि माली मुझे जन्मा रहा है । पौधा यही सोचता हो कि मैं माली की सेवाएं लेने का अनुगह कर रहा हूं । कृपा है मेरी कि सेवाएं ले लेता हूं । यद्यपि पौधे से कोई कभी पूछने नहीं गया कि तुझे जन्मना भी है ।
जो जन्म हमारी इच्छा के बिना है । उसे मेरा कहना एकदम नासमझी है । जिस जन्म के पहले मुझसे पूछा ही नहीं जाता कभी । उसे मेरे कहने का क्या अर्थ है ? न ही मौत आएगी । तो पूछकर आएगी । न ही मौत पूछेगी कि क्या इरादे हैं ? चलते हैं । नहीं चलते हैं ? आएगी । और बस आ जाएगी । ऐसे ही अनजानी जैसा जन्म आता है । ऐसे ही बिना पूछे । द्वार पर दस्तक दिए बिना । बिना किसी पूर्व सूचना के । बिना आगाह किए । बस चुपचाप खड़ी हो जाएगी । और कोई विकल्प नहीं छोड़ती । कोई आल्टरनेटिव नहीं । कोई चुनाव नहीं । कोई च्वायस नहीं । यह भी नहीं कि क्षण भर रुक जाना चाहूं । तो रुक सकूं ।
तो जिस मौत में । मेरी इतनी भी मर्जी नहीं है । उसे मेरी मौत कहना बिलकुल पागलपन है । जिस जन्म में मेरी मर्जी नहीं है । वह जन्म मेरा नहीं है । जिस मौत में मेरी मर्जी नहीं है । वह मौत मेरी नहीं है । और उन दोनों के बीच में जो जीवन है । वह मेरा कैसे हो सकता है ? उन दोनों के बीच में जिस जीवन को हम भरते हैं । जब उसके दोनों छोर मेरे नहीं हैं । दोनों बुनियादी छोर मेरे नहीं हैं । दोनों अनिवार्य छोर मेरे नहीं हैं । जिनके बिना मैं हो भी नहीं सकता । तो बीच का जो भराव है । वह भी धोखा है । डिसेप्शन है । और उसे हम भरते हैं । और हम मौत और जन्म को बिलकुल भूल जाते हैं ।
अगर हम मनस्विद से पूछें तो वह कहेगा । हम जानकर भूल जाते हैं । क्योंकि बड़े दुखद स्मरण हैं ये । मेरा जन्म भी मेरा नहीं है । तो कितना दीन हो जाता हूं । मेरी मृत्यु भी मेरी नहीं है । तो छिन गया सब । कुछ बचा नहीं । मेरे हाथ रिक्त और खाली हो गए । राख बची । और इन दोनों के बीच में जिस जीवन के लंबे सेतु को मैं निर्मित करूंगा । 1 नदी पर हम पुल बनाते हैं । बिज बनाते हैं । न यह किनारा हमारा है । न वह किनारा हमारा है । न इस किनारे पर रखे हुए बिज के । सेतु की बुनियाद हमारी है । न उस तरफ की बुनियाद हमारी है । तो यह बीच की नदी पर जो फैला हुआ पुल है । वह भी हमारा कैसे हो सकता है ? आधार जिसके हमारे नहीं हैं । वह हमारा नहीं हो सकता है । इसलिए हम जानकर भुला देते हैं ।

चीन में आप जातीय दंगा नहीं करवा सकते कोई उपाय नहीं है

मैंने सुना है कि एक बहुत बड़ा राजमहल था । आधी रात उस राजमहल में आग लग गयी । आंख वाले लोग बाहर निकल गये । एक अँधा आदमी राजमहल में था । वह द्वार टटोलकर बाहर निकलने का मार्ग खोजने लगा । लेकिन सभी द्वार बंद थे । सिर्फ एक द्वार खुला था । बंद द्वारों के पास उसने हाथ फैलाकर खोजबीन की । और वह आगे बढ़ गया । हर बंद द्वार पर उसने श्रम किया । लेकिन द्वार बंद थे । आग बढ़ती चली गयी । और जीवन संकट में पड़ता चला गया । अंतत: वह उस द्वार के निकट पहुंचा । जो खुला था । लेकिन दुर्भाग्य कि उस द्वार पर उसके सिर पर खुजली आ गयी । वह खुजलाने लगा । और उस समय द्वार से आगे निकल गया । और फिर वह बंद द्वारों पर भटकने लगा ।
अगर आप देख रहे हों । उस आदमी को । तो मन में क्या होगा ? कैसा अभागा था कि बंद द्वार पर श्रम किया । और खुले द्वार पर भूल की । जहाँ से कि बिना श्रम के ही बाहर निकला जा सकता था ? लेकिन यह किसी राजमहल में ही घटी घटना मात्र नहीं है । जीवन के महल में भी रोज ऐसी घटना घटती है । पूरे जीवन के महल में अंधकार है । आग है । एक ही द्वार खुला है । और सब द्वार बन्द हैं । बंद द्वार के पास हम सब इतना श्रम करते हैं । जिसका कोई अनुमान नहीं । खुले द्वार के पास छोटी सी भूल होते ही चूक जाते हैं । ऐसा जन्म जन्मांतरों से चल रहा है । धन और यश द्वार हैं । वे बंद द्वार हैं । वे जीवन के बाहर नहीं ले जाते । एक ही द्वार है । जीवन के आगे लगे भवन में बाहर निकलने का । और उस द्वार का नाम ध्यान है । वह अकेला खुला द्वार है । जो जीवन की आग से बाहर ले जा सकता है ।
लेकिन वह सिर पर खुजली उठ आती है । पैर में कीड़ा काट लेता है । और कुछ हो जाता है । और आदमी चूक जाता है । फिर बंद द्वार हैं और अनंत भटकन है ।
इस कहानी से अपनी बात मैं इसलिए शुरू करना चाहता हूं । क्योंकि उस खुले द्वार के पास कोई छोटी सी चीज को चूक न जायें । और यह भी ध्यान रखें कि ध्यान के अतिरिक्त न कोई खुला द्वार कभी था । और न है । न होगा । जो भी जीवन की आग के बाहर हैं । वे उसी द्वार से गये हैं । और जो भी कभी जीवन की आग के बाहर जायेगा । वह उसी द्वार से ही जा सकता है ।
शेष सब द्वार दिखायी पड़ते हैं कि द्वार हैं । लेकिन वे बंद हैं । धन भी मालूम पड़ता है कि जीवन की आग के बाहर ले जायेगा । अन्यथा कोई पागल तो नहीं है कि धन को इकट्ठा करता रहे । लगता है कि द्वार है । दिखता भी है कि द्वार है । द्वार नहीं है । दीवार भी दिखती तो अच्छा था । क्योंकि दीवार से हम सिर फोड़ने की कोशिश नहीं करते । लेकिन बंद द्वार पर तो अधिक लोग श्रम करते हैं कि शायद खुल जाये । लेकिन धन से द्वार आज तक नहीं खुला है । कितना ही श्रम करें । वह द्वार बाहर ले जाता है । और भीतर नहीं ले आता है ।
ऐसे ही बड़े द्वार हैं । यश के । कीर्ति के । अहंकार के । पद के । प्रतिष्ठा के । वे कोई भी द्वार बाहर ले जाने वाले नहीं हैं । लेकिन जब हम उन बंद द्वारों पर खड़े हैं । उन्हें देखकर । पीछे जो उन द्वारों पर नहीं हैं । उन्हें लगता है कि शायद अब भी निकल जायेंगे । जिसके पास बहुत धन है । निर्धन को देखकर लगता है । कि शायद धनी अब निकल जायेगा । जीवन की पीड़ा से । जीवन के दु:ख से । जीवन की आग से । जीवन के अंधकार से । जो खड़े है बंद द्वार पर । वे ऐसा भाव करते हैं कि जैसे निकलने के करीब पहुंच गये ।
दो तीन बातें करना चाहूँगा । एक तो जातीय दंगे को साधारण मानना शुरू करना चाहिए । उसे जातीय दंगा मानना नहीं चाहिए । साधारण दंगा मानना चाहिए । और जो साधारण दंगे के साथ व्यवहार करते हैं । वही व्यवहार उस दंगे के साथ भी करना चाहिए । क्योंकि जातीय दंगा मानने से कठिनाइयां शुरू हो जाती हैं । इसलिए जातीय दंगा मानने की जरूरत नहीं है । जब एक लड़का एक लड़की को भगाकर ले जाता है । वह मुसलमान हो कि हिन्दू । कि लड़की हिन्दू है कि मुसलमान है । इस लड़के और लड़की के साथ वही व्यवहार किया जाना चाहिए । जो कोई लड़का किसी लड़की को भगा कर ले जाये । और हो । इसको जातीय मानने का कोई कारण नहीं है ।
जैसे चीन है । चीन में आप जातीय दंगा नहीं करवा सकते । कोई उपाय नहीं है । और कोई दंगे नहीं कर रहा । जातीय दंगे नहीं करवा सकते चीन में । उसका कारण है कि कभी कभी एक एक घर में पांच पांच रिलिजन के लोग हैं । दंगा करवाइए किससे । भड़काइएगा किसको ? बाप कंफ्यूशियस को मानता है । पत्नी । उसकी मां जो है । लाओत्से को मानती है । बेटा मुहम्मद को मानता है । कोई बुद्धिस्ट है घर में । एक लड़की है । बहू जो है वह । तो चीन में एक एक घर में कभी कभी पांच पांच धर्म के आदमी भी हैं । इसकी वजह से कंवर्शन नहीं होता । अगर लड़का हिन्दू है । और स्त्री मुसलमान है । तो पत्नी मुसलमान होना जारी नहीं रख सकती । मेरा मतलब समझे न आप ? जब एक घर में पांच धर्मों के लोग हों । तो आप अलग करवाइगा कैसे ? किसके साथ दंगा करवाइगा ? डिमार्केशन मुश्किल हो जाता है । हिन्दुस्तान में डिमार्केशन आसान है । यह हिन्दू है । यह मुसलमान है । यह साफ मामला है । मुसलमान अगर मरता है । तो मेरी न तो पत्नी मरती है । न मेरी बहन मरती है । कोई नहीं मरता है । मुसलमान मरता है ।
और हम । जो इस मुल्क में जातीय दंगों को खत्म करना चाहते हैं । इतनी ज्यादा जातीयता की बात करते हैं कि हम उसे रिकग्रीशन देना शुरू कर देते हैं । इसलिए पहली बात तो यह है कि जातीयता को राजनीति के द्वारा किसी तरह का रिकग्रीशन नहीं होना चाहिए । राज्य की नजरों में हिन्दू या मुसलमान का कोई फर्क नहीं होना चाहिए ।
लेकिन हमारा राज्य खुद गलत बातें करता है । हिन्दू कोड़ बिल बनाया हुआ है । जो कि सिर्फ हिन्दुओं पर लागू होगा । मुसलमान पर लागू नहीं होगा । यह क्या बदतमीजी की बातें हैं ? कोई भी कोड़ हो । तो पूरे नागरिकों पर लागू होना चाहिए । अगर ठीक है । तो सब पर लागू होना चाहिए । ठीक नहीं है । तो किसी पर लागू नहीं होना चाहिए । लेकिन जब आपका पूरा राज्य भी हिन्दुओं को अलग मानकर चलता है । मुसलमान को अलग मानकर चलता है । तो किस तल पर यह बात खत्म होगी ?
तो पहले तो हिन्दुस्तान की सरकार को साफतौर से तय कर लेना चाहिए कि हमारे लिए नागरिक के अतिरिक्त किसी का अस्तित्व नहीं है । और अगर ऐसा मुसलमान गुंडागिरी करता है । तो एक नागरिक गुंडागिरी कर रहा है । जो उसके साथ व्यवहार होना चाहिए । वह होगा । यह मुसलमान का सवाल नहीं है । राज्य की नजरों से हिन्दू और मुसलमान का फासला खत्म होना चाहिए । पहली बात ।
दूसरी बात कि हिन्दू मुसलिम के बीच शांति हो । हिन्दू मुस्लिम का भाईचारा तय हो । इस तरह की सब कोशिश बंद करनी चाहिए । यह कोशिश खतरनाक है । इसी कोशिश ने हिन्दुस्तान पाकिस्तान को बंटवाया । क्योंकि जितना हम जोर देते हैं कि हिन्दू मुस्लिम एक हों । उतना ही हर बार दिया गया जोर बताता है कि वे एक नहीं हैं । यह हालत वैसी है । जैसे कि कोई आदमी किसी को भूलना चाहता हो । और क्योंकि भूलना चाहता है । इसलिए भूलने के लिए हर बार याद करता है । और हर बार याद करता है । तो उसकी याद मजबूत होती चली जाती है । ओशो ।

हम सुरक्षित हैं क्योंकि हमारे कान सीमा में ही सुनते हैं

अब तक हमने जो भी श्रेष्ठतम घड़ियां बनाई हैं । वे कोई भी उतनी टु दि टाइम । उतना ठीक से समय नहीं बतातीं । जितनी पृथ्वी बताती है । पृथ्वी अपनी कील पर 23 घंटे 56 मिनट में 1 चक्कर पूरा करती है । उसी के आधार पर 24 घंटे का हमने हिसाब तैयार किया हुआ है । और हमने घड़ी बनाई हुई है । और पृथ्वी काफी बड़ी चीज है । अपनी कील पर वह ठीक 23 घंटे 56 मिनट में 1 चक्र पूरा करती है । और अब तक कभी भी ऐसा नहीं समझा गया था कि पृथ्वी कभी भी भूल करती है । 1 सेकेंड की भी । लेकिन कारण कुल इतना था कि हमारे पास जांचने के बहुत ठीक उपाय नहीं थे । और हमने साधारण जांच की थी ।
लेकिन जब 90 वर्ष का वर्तुल पूरा होता है । सूर्य का । तो पृथ्वी की घड़ी एकदम डगमगा जाती है । उस क्षण में पृथ्वी ठीक अपना वर्तुल पूरा नहीं कर पाती । 11 वर्ष में जब सूरज पर उत्पात होता है । तब भी पृथ्वी डगमगा जाती है । उसकी घड़ी गड़बड़ हो जाती है । जब भी पृथ्वी रोज अपनी यात्रा में नये नये प्रभावों के अंतर्गत आती है । जब भी कोई नया प्रभाव । कोई नया कास्मिक इनफ्लुएंस । कोई महा तारा करीब हो जाता है । और करीब का मतलब । इस महा आकाश में बहुत दूर होने पर भी चीजें बहुत करीब हैं । जरा सा करीब आ जाता है । हमारी भाषा बहुत समर्थ नहीं है । क्योंकि जब हम कहते हैं । जरा सा करीब आ जाता है । तो हम सोचते हैं कि शायद जैसे हमारे पास कोई आदमी आ गया । नहीं । फासले बहुत बड़े हैं । उन फासलों में जरा सा अंतर पड़ जाता है । जो कि हमें कहीं पता भी नहीं चलेगा । तो भी पृथ्वी की कील डगमगा जाती है ।
पृथ्वी को हिलाने के लिए बड़ी शक्ति की जरूरत है । इंच भर हिलाने के लिए भी । तो महा शक्तियां जब गुजरती हैं । पृथ्वी के पास से । तभी वह हिल पाती है । लेकिन वे महा शक्तियां जब पृथ्वी के पास से गुजरती हैं । तो हमारे पास से भी गुजरती हैं । और ऐसा नहीं हो सकता कि जब पृथ्वी कंपित होती है । तो उस पर लगे हुए वृक्ष कंपित न हों । और ऐसा भी नहीं हो सकता कि जब पृथ्वी कंपित होती है । तो उस पर जीता और चलता हुआ मनुष्य कंपित न हो । सब कंप जाता है ।
लेकिन कंपन इतने सूक्ष्म हैं कि हमारे पास कोई उपकरण नहीं थे । अब तक कि हम जांच करते कि पृथ्वी कंप जाती है । लेकिन अब तो उपकरण हैं । सेकेंड के हजारवें हिस्से में भी कंपन होता है । तो हम पकड़ लेते हैं । लेकिन आदमी के कंपन को पकड़ने के उपकरण अभी भी हमारे पास नहीं हैं । वह मामला और भी सूक्ष्म है । आदमी इतना सूक्ष्म है । और होना जरूरी है । अन्यथा जीना मुश्किल हो जाए । अगर 24 घंटे आपको चारों तरफ के प्रभावों का पता चलता रहे । तो आप जी न पाएं । आप जी सकते हैं । तभी जब कि आपको आसपास के प्रभावों का कोई पता नहीं चलता ।
एक और नियम है । वह नियम यह है कि न तो हमें अपनी शक्ति से छोटे प्रभावों का पता चलता है । और न अपनी शक्ति से बड़े प्रभावों का पता चलता है । हमारे प्रभाव के पता चलने का एक दायरा है ।
जैसे समझ लें कि बुखार चढ़ता है । तो 98 डिग्री हमारी एक सीमा है । और 110 डिग्री हमारी दूसरी सीमा है । 12 डिग्री में हम जीते हैं । 90 डिग्री नीचे गिर जाए तापमान । तो हम समाप्त हो जाते हैं । उधर 110 डिग्री के बाहर चला जाए । तो हम समाप्त हो जाते हैं । लेकिन क्या आप समझते हैं । दुनिया में गर्मी 12 डिग्रियों की ही है ? आदमी 12 डिग्री के भीतर जीता है । दोनों सीमाओं के इधर उधर गया कि खो जाएगा । उसका 1 बैलेंस है । 98 और 110 के बीच में । उसको अपने को सम्हाले रखना है ।
ठीक ऐसा बैलेंस सब जगह है । मैं आपसे बोल रहा हूं । आप सुन रहे हैं । अगर मैं बहुत धीमे बोलूं । तो ऐसी जगह आ सकती है कि मैं बोलूं । और आप न सुन पाएं । लेकिन यह आपको खयाल में आ जाएगा कि बहुत धीमे बोला जाए । तो सुनाई नहीं पड़ेगा । लेकिन आपको यह खयाल में न आएगा कि इतने जोर से बोला जाए कि आप न सुन पाएं । तो आपको कठिन लगेगा । क्योंकि जोर से बोलेंगे । तब तो सुनाई पड़ेगा ही ।
नहीं । वैज्ञानिक कहते हैं । हमारे सुनने की भी डिग्री है । उससे नीचे भी हम नहीं सुन पाते । उसके ऊपर भी हम नहीं सुन पाते । हमारे आसपास भयंकर आवाजें गुजर रही हैं । लेकिन हम सुन नहीं पाते । 1 तारा टूटता है । आकाश में । कोई नया ग्रह निर्मित होता है । या बिखरता है । तो भयंकर गर्जना वाली आवाजें हमारे चारों तरफ से गुजरती हैं । अगर हम उनको सुन पाएं । तो हम तत्काल बहरे हो जाएं । लेकिन हम सुरक्षित हैं । क्योंकि हमारे कान सीमा में ही सुनते हैं । जो सूक्ष्म है । उसको भी नहीं सुनते । जो विराट है । उसको भी नहीं सुनते । 1 दायरा है । बस उतने को सुन लेते हैं ।
देखने के मामले में भी हमारी वही सीमा है । हमारी सभी इंद्रियां 1 दायरे के भीतर हैं । न उसके ऊपर । न उसके नीचे । इसीलिए आपका कुत्ता है । वह आपसे ज्यादा सूंघ लेता है । उसका दायरा सूंघने का । आपसे बड़ा है । जो आप नहीं सूंघ पाते । कुत्ता सूंघ लेता है । जो आप नहीं सुन पाते । आपका घोड़ा सुन लेता है । उसके सुनने का दायरा आपसे बड़ा है । 1-डेढ़ मील दूर सिंह आ जाए । तो घोड़ा चौंककर खड़ा हो जाता है । डेढ़ मील के फासले पर उसे गंध आती है । आपको कुछ पता नहीं चलता । अगर आपको सारी गंध आने लगें । जितनी गंध आपके चारों तरफ चल रही हैं । तो आप विक्षिप्त हो जाएं । मनुष्य 1 कैप्सूल में बंद है । उसकी सीमांत है । उसकी बाउंड्रीज हैं ।

70 से लेकर 90% तक बच्चे रात में पैदा होते हैं

आप रेडियो लगाते हैं । और आवाज सुनाई पड़नी शुरू हो जाती है । क्या आप सोचते हैं । जब रेडियो लगाते हैं । तब आवाज आनी शुरू होती है ? आवाज तो पूरे समय बहती ही रहती है । आप रेडियो लगाएं । या न लगाएं । लगाते हैं । तब रेडियो पकड़ लेता है । बहती तो पूरे वक्त रहती है । दुनिया में जितने रेडियो स्टेशन हैं । सबकी आवाजें । अभी इस कमरे से गुजर रही हैं । आप रेडियो लगाएंगे । तो पकड़ लेंगे । आप रेडियो नहीं लगाते हैं । तब भी गुजर रही हैं । लेकिन आपको सुनाई नहीं पड रही हैं । आपको सुनाई नहीं पड़ रही हैं ।
जगत में न मालूम कितनी ध्वनियां हैं । जो चारों तरफ हमारे गुजर रही हैं । भयंकर कोलाहल है । वह पूरा कोलाहल हमें सुनाई नहीं पड़ता । लेकिन उससे हम प्रभावित तो होते ही हैं । ध्यान रहे । वह हमें सुनाई नहीं पड़ता । लेकिन उससे हम प्रभावित तो होते ही हैं । वह हमारे रोएं रोएं को स्पर्श करता है । हमारे हृदय की धड़कन धड़कन को छूता है । हमारे स्नायु स्नायु को कंपा जाता है । वह अपना काम तो कर ही रहा है । उसका काम तो जारी है । जिस सुगंध को आप नहीं सूंघ पाते । उसके अणु भी आपके चारों तरफ अपना काम तो कर ही जाते हैं । और अगर उसके अणु किसी बीमारी को लाए हैं । तो वे आपको दे जाते हैं । आपकी जानकारी आवश्यक नहीं है । किसी वस्तु के होने के लिए ।
ज्योतिष का कहना है कि हमारे चारों तरफ ऊर्जाओं के क्षेत्र हैं । एनर्जी फील्डस हैं । और वे पूरे समय हमें प्रभावित कर रहे हैं । जैसा मैंने कल कहा कि जैसे ही बच्चा जन्म लेता है । तो जन्म को वैज्ञानिक भाषा में हम कहें एक्सपोजर । जैसे कि फिल्म को हम एक्सपोज करते हैं । कैमरे में । जरा सा शटर आप दबाते हैं । एक क्षण के लिए कैमरे की खिड़की खुलती है । और बंद हो जाती है । उस क्षण में जो भी कैमरे के समक्ष आ जाता है । वह फिल्म पर अंकित हो जाता है । फिल्म एक्सपोज हो गई । अब दुबारा उस पर कुछ अंकित न होगा । अंकित हो गया । और अब यह फिल्म उस आकार को सदा अपने भीतर लिए रहेगी ।
जिस दिन मां के पेट में पहली दफा गर्भाधान होता है । तो पहला एक्सपोजर होता है । जिस दिन मां के पेट से बच्चा बाहर आता है । जन्म लेता है । उस दिन दूसरा एक्सपोजर होता है । और ये दोनों एक्सपोजर उस संवेदनशील चित्त पर फिल्म की भांति अंकित हो जाते हैं । पूरा जगत उस क्षण में बच्चा अपने भीतर अंकित कर लेता है । और उसकी सिम्पैथीज निर्मित हो जाती हैं ।
ज्योतिष इतना ही कहता है कि यदि वह बच्चा जब पैदा हुआ है । तब अगर रात है । और जान कर आप हैरान होंगे कि 70 से लेकर 90% तक बच्चे रात में पैदा होते हैं । यह थोड़ा हैरानी का है । क्योंकि आमतौर से 50% होने चाहिए । 24 घंटे का हिसाब है । इसमें कोई हिसाब भी न हो । बेहिसाब भी बच्चे पैदा हों । तो 12 घंटे रात । 12 घंटे दिन । साधारण संयोग और कांबिनेशन से ठीक है । 50-50 % हो जाएं । कभी भूल चूक 2-4 % इधर उधर हो । लेकिन 90% तक बच्चे रात में जन्म लेते हैं । 10% बच्चे मुश्किल से जन्म दिन में लेते हैं । अकारण नहीं हो सकती यह बात । इसके पीछे बहुत कारण हैं ।
समझें । 1 बच्चा रात में जन्म लेता है । तो उसका जो एक्सपोजर है । उसके चित्त की जो पहली घटना है । इस जगत में अवतरण की । वह अंधेरे से संयुक्त होती है । प्रकाश से संयुक्त नहीं होती । यह सिर्फ उदाहरण के लिए कह रहा हूं । क्योंकि बात तो और विस्तीर्ण है । सिर्फ उदाहरण के लिए कह रहा हूं । उसके चित्त पर जो पहली घटना है । वह अंधकार है । सूर्य अनुपस्थित है । सूर्य की ऊर्जा अनुपस्थित है । चारों तरफ जगत सोया हुआ है । पौधे अपनी पत्तियों को बंद किए हुए हैं । पक्षी अपने पंखों को सिकोड़ कर आंखें बंद किए हुए अपने घोंसलों में छिप गए हैं । सारी पृथ्वी पर निद्रा है । हवा के कण कण में चारों तरफ नींद है । सब सोया हुआ है । जागा हुआ । कुछ भी नहीं है । यह पहला इंपैक्ट है बच्चे पर ।
अगर हम बुद्ध और महावीर से पूछें । तो वे कहेंगे कि अधिक बच्चे इसलिए रात में जन्म लेते हैं । क्योंकि अधिक आत्माएं सोई हुई हैं । एस्लीप हैं । दिन को वे नहीं चुन सकते । पैदा होने के लिए । दिन को चुनना कठिन है । और हजार कारण हैं । और हजार कारण हैं । 1 कारण महत्वपूर्ण यह भी है । अधिकतम लोग सोए हुए हैं । अधिकतम लोग तंद्रित हैं । अधिकतम लोग निद्रा में हैं । अधिकतम लोग आलस्य में । प्रमाद में हैं । सूर्य के जागने के साथ उनका जन्म ऊर्जा का जन्म होगा । सूर्य के डूबे हुए अंधेरे की आड़ में । उनका जन्म । नींद का जन्म होगा ।
रात में एक बच्चा पैदा हो रहा है । तो एक्सपोजर 1 तरह का होने वाला है । जैसे कि हमने अंधेरे में एक फिल्म खोली हो । या प्रकाश में 1 फिल्म खोली हो । तो एक्सपोजर भिन्न होने वाले हैं । एक्सपोजर की बात थोड़ी । और समझ लेनी चाहिए । क्योंकि वह ज्योतिष के बहुत गहराइयों से संबंधित है ।
जो वैज्ञानिक एक्सपोजर के संबंध में खोज करते हैं । वे कहते हैं कि एक्सपोजर की घटना बहुत बड़ी है । छोटी घटना नहीं है । क्योंकि जिंदगी भर वह आपका पीछा करेगी । 1 मुर्गी का बच्चा पैदा होता है । पैदा हुआ कि भागने लगता है । मुर्गी के पीछे । हम कहते हैं कि मां के पीछे भाग रहा है । वैज्ञानिक कहते हैं । नहीं । मां से कोई संबंध नहीं है । एक्सपोजर । हम कहते हैं । अपनी मां के पीछे भाग रहा है । लेकिन वैज्ञानिक कहते हैं । नहीं ! पहले हम भी ऐसा ही सोचते थे कि मां के पीछे भाग रहा है । लेकिन बात ऐसी नहीं है । और जब सैकड़ों प्रयोग किए गए । तो बात सही हो गई है ।
वैज्ञानिकों ने सैकड़ों प्रयोग किए । मुर्गी का बच्चा जन्म रहा है । अंडा फूट रहा है । चूजा बाहर निकल रहा है । तो उन्होंने मुर्गी को हटा लिया । और उसकी जगह 1 रबर का गुब्बारा रख दिया  । बच्चे ने जिस चीज को पहली दफा देखा । वह रबर का गुब्बारा था । मां नहीं थी । आप चकित होंगे । यह जान कर कि वह बच्चा एक्सपोज्ड हो गया । इसके बाद वह रबर के गुब्बारे को ही मां की तरह प्रेम कर सका । फिर वह अपनी मां को नहीं प्रेम कर सका । रबर का गुब्बारा हवा में इधर उधर जाएगा । तो वह पीछे भागेगा । उसकी मां भागती रहेगी । तो उसकी फिक्र ही नहीं करेगा । रबर के गुब्बारे के प्रति वह आश्चर्यजनक रूप से संवेदनशील हो गया । जब थक जाएगा । तो गुब्बारे के पास टिक कर बैठ जाएगा । गुब्बारे को प्रेम करने की कोशिश करेगा । गुब्बारे से चोंच लड़ाने की कोशिश करेगा । लेकिन मां से नहीं ।
45 वर्ष जब सूरज जवान होता है । उस वक्त जो बच्चे पैदा होते हैं । उनका स्वास्थ्य अदभुत रूप से अच्छा होगा । और जब 45 वर्ष सूरज बूढ़ा होता है । उस वक्त जो बच्चे पैदा होंगे । उनका स्वास्थ्य कभी भी अच्छा नहीं हो पाता । जब सूरज खुद ही ढलाव पर होता है । तब जो बच्चे पैदा होते हैं । उनकी हालत ठीक वैसी है । जैसे पूरब को नाव ले जानी हो । और पश्चिम को हवा बहती हो । तो फिर बहुत डांड चलाने पड़ते हैं । फिर पतवार बहुत चलानी पड़ती है । और पाल काम नहीं करते । फिर पाल खोलकर नाव नहीं ले जाई जा सकती । क्योंकि उलटे बहना पड़ता है । जब सूरज ही बूढ़ा होता है । सूरज जो कि प्राण है । सारे सौर परिवार का । तब जिसको भी जवान होना है । उसे उलटी धारा में तैरना पड़ता है । हवा के खिलाफ । उसके लिए संघर्ष भारी है । जब सूरज ही जवान हो रहा होता है । तो पूरा सौर परिवार शक्तियों से भरा होता है । और उठान की तरफ होता है । तब जो पैदा होता है । वह जैसे पाल वाली नाव में बैठ गया । पूरब की तरफ हवाएं बह रही हैं । उसे डांड भी नहीं चलानी है । पतवार भी नहीं चलानी है । श्रम भी नहीं करना है । नाव खुद बह जाएगी । पाल खोल देना है । हवाएं नाव को ले जाएंगी ।
इस संबंध में अब वैज्ञानिकों को भी शक होने लगा है कि सूरज जब अपनी चरम अवस्था में जाता है । तब पृथ्वी पर कम से कम बीमारियां होती हैं । और जब सूरज अपने उतार पर होता है । तब पृथ्वी पर सर्वाधिक बीमारियां होती हैं । पृथ्वी पर 45 साल बीमारियों के होते हैं । और 45 साल कम बीमारियों के होते हैं ।
नील ठीक 4000 वर्षों में । हर 90 वर्ष में इसी तरह जवान । और बूढ़ी होती रही है । जब सूरज जवान होता है । तो नील में सर्वाधिक पानी होता है । वह 45 वर्ष तक उसमें पानी बढ़ता चला जाता है । और जब सूरज ढलने लगता है । बूढ़ा होने लगता है । तो नील का पानी नीचे गिरता चला जाता है । वह शिथिल होने लगती है । और बूढ़ी हो जाती है । आदमी इस विराट जगत में कुछ अलग थलग नहीं है । इस सबका इकट्ठा जोड़ है । ओशो ।
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