सोमवार, नवंबर 21, 2011

जिसके ऊपर तुम्हारे पूरे अहंकार का भवन खड़ा है

गुरजिएफ अपने अनुयायियों से कहा करता था - पहली बात । सबसे पहली बात ढूंढें कि तुम्हारी मूल दुर्बलता क्या है ? तुम्हारा मुख्य अकर्म । तुम्हारे अवचेतन की केंद्रीय संकीर्णता क्या है । हर व्यक्ति अलग है । कोई व्यक्ति काम से गृसित है । भारत जैसे देश में । जहां काम को सदियों दबाया जाता रहा है । यह लगभग वहां एक मनोग्रस्ति बन गया है । हर व्यक्ति काम से ग्रसित है । कोई क्रोध से ग्रसित है । और कोई लोभ से ग्रसित है । तुम्हें देखना होगा कि तुम्हारी मूल मनोग्रस्ति क्या है । अत: सबसे पहले अपनी मूल मनोग्रस्ति को जानें । जिसके ऊपर तुम्हारे पूरे अहंकार का भवन खड़ा है । और फिर निरंतर सचेत रहें । क्योंकि यह केवल तभी रह सकती है । अगर तुम अचेत हो । बोध की अग्नि में जलकर यह स्वयं ही भस्म हो जाती है । और स्मरण रहे । सदा स्मरण रहे कि तुम्हें इसके विपरीत को पोषित नहीं करना है । नहीं तो होता यह है कि व्यक्ति को यह बोध होने लगता है कि - मैं क्रोध में ग्रसित हो जाता हूं । तो मुझे करुणा को पोषित करना चाहिए । मैं काम मे आविष्ट हो जाता हूं । मुझे क्या करना चाहिए ? मुझे बृह्मचर्य का अभ्यास करना चाहिए । लोग एक अति से दूसरी अति पर जाने लगते हैं । यह अतिक्रमण का ढंग नहीं है । यह वही पेंडुलम है । बाएं से दाएं जाता हुआ । और दाएं से बाएं । ठीक इसी तरह तुम्हारा जीवन सदियों से चल रहा है । यह वही पेंड़ुलम है । पेंडुलम मध्य में रोकना होगा । और यही बोध का करिश्मा है । बस यह बोध रखें । यही मेरी मुख्य खाई है । यही वह स्थान है । जहां मैं बारबार टकराता हूं । यही मेरी बेहोशी की जड़ है । दूसरी अति को पोषित न करें । बस । अपनी पूरी चेतना वहीं उड़ेल दें । अपने समस्त बोध की होलिका बनाएं । और बेहोशी उसमें जलकर भस्म हो जाएगी । और तब पेंडुलम बीच में रुक जाएगा । और पेंडुलम के रुकने से समय रुक जाता है । तुम समयातीत । सनातन । व शाश्वत में प्रवेश कर जाते हो ।

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