सोमवार, नवंबर 21, 2011

यदि तुम मुझसे प्रेम करती हो तो किसी अन्य से प्रेम नहीं कर सकती

शिक्षा तो चित्त को बूढ़ा करती है । यह चित्त को जगाती नहीं । भरती है । और भरने से चित्त बूढ़ा होता है । विचार भरने से चित्त थकता । बोझिल होता । और बूढ़ा होता है । विचार देना । स्मृति को भरना है । वह विचार या विवेक का जागरण नहीं है । स्मृति विवेक नहीं है । स्मृति तो यांत्रिक है । विवेक है - चैतन्य । विचार नहीं देना है । विचार को जगाना है । विचार जहां जागृत है । वहां चित्त सदा युवा है । और जहां चित्त युवा है । वहां जीवन का सतत संघर्ष है । वहां चेतन के द्वार खुले हैं । और वहां सुबह की ताजी हवाएं भी आती हैं । और नये उगते सूरज का प्रकाश भी आता है । व्यक्ति जब दूसरों के विचारों । और शब्दों की कैद में हो जाता है । तो सत्य के आकाश में उसकी स्वयं की उड़ने की क्षमता ही नष्ट हो जाती है । लेकिन शिक्षा क्या करती है ? क्या वह विचार करना सिखाती है । या कि मात्र मृत और उधार विचार देकर ही तृप्त हो जाती है ? विचार से जीवंत । और शक्ति कौन सी है । लेकिन मात्र दूसरों के विचारों को सीख लेने से जड़ । और मृत भी कोई दूसरी जड़ता नहीं है । विचार संगृह जड़ता लाता है । विचार संगृह से विचार और विवेक का जन्म नहीं होता है ।
विचार और विवेक के आविर्भाव के लिए यांत्रिक स्मृति पर अत्यधिक बल घातक है । उसके लिए तो विचार और विवेक के समुचित अवसर होने आवश्यक हैं । उसके लिए तो श्रद्धा की जगह संदेह सिखाना अनिवार्य है । श्रद्धा और विश्वास बांधते हैं । संदेह मुक्त करता है ।
लेकिन संदेह से मेरा अर्थ अविश्वास नहीं है । क्योंकि अविश्वास तो विश्वास का ही नकारात्मक रूप है । न विश्वास । न अविश्वास । वरन संदेह । विश्वास और अविश्वास दोनों ही संदेह की मृत्यु हैं । और जहां संदेह की मुक्तिदायी तीवृता नहीं है । वहां न सत्य की खोज है । न प्राप्ति है । संदेह की तीवृता खोज बनती है । संदेह है । प्यास । संदेह है । अभीप्सा । संदेह की अग्नि में ही प्राणों का मंथन होता है । और विचार का जन्म होता है । संदेह की पीड़ा विचार के जन्म की प्रसव पीड़ा है । और जो उस पीड़ा से पलायन करता है । वह सदा के लिए विचार के जागरण से वंचित रह जाता है ।
क्या हममें संदेह है ? क्या हममें जीवन के मूलभूत अर्थों और मूल्यों के प्रति संदेह है ? यदि नहीं । तो निश्चय ही हमारी शिक्षा गलत हुई है । सम्यक शिक्षा का सम्यक संदेह के अतिरिक्त और कोई आधार ही नहीं है । संदेह नहीं । तो खोज कैसे होगी ? संदेह नहीं । तो असंतोष कैसे होगा ? संदेह नहीं । तो प्राण सत्य को जानने और पाने को आकुल कैसे होंगे ? इसलिए तो हम सब अत्यंत छिछली तृप्ति के डबरे बन गए हैं । और हमारी आत्माएं सतत सागर की खोज में बहने वाली सरिताएं नहीं हैं । चूंकि मैं अपनी स्वतंत्रता चाहता हूं । अपनी प्रेयसी को हर संभव स्वतंत्रता देता हूँ । लेकिन मैं पाता हूं कि पहले उसका ध्यान रखने का नतीजा यह होता है कि अंततः मैं स्वयं को ही चोट पहुंचाता हूं ।
अपनी प्रेयसी को स्वतंत्रता देने का तुम्हारा विचार ही गलत है । अपनी प्रेयसी को स्वतंत्रता देने वाले तुम कौन होते हो ? तुम प्रेम कर सकते हो । और तुम्हारे प्रेम में स्वतंत्रता निहित है । यह ऐसी चीज नहीं है । जो किसी को दी जा सके । यदि इसे दिया जाता है । तो वही समस्याएं आएंगी । जिसका तुम सामना करते हो ।
सबसे पहले तुम कुछ गलत करते हो । वास्तव में तुम स्वतंत्रता देना नहीं चाहते हो । तुम चाहोगे कि कोई ऐसी परिस्थिति उत्पन्न न हो । जिसमें तुम्हें स्वतंत्रता देनी पड़े । लेकिन तुमने कई बार मुझे यह कहते हुए सुना होगा कि प्रेम स्वतंत्रता देता है । इसलिए बिना सचेत हुए स्वतंत्रता देने के लिए स्वयं पर दबाव डालते हो । क्योंकि अन्यथा तुम्हारा प्रेम । प्रेम नहीं रह जाता ।
तुम एक कठिन समस्या में घिरे हो । यदि तुम स्वतंत्रता नहीं देते हो । तो तुम अपने प्रेम पर संदेह करने लगते हो । यदि तुम स्वतंत्रता देते हो । जो कि तुम दे नहीं सकते । अहंकार बहुत ही ईर्ष्यालु होता है । इससे हजारों प्रश्न खड़े होंगे । क्या तुम अपनी प्रेमिका के लिए काफी नहीं हो कि वह किसी और का साथ पाने के लिए तुमसे स्वतंत्रता चाहती है ? इससे चोट पहुंचती है । और तुम सोचने लगते हो कि तुम अपने को किसी से कम महत्व देते हो ।
उसे स्वतंत्रता देकर तुमने किसी अन्य को पहले रखा । और स्वयं को बाद में । यह अहम के विरुद्ध है । और इससे कोई लाभ भी नहीं मिलने वाला है । क्योंकि तुमने जो स्वतंत्रता दी है । उसके लिए तुम बदला लोगे । तुम चाहोगे कि ऐसी ही स्वतंत्रता तुम्हें मिले । चाहे तुम्हें उसकी आवश्यकता है । या नहीं । बात यह नहीं है । ऐसा केवल यह सिद्ध करने के लिए किया जाता है कि तुम ठगे तो नहीं जा रहे हो ।
दूसरी बात । यदि तुम्हारी प्रेमिका किसी अन्य के साथ रही है । तो तुम अपनी प्रेमिका के साथ रहने पर अजीब सा महसूस करोगे । यह तुम्हारे और उसके बीच बाधा बनकर खड़ा हो जाएगा । उसने किसी और को चुन लिया है । और तुम्हारा त्याग कर दिया है । उसने तुम्हारा अपमान किया है ।
और तुमने उसे इतना कुछ दिया है । तुम इतने उदार रहे हो । तुमने उसे स्वतंत्रता दी है । चूंकि तुम आहत महसूस कर रहे हो । इसलिए तुम किसी न किसी रूप में उसे चोट पहुंचाओगे ।
लेकिन यह सब कुछ गलतफहमी के कारण पैदा होता है । मैंने यह नहीं कहा है कि तुम प्रेम करते हो । तो तुम्हें स्वतंत्रता देनी होगी । नहीं । मैंने कहा है कि प्रेम स्वतंत्रता है । यह देने का प्रश्न नहीं है । यदि तुम्हें यह देना पड़ता है । तो इसे न देना बेहतर है । जो जैसा है । उसे वैसे रहने दो । बिना कारण जटिलता क्यों उत्पन्न की जाए ? पहले से ही बहुत समस्याएं हैं ।
यदि तुम्हारे प्रेम में वह स्तर आ गया है कि स्वतंत्रता उसका अंग बन गया है । तब तुम्हारी प्रेमिका को अनुमति लेने की आवश्यकता ही नहीं रह जाएगी । वास्तव में । यदि मैं तुम्हारी जगह होता । और मेरी प्रेमिका यदि अनुमति मांगती । तो मुझे चोट पहुंचती । इसका अर्थ यह कि उसे मेरे प्रेम पर भरोसा नहीं । मेरा प्रेम स्वतंत्रता है । मैंने उससे प्रेम किया है । इसका अर्थ यह नहीं है कि मुझे सारे दरवाजे और खिड़कियां बंद कर देना चाहिए । ताकि वह किसी के साथ हंस न सके । किसी के साथ नृत्य न कर सके । किसी से प्रेम न कर सके । क्योंकि हम कौन होते हैं ?
यही मूल प्रश्न है । जिसे सभी को करना चाहिए । हम कौन हैं ? हम सभी अजनबी हैं । और इस आधार पर क्या हम इतने दबंग हो सकते हैं कि हम कह सकते हैं - मैं तुम्हें स्वतंत्रता दूंगा । अथवा - मैं तुम्हें स्वतंत्रता नहीं दूंगा । यदि तुम मुझसे प्रेम करती हो । तो किसी अन्य से प्रेम नहीं कर सकती ?  ये सभी मूर्खतापूर्ण मान्यताएं हैं । लेकिन ये सभी मानव पर शुरू से हावी रहे हैं । और हम अभी भी असभ्य हैं । हम अभी भी नहीं जानते कि प्रेम क्या होता है ।
यदि मैं किसी से प्रेम करता हूं । तो मैं उस व्यक्ति के प्रति कृतज्ञ होता हूं कि उसने मुझे प्रेम करने दिया । उसने मेरे प्रेम को अस्वीकार नहीं किया । यह पर्याप्त है । मैं उसके लिए एक कैदखाना नहीं बन जाता । उसने मुझसे प्रेम किया । और इसके बदले मैं उसके चारों ओर एक कैदखाना बना रहा हूं ? मैंने उससे प्रेम किया । और इसके बदले वह मेरे चारों ओर एक कैदखाना बना रही है ? हम एक दूसरे को अच्छा पुरस्कार दे रहें हैं ।
यदि मैं किसी से प्रेम करता हूं । तो मैं उसका कृतज्ञ होता हूं । और उसकी स्वतंत्रता बनी रहती है । मैंने उसे स्वतंत्रता दी नहीं है । यह उसका जन्मसिद्ध अधिकार है । और मेरा प्रेम उससे उसका यह अधिकार नहीं छीन सकता । कैसे । प्रेम किसी व्यक्ति से उसकी स्वतंत्रता छीन सकता है । खासकर उस व्यक्ति से जिससे तुम प्रेम करते हो ? तुम यह भी नहीं कह सकते कि - मैं उसे स्वतंत्रता देता हूं । सबसे पहले तुम कौन होते हो ? केवल एक अजनवी । तुम दोनों सड़क पर मिले हो । संयोग से । और वह महान है कि उसने तुम्हारे प्रेम को स्वीकार किया । उसके प्रति कृतज्ञ रहो । और जिस तरह से जीना चाहती है । उसे उस तरह से जीने दो । और तुम जिस तरह से जीना चाहते हो । उस तरह से जीवन जीओ । तुम्हारी जीवन शैली में कोई हस्तक्षेप नहीं करे । इसे ही स्वतंत्रता कहते हैं । तब प्रेम तुम्हें कम तनावपूर्ण । कम चिंताग्रस्त होने । कम क्रुद्ध । और अधिक प्रेसन्न होने में सहायक होगा ।
दुनिया में ठीक इसका उलटा हो रहा है । प्रेम काफी दुख दर्द देता है । और ऐसे भी लोग हैं । जो अंततः निर्णय ले लेते हैं कि किसी से प्रेम न करना बेहतर है । वे अपने हृदय के द्वार को बंद कर देते हैं । क्योंकि यह केवल नरक रह जाता । और कुछ भी नहीं ।
लेकिन प्रेम के लिए द्वार बंद करने का अर्थ है । वास्तविकता के लिए द्वार बंद करना । अस्तित्व के लिए द्वार बंद करना । इसलिए मैं इसका समर्थन नहीं करूंगा । मैं कहूंगा कि प्रेम के संपूर्ण स्वरूप को बदल दो । तुमने प्रेम को बड़ी विचित्र परिस्थिति में धकेल दिया । इस परिस्थिति को बदलो
प्रेम को अपनी आध्यात्मिक उन्नति में सहायक बनने दो । प्रेम को अपने हृदय और साहस का पोषण बनने दो । ताकि तुम्हारा हृदय किसी व्यक्ति के प्रति ही नहीं । बल्कि संपूर्ण विश्व के प्रति खुल सके ।

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