सोमवार, नवंबर 21, 2011

परमात्मा भी मिल जाएगा तो भी तुम मांगोगे दण्ड ही

स्वार्थ शब्द का अर्थ समझते हो ? शब्द बड़ा प्यारा है । लेकिन गलत हाथों में पड़ गया है । स्वार्थ का अर्थ होता है - आत्मार्थ । अपना सुख । स्व का अर्थ । तो मैं तो स्वार्थ शब्द में कोई बुराई नहीं देखता । मैं तो बिलकुल पक्ष में हूं । मैं तो कहता हूं । धर्म का अर्थ ही स्वार्थ है । क्योंकि धर्म का अर्थ स्वभाव है ।
और 1 बात खयाल रखना कि जिसने स्वार्थ साध लिया । उससे परार्थ सधता है । जिससे स्वार्थ ही न सधा । उससे परार्थ कैसे सधेगा । जो अपना न हुआ । वह किसी और का कैसे होगा । जो अपने को सुख न दे सका । वह किसको सुख दे सकेगा । इसके पहले कि तुम दूसरों को प्रेम करो । मैं तुम्हें कहता हूं । अपने को प्रेम करो । इसके पहले कि तुम दूसरों के जीवन में सुख की कोई हवा ला सको । कम से कम अपने जीवन में तो हवा ले आओ । इसके पहले कि दूसरे के अंधेरे जीवन में प्रकाश की किरण उतार सको । कम से कम अपने अंधेरे में तो प्रकाश को निमंत्रित करो । इसको स्वार्थ कहते हो । चलो स्वार्थ ही सही । शब्द से क्या फर्क पड़ता है । लेकिन यह स्वार्थ बिलकुल जरूरी है । यह दुनिया ज्यादा सुखी हो जाए । अगर लोग ठीक अर्थों में स्वार्थी हो जाएं ।
और जिस आदमी ने अपना सुख नहीं जाना । वह जब दूसरे को सुख देने की कोशिश में लग जाता है । तो बड़े खतरे होते हैं । उसे पहले तो पता नहीं कि सुख क्या है ? वह जबर्दस्ती दूसरे पर सुख थोपने लगता है । जिस सुख का उसे भी अनुभव नहीं हुआ । तो करेगा क्या ? वही करेगा । जो उसके जीवन में हुआ है ।
समझो कि तुम्हारे मां बाप ने तुम्हें 1 तरह की शिक्षा दी । तुम mussalman घर में पैदा हुए कि हिंदू घर में पैदा हुए  कि जैन घर में । तुम्हारे मां बाप ने जल्दी से तुम्हें jain  हिंदू या मुसलमान बना दिया । उन्होंने यह सोचा ही नहीं कि उनके जैन होने से । हिंदू होने से उन्हें सुख मिला है ? नहीं । वे एकदम तुम्हें सुख देने में लग गए । तुम्हें हिंदू बना दिया । मुसलमान बना दिया । तुम्हारे मां बाप ने तुम्हें धन की दौड़ में लगा दिया । उन्होंने यह सोचा भी नहीं 1 भी बार कि हम धन की दौड़ में जीवन भर दौड़े । हमें धन मिला है ? धन से सुख मिला है ? उन्होंने जो किया था । वही तुम्हें सिखा दिया । उनकी भी मजबूरी है । और कुछ सिखाएंगे भी क्या ? जो हम सीखे होते हैं । उसी की शिक्षा दे सकते हैं । उन्होंने अपनी सारी बीमारियां तुम्हें सौंप दीं । तुम्हारी धरोहर बस इतनी ही है । उनके मां बाप उन्हें सौंप गए थे बीमारियां । वे तुम्हें सौंप गए । तुम अपने बच्चों को सौंप जाओगे ।
कुछ स्वार्थ कर लो । कुछ सुख पा लो । ताकि उतना तुम अपने बच्चों को दे सको । उतना तुम अपने पड़ोसियों को दे सको । यहां हर आदमी दूसरे को सुखी करने में लगा है । और यहां कोई सुखी है नहीं । जो स्वाद तुम्हें नहीं मिला । उस स्वाद को तुम दूसरे को कैसे दे सकोगे ? असंभव है ।
मैं तो बिलकुल स्वार्थ के पक्ष में हूं । मैं तो कहता हूं । मजहब मतलब की बात है । इससे बड़ा कोई मतलब नहीं है । धर्म यानी स्वार्थ । लेकिन बड़ी अपूर्व घटना घटती है । स्वार्थ की ही बुनियाद पर परार्थ का मंदिर खड़ा होता है ।
तुम जब धीरे धीरे अपने जीवन में शांति । सुख । आनंद की झलकें पाने लगते हो । तो अनायास ही तुम्हारा जीवन दूसरों के लिए उपदेश हो जाता है । तुम्हारे जीवन से दूसरों को इंगित और इशारे मिलने लगते हैं । तुम अपने बच्चों को वही सिखाओगे । जिससे तुमने शांति जानी । तुम फिर प्रतिस्पर्धा न सिखाओगे । प्रतियोगिता न सिखाओगे । संघर्ष वैमनस्य न सिखाओगे  । तुम उनके मन में जहर न डालोगे ।
इस दुनिया में अगर लोग थोड़े स्वार्थी हो जाएं । तो बड़ा परार्थ हो जाए । अब तुम कहते हो कि क्या ऐसी स्थिति में ध्यान आदि करना निपट स्वार्थ नहीं है ?
निपट स्वार्थ है । लेकिन स्वार्थ में कहीं भी कुछ बुरा नहीं है । अभी तक तुमने जिसको स्वार्थ समझा है । उसमें स्वार्थ भी नहीं है । तुम कहते हो । धन कमाएंगे । इसमें स्वार्थ है । पद पा लेंगे । इसमें स्वार्थ है । बड़ा भवन बनाएंगे । इसमें स्वार्थ है । मैं तुमसे कहता हूं । इसमें स्वार्थ कुछ भी नहीं है । मकान बन जाएगा । पद भी मिल जाएगा । धन भी कमा लिया जाएगा । अगर पागल हुए । तो सब हो जाएगा । जो तुम करना चाहते हो । मगर स्वार्थ हल नहीं होगा । क्योंकि सुख न मिलेगा । और स्वयं का मिलन भी नहीं होगा । और न जीवन में कोई अर्थवत्ता आएगी । तुम्हारा जीवन व्यर्थ ही रहेगा । कोरा । जिसमें कभी कोई वर्षा नहीं हुई । जहां कभी कोई अंकुर नहीं फूटे । कभी कोई हरियाली नहीं । और कभी कोई फूल नहीं आए । तुम्हारी वीणा ऐसी ही पड़ी रह जाएगी । जिसमें कभी किसी ने तार नहीं छेड़े । कहां का अर्थ । और कहां का स्व ।
तुमने जिसको स्वार्थ समझा है । उसमें स्वार्थ नहीं है । सिर्फ मूढ़ता है । और जिसको तुम स्वार्थ कहकर कहते हो कि कैसे मैं करूं ? मैं तुमसे कहता हूं । उसमें स्वार्थ है । और परम समझदारी का कदम भी है । तुम यह स्वार्थ करो । इस बात को तुम जीवन के गणित का बहुत आधारभूत नियम मान लो कि अगर तुम चाहते हो । दुनिया भली हो । तो अपने से शुरू कर दो । तुम भले हो जाओ ।
फिर तुम कहते हो । परमात्मा मुझे यदि मिले भी । तो उससे अपनी शांति मांगने के बजाय मैं उन लोगों के लिए दंड ही मांगना पसंद करूंगा । जिनके कारण संसार में शोषण है । दुख है । और अन्याय है ।
क्या तुम सोचते हो । तुम उन लोगों में सम्मिलित नहीं हो ? क्या तुम सोचते हो । वे लोग कोई और लोग हैं ? तुम उन लोगों से भी तो पूछो कभी । वे भी यही कहते हुए पाए जाएंगे कि दूसरों के कारण । कौन है । दूसरा यहां ? किसकी बात कर रहे हो ? किसको दंड दिलवाओगे ? तुमने शोषण नहीं किया है ? तुमने दूसरे को नहीं सताया है ? तुम दूसरे की छाती पर नहीं बैठ गए हो । मालिक नहीं बन गए हो ? तुमने दूसरों को नहीं दबाया है ? तुमने वही सब किया है । मात्रा में भले भेद हों । हो सकता है । तुम्हारे शोषण की प्रक्रिया बहुत छोटे दायरे में चलती हो । लेकिन चलती है । तुम जी न सकोगे । तुम अपने से नीचे के आदमी को उसी तरह सता रहे हो । जिस तरह तुम्हारे ऊपर का आदमी तुम्हें सता रहा है । यह सारा जाल जीवन का शोषण का जाल है । इसमें तुम एकदम बाहर नहीं हो । दंड किसके लिए मांगोगे ?
और जरा खयाल करना । दंड भी तो दुख ही देगा दूसरों को । तो तुम दूसरों को दुखी ही देखना चाहते हो । परमात्मा भी मिल जाएगा । तो भी तुम मांगोगे दंड ही । दूसरों को दुख देने का उपाय ही । तुम अपनी शांति तक छोड़ने को तैयार हो ।
इसे थोड़ा समझना पड़ेगा । और इसे हम न समझ पाएं । तो ईशावास्य के पहले और अंतिम सूत्र को भी नहीं समझ पाएंगे । 1 चित्रकार 1 चित्र बनाता है । अगर हम हिसाब लगाने बैठें । तो रंगों की कितनी कीमत होती है ? कुछ ज्यादा नहीं । कैनवस की कितनी कीमत होती है ? कुछ ज्यादा नहीं । लेकिन कोई भी श्रेष्ठ कृति । कोई भी श्रेष्ठ चित्र । रंग और कैनवस का जोड़ नहीं है । जोड़ से कुछ ज्यादा है । something more । 1 कवि 1 गीत लिखता है । उसके गीत में जो भी शब्द होते हैं । वे सभी शब्द सामान्य होते हैं । उन शब्दों को हम रोज बोलते हैं । शायद ही उस कविता में एकाध ऐसा शब्द मिल जाए । जो हम न बोलते हों । न भी बोलते हों । तो परिचित तो होते हैं । फिर भी कोई कविता शब्दों का सिर्फ जोड़ नहीं है । शब्दों के जोड़ से कुछ ज्यादा है - समथिंग मोर । 1 व्यक्ति सितार बजाता है । सितार को सुनकर हृदय पर जो परिणाम होते हैं । वे केवल ध्वनि के आघात नहीं हैं । ध्वनि के आघात से कुछ ज्यादा हम तक पहुंच जाता है । इसे ऐसा समझें । 1 व्यक्ति आंख बंद करके आपके हाथ को प्रेम से छूता है । स्पर्श वही होता है । वही व्यक्ति क्रोध से भरकर आपके हाथ को छूता है । स्पर्श वही होता है । जहां तक स्पर्श के शारीरिक मूल्यांकन का सवाल है । दोनों स्पर्श में कोई बुनियादी फर्क नहीं होता । फिर भी जब कोई प्रेम से भरकर हृदय को छूता है । तो उसी छूने में से कुछ निकलता है । जो बहुत भिन्न है । और जब कोई क्रोध से छूता है । तो कुछ निकलता है । जो बिलकुल और है । और कोई अगर बिलकुल निष्पक्षता से । तटस्थता से छूता है । तो कुछ भी नहीं निकलता है । छूना 1 सा है । स्पर्श 1 सा है । अगर हम भौतिकशास्त्री से पूछने जाएंगे । तो वह कहेगा कि हाथ पर 1 आदमी ने हाथ को छुआ । कितना दबाव पड़ा । दबाव नापा जा सकता है । हाथ पर कितना विद्युत का आघात पड़ा । वह भी नापा जा सकता है । 1 हाथ से दूसरे हाथ में कितनी ऊष्मा । कितनी गर्मी गई । वह भी नापी जा सकती है । लेकिन वह ऊष्मा । वह हाथ का दबाव । किसी भी रास्ते से बता न सकेगा कि जिस आदमी ने छुआ । उसने क्रोध से छुआ था कि प्रेम से छुआ था । फिर भी स्पर्श के भेद हम अनुभव करते हैं । निश्चित ही स्पर्श । केवल हाथ की गर्मी । हाथ का दबाव । विद्युत के प्रभाव का जोड़ नहीं है । कुछ ज्यादा है । जीवन कुछ श्रेष्ठतर गणित पर निर्भर है । यहां जिन चीजों को हमने जोड़ा था । उनसे नई चीज पैदा हो जाती है । उनसे श्रेष्ठतर का जन्म हो जाता है । उनसे महत्वपूर्ण पैदा हो जाता है । क्षुद्रतम से भी महत्वपूर्ण पैदा हो जाता है । जिंदगी साधारण गणित नहीं है । बहुत श्रेष्ठतर । गहरा । सूक्ष्म गणित है । ऐसा गणित है । जहां आंकड़े बेकार हो जाते हैं । जहां गणित के जोड़ और घटाने के नियम बेकार हो जाते हैं । और जिस आदमी को गणित के पार । जिंदगी के रहस्य का पता नहीं है । उस आदमी को जिंदगी का कोई भी पता नहीं है ।

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