सोमवार, नवंबर 21, 2011

न ही मौत आयेगी तो पूछकर आयेगी

हरिः ॐ । ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत । तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः मा गृधः कस्यस्विद्धनम । 1
जगत में जो कुछ स्थावर जंगम संसार है । वह सब ईश्वर के द्वारा आच्छादनीय है । उसके त्याग भाव से तू अपना पालन कर । किसी के धन की इच्छा न कर ।1 ।
ईशावास्य उपनिषद की आधारभूत घोषणा । सब कुछ परमात्मा का है । इसीलिए ईशावास्य नाम है ।  ईश्वर का है । सब कुछ ।
मन करता है । मानने का कि हमारा है । पूरे जीवन इसी भ्राँति में हम जीते हैं । कुछ हमारा है । मालकियत । स्वामित्व । मेरा है । ईश्वर का है । सब कुछ । तो फिर मेरे मैं को खड़े होने की कोई जगह नहीं रह जाती ।
ध्यान रहे । अहंकार भी निर्मित होने के लिए आधार चाहता है । मैं को भी खड़ा होने के लिए मेरे का सहारा चाहिए । मेरे का सहारा न हो । तो मैं को निर्मित करना असंभव है । साधारणतः देखने पर लगता है कि मैं पहले है । मेरा बाद में है । असलियत उलटी है । मेरा पहले निर्मित करना होता है । तब उसके बीच में मैं का भवन निर्मित होता है ।
सोचें । आपके पास जो जो भी ऐसा है । जिसे आप कहते हैं मेरा । वह छीन लिया जाए सब । तो आपके पास मैं भी बच नहीं रहेगा । मेरे का जोड़ है मैं । मेरा धन । मेरा मकान । मेरा धर्म । मेरा मंदिर । मेरी मस्जिद । मेरा पद । मेरा नाम । मेरा कुल । मेरा वंश । इन सारे लाखों मेरे के बीच में मैं निर्मित होता है । एक-एक मेरे को हम गिराते चले जाएं । तो मैं की भूमि छिनती चली जाती है । अगर एक भी मेरा न बचे । तो मैं के बचने की कोई जगह नहीं रह जाती ।
मैं के लिए मेरे का नीड़ चाहिए । निवास चाहिए । घर चाहिए । मैं के लिए मेरे के बुनियादी पत्थर चाहिए । अन्यथा मैं का पूरा मकान गिर जाता है ।
ईशावास्य की पहली घोषणा उस पूरे मकान को गिरा देने वाली है । कहता है ऋषि: । सब कुछ परमात्मा का है । मेरे का कोई उपाय नहीं । मैं भी अपने को मेरा कह सकूं । इसका भी उपाय नहीं । कहता हूं अगर । तो नाजायज । अगर कहता ही चला जाता हूं । तो विक्षिप्त । मैं भी मेरा नहीं हूं । और तो सब ठीक ही है ।
इसे 2-3 दिशाओं से समझने की कोशिश करनी जरूरी है ।
पहला तो । आप जन्मते हैं । मैं जन्मता हूं । लेकिन मुझसे कोई पूछता नहीं  । मेरी इच्छा कभी जानी नहीं जाती कि मैं जन्मना चाहता हूं । जन्म मेरी इच्छा । मेरी स्वीकृति पर निर्भर नहीं है । मैं जब भी अपने को पाता हूं जन्मा हुआ पाता हूं । जन्मने के पहले मेरा कोई होना नहीं है ।
इसे ऐसा सोचें । आप 1 मकान बनाते हैं । मकान से पूछते नहीं कि तू बनना भी चाहता है । या नहीं बनना चाहता है । मकान की कोई मर्जी नहीं । आप बनाते हैं । मकान बन जाता है । कभी आपने सोचा कि आपसे भी तो आपकी मर्जी कभी नहीं पूछी गई है । ईश्वर जन्माता है । आप जन्म जाते हैं । god बनाता है । आप बन जाते हैं । मकान को भी होश आ जाए । तो वह कहे - मैं । मकान को भी होश आ जाए । तो वह बनाने वाले को मालिक नहीं मानेगा । मकान भी कहेगा कि बनाने वाला मेरा नौकर है । मुझे बनाया है इसने । मेरा साधन है । मेरी सेवा की है । मैं बनना चाहता था ।
लेकिन मकान को होश नहीं है । आदमी को होश है । और कौन जाने कि मकान को होश नहीं है । हो भी सकता है । होश के भी हजार तल हैं ।
आदमी का होश का 1 ढंग है । 1 तरह की कांशसनेस है । जरूरी नहीं है । वैसी ही कांशसनेस सबकी हो । मकान की और तरह की हो सकती है । पत्थर की और तरह की हो सकती है । पौधे की और तरह की हो सकती है । वे भी । हो सकता है । अपने अपने मैं में जीते हों । और माली जब पौधे में पानी डालता हो । तो पौधा यह न सोचता हो कि माली मुझे जन्मा रहा है । पौधा यही सोचता हो कि मैं माली की सेवाएं लेने का अनुगह कर रहा हूं । कृपा है मेरी कि सेवाएं ले लेता हूं । यद्यपि पौधे से कोई कभी पूछने नहीं गया कि तुझे जन्मना भी है ।
जो जन्म हमारी इच्छा के बिना है । उसे मेरा कहना एकदम नासमझी है । जिस जन्म के पहले मुझसे पूछा ही नहीं जाता कभी । उसे मेरे कहने का क्या अर्थ है ? न ही मौत आएगी । तो पूछकर आएगी । न ही मौत पूछेगी कि क्या इरादे हैं ? चलते हैं । नहीं चलते हैं ? आएगी । और बस आ जाएगी । ऐसे ही अनजानी जैसा जन्म आता है । ऐसे ही बिना पूछे । द्वार पर दस्तक दिए बिना । बिना किसी पूर्व सूचना के । बिना आगाह किए । बस चुपचाप खड़ी हो जाएगी । और कोई विकल्प नहीं छोड़ती । कोई आल्टरनेटिव नहीं । कोई चुनाव नहीं । कोई च्वायस नहीं । यह भी नहीं कि क्षण भर रुक जाना चाहूं । तो रुक सकूं ।
तो जिस मौत में । मेरी इतनी भी मर्जी नहीं है । उसे मेरी मौत कहना बिलकुल पागलपन है । जिस जन्म में मेरी मर्जी नहीं है । वह जन्म मेरा नहीं है । जिस मौत में मेरी मर्जी नहीं है । वह मौत मेरी नहीं है । और उन दोनों के बीच में जो जीवन है । वह मेरा कैसे हो सकता है ? उन दोनों के बीच में जिस जीवन को हम भरते हैं । जब उसके दोनों छोर मेरे नहीं हैं । दोनों बुनियादी छोर मेरे नहीं हैं । दोनों अनिवार्य छोर मेरे नहीं हैं । जिनके बिना मैं हो भी नहीं सकता । तो बीच का जो भराव है । वह भी धोखा है । डिसेप्शन है । और उसे हम भरते हैं । और हम मौत और जन्म को बिलकुल भूल जाते हैं ।
अगर हम मनस्विद से पूछें तो वह कहेगा । हम जानकर भूल जाते हैं । क्योंकि बड़े दुखद स्मरण हैं ये । मेरा जन्म भी मेरा नहीं है । तो कितना दीन हो जाता हूं । मेरी मृत्यु भी मेरी नहीं है । तो छिन गया सब । कुछ बचा नहीं । मेरे हाथ रिक्त और खाली हो गए । राख बची । और इन दोनों के बीच में जिस जीवन के लंबे सेतु को मैं निर्मित करूंगा । 1 नदी पर हम पुल बनाते हैं । बिज बनाते हैं । न यह किनारा हमारा है । न वह किनारा हमारा है । न इस किनारे पर रखे हुए बिज के । सेतु की बुनियाद हमारी है । न उस तरफ की बुनियाद हमारी है । तो यह बीच की नदी पर जो फैला हुआ पुल है । वह भी हमारा कैसे हो सकता है ? आधार जिसके हमारे नहीं हैं । वह हमारा नहीं हो सकता है । इसलिए हम जानकर भुला देते हैं ।

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