सोमवार, नवंबर 21, 2011

अगर इतना बड़ा संसार बनाकर परमात्मा पीछे गृहस्थ नहीं बन जाता

इस सूत्र को ठीक से कोई साधक समझ ले । और मैं तो आपको इसीलिए कह रहा कि आपको साधना की दृष्टि से खयाल में आ जाए । अगर साधना की दृष्टि से खयाल में आ जाए । तो आप सब करके भी अकर्ता रह जाते हैं । आपने जो भी किया । अगर परमात्मा इतना करके और पीछे अछूता रह जाता है । तो आप भी सब करके पीछे अछूते रह जाते हैं । लेकिन इस सत्य को जानने की बात है । इसको पहचानने की बात है ।
अगर इतना बड़ा संसार बनाकर परमात्मा पीछे गृहस्थ नहीं बन जाता । तो एक छोटा सा घर बनाकर एक आदमी गृहस्थ बन जाए । पागलपन है । इतने विराट संसार के जाल को खड़ा करके अगर परमात्मा वैसे का वैसा रह जाता है । जैसा था । तो आप एक दुकान छोटी सी चलाकर और नष्ट हो जाते हैं ? कहीं कुछ भूल हो रही है । कहीं कुछ भूल हो रही है । कहीं अनजाने में आप अपने कर्मों के साथ अपने को एक आइडेंटिटी कर रहे हैं । एक मान रहे हैं । तादात्म्य कर रहे हैं । आप जो कर रहे हैं । समझ रहे हैं कि मैं कर रहा हूं । बस कठिनाई में पड़ रहे हैं । जिस दिन आप इतना जान लेंगे कि जो हो रहा है । वह हो रहा है । मैं नहीं कर रहा हूं । उसी दिन आप संन्यासी हो जाते हैं ।
गृहस्थ मैं उसे कहता हूं । जो सोचता है । मैं कर रहा हूं । संन्यासी मैं उसे कहता हूं । जो कहता है । हो रहा है । कहता ही नहीं । क्योंकि कहने से क्या होगा ? जानता है । जानता ही नहीं । क्योंकि अकेले जानने से क्या होगा ? जीता है ।
इसे देखें । मेरे समझाने से शायद उतना आसानी से दिखाई न पड़े । जितना प्रयोग करने से दिखाई पड़ जाए । कोई एक छोटा सा काम करके देखें । और पूरे वक्त जानते रहें कि हो रहा है । मैं नहीं कर रहा हूं । कोई भी काम करके देखें । खाना खाकर देखें । रास्ते पर चलकर देखें । किसी पर क्रोध करके देखें । और जानें कि हो रहा है । और पीछे खड़े देखते रहें कि हो रहा है । और तब आपको इस सूत्र का राज मिल जाएगा । इसकी सीक्रेट - की । इसकी कुंजी आपके हाथ में आ जाएगी । तब आप पाएंगे कि बाहर कुछ हो रहा है । और आप पीछे अछूते वही के वही हैं । जो करने के पहले थे । और जो करने के बाद भी रह जाएंगे । तब बीच की घटना सपने की जैसी आएगी । और खो जाएगी ।
संसार परमात्मा के लिए एक स्वपन से ज्यादा नहीं है । आपके लिए भी संसार एक स्वपन हो जाए । तो आप भी परमात्मा से भिन्न नहीं रह जाते । फिर दोहराता हूं । संसार परमात्मा के लिए एक स्वपन से ज्यादा नहीं है । और जब तक आपके लिए संसार एक स्वपन से ज्यादा है । तब तक आप परमात्मा से कम होंगे । जिस दिन आपको भी संसार एक स्वपन जैसा हो जाएगा । उस दिन आप परमात्मा हैं । उस दिन आप कह सकते हैं । अहं बृह्मास्मि । मैं बृह्म हूँ ।
जीवन प्रतिपल नया है । जीवन हर सांस में बदल रहा है । लेकिन हम और हमारा समाज । विशेषकर भारत में । ठहर सा गया है । इसमें कोई प्रवाह नहीं । कोई गतिशीलता नहीं । उसका दुष्परिणाम यह हुआ कि हम जीवन से ही कट गये हैं । हम पुराने से पुराने हो गये हैं । एकदम ठूंठ । हम विकासमान विश्व के प्रवाह से अलग थलग हो गये हैं । और हम बुरी तरह पिछड़ गये हैं ।
इस पुस्तक में ओशो हमें झकझोरते हुए कहते हैं । सारी दुनिया में नए को लाने का आमंत्रण है । हम नये को स्वीकार करते हैं । ऐसे । जैसे कि पराजय हो । इसीलिए 5000 वर्ष पुरानी संस्कृति । 300 वर्ष । 50 वर्ष पुरानी संस्कृतियों के सामने हाथ जोड़ कर भीख मांगती है । और हमें कोई शर्म भी मालूम नहीं होती है । हम 5000 वर्षों में इस योग्य भी न हो सके कि गेहूं पूरा हो सके । कि मकान पूरे हो सकें । अमरीका की कुल उम्र 300 वर्ष है । 300 वर्ष में अमरीका इस योग्य हो गया । और कि सारी दुनिया के पेट को भरे ।
और रूस की उम्र तो केवल 70 वर्ष ही है । 70 वर्ष की उम्र में रूस गरीब मुल्कों की कतार से हटकर अमीर मुल्कों की आखिरी कतार में खड़ा हो गया है । 70 वर्ष पहले । जिसके बच्चे भूखे थे । आज उसके बच्चे चांद तारों पर जाने की योजनाएं बना रहे हैं । 70 सालों में क्या हो गया है ? कोई जादू सीख गये हैं वे ? जादू नहीं सीख गया है । उन्होंने 1 राज़ सीख लिया है कि पुराने से चिपके रहने वाली कौम धीरे धीरे मरती है । सड़ती है, गलती है ।
भारत में हमारा चिंतन पुरातनवादी है । लेकिन हम एक बात भूल गए हैं कि यह जीवन का स्वभाव नहीं है । जीवन का विराट प्रवाह प्रतिपल परिवर्तनशील है । प्रगतिशील है । जीवन निरंतर नये प्रश्न खड़े करता है । नयी समस्याएं लाता है । लेकिन हम उन प्रश्नों और समस्याओं के उत्तर और समाधान गीता और कुरान में ढूंढ़ते हैं । इन ग्रंथों को कंठस्थ करके हम ज्ञानी तो हो जाते हैं । लेकिन हमारी एक भी समस्या का समाधान नहीं हुआ है ।
ओशो कहते हैं कि हमें फिर से अज्ञानी होने की हिम्मत जुटानी होगी । और यह सूत्र साधना के जगत में तो सर्वाधिक जरूरी है । हम मन के भीतर सब संगृहीत ज्ञान से मुक्त हों । पूरी तरह शून्य हों । मन उसे पूरी तरह विदा कर दें ।  पुराना जाना पहचाना होत है । इसलिए मन उससे चिपके रहने का आग्रह करता है । उसमें उसकी सुरक्षा है ।
जीवन प्रतिपल न केवल नया है । बल्कि अनजाना भी है । मन को इसका सामना करने में असुरक्षा प्रतीत होती है । इसलिए हज़ारों वर्षों से हमारे देश को नये का साक्षात्कार करने का साहस नहीं रहा । आक्रमणकारी आते रहे । इसे गुलाम बनाते रहे । और हम अपने घरों के बंद कमरों में बैठे गीता और वेद पढ़ते रहे । यज्ञ हवन करते रहे । और जो दुर्गति होनी भी । वह हुई ।
जीवन हमारी प्रतिपल प्रतीक्षा कर रहा है । हम इससे पलायन न करें । आओ हम जीवन के साथ लयबद्ध हों । नाचें । गाएं । और उत्सव मनाएं । और स्मरण रहे । ओशो कहते हैं । अगर हम अस्तित्व के सत्य को खोजने चले हैं । तो सत्य भी आतुर है कि कोई आवश्यकता नहीं है । जितना विराट अज्ञात हो । उसमें उतरने से उतनी ही विराट आत्मा तुम्हारी हो जाएगी । जितनी बड़ी चुनौती स्वीकार करोगे । उतना ही बड़ा तुम्हारा नव जन्म हो जाएगा । तैयारी हो जीवन के आनंद को अंगीकार करने की । तो आओ । द्वार खुले हैं । तो आओ । स्वागत है । तो आओ । बुलावा है । निमंत्रण है ।

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