सोमवार, नवंबर 21, 2011

लेकिन स्वतंत्र विचार की तो जन्म के पूर्व ही हत्या कर दी जाती है

शिक्षक के माध्यम से मनुष्य के चित्त को परतंत्रताओं की अत्यंत सूक्ष्म जंजीरों में बांधा जाता रहा है । यह सूक्ष्म शोषण बहुत पुराना है । शोषण के अनेक कारण हैं । धर्म हैं । धार्मिक गुरु हैं । राजतंत्र हैं । समाज के न्यस्त स्वार्थ हैं । धनपति हैं । सत्ताधिकारी हैं ।
सत्ताधिकारी ने कभी भी नहीं चाहा है कि मनुष्य में विचार हो । क्योंकि जहां विचार है । वहां विद्रोह का बीज है । विचार मूलतः विद्रोह है । क्योंकि विचार अंधा नहीं है । विचार के पास अपनी आंखें हैं । उसे हर कहीं नहीं ले जाया जा सकता । उसे हर कुछ करने और मानने को राजी नहीं किया जा सकता है । उसे अंधानुयायी नहीं बनाया जा सकता है । इसलिए सत्ताधिकारी विचार के पक्ष में नहीं हैं । वे विश्वास के पक्ष में हैं । क्योंकि विश्वास अंधा है । और मनुष्य अंधा हो । तो ही उसका शोषण हो सकता है । और मनुष्य अंधा हो । तो ही उसे स्वयं उसके ही अमंगल में संलग्न किया जा सकता है ।
मनुष्य का अंधापन उसे सब भांति के शोषण की भूमि बना देता है । इसलिए विश्वास सिखाया जाता है । आस्था सिखाई जाती है । श्रद्धा सिखाई जाती है । धर्मों ने यही किया है । राजनीतिज्ञों ने यही किया है । विचार से सभी भांति के सत्ताधिकारियों को भय है । विचार जागृत होगा । तो न तो वर्ण हो सकते हैं । न वर्ग हो सकते हैं । धन का शोषण भी नहीं हो सकता है । और शोषण को पिछले जन्मों के पाप पुण्यों के आधार पर भी नहीं समझाया और बचाया जा सकता है ।
विचार के साथ आएगी क्रांति । सब तलों पर । और सब संबंधों में । राजनीतिज्ञ भी उसमें नहीं बचेंगे । और राष्ट्रों की सीमाएं भी नहीं बचेंगी । मनुष्य को मनुष्य से तोड़ने वाली कोई दीवाल नहीं बच सकती है । इससे विचार से भय है । पूंजीवादी राजनीतिज्ञों को भी । साम्यवादी राजनीतिज्ञों को भी । और इस भय से सुरक्षा के लिए शिक्षा के ढांचे की ईजाद हुई है । यह तथाकथित शिक्षा सैकड़ों वर्षों से चल रहे एक बड़े षडयंत्र का हिस्सा है । धर्म पुरोहित पहले इस पर हावी थे । अब राज्य हावी है ।
विचार के अभाव में व्यक्ति निर्मित ही नहीं हो पाता है । क्योंकि व्यक्तित्व की मूल आधारशिला ही उसमें अनुपस्थित होती है । व्यक्तित्व की मूल आधारशिला क्या है ? क्या विचार की स्वतंत्र क्षमता ही नहीं ? लेकिन स्वतंत्र विचार की तो जन्म के पूर्व ही हत्या कर दी जाती है । गीता सिखाई जाती है । कुरान और बाइबिल सिखाए जाते हैं । कैपिटल और कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो सिखाए जाते हैं । उनके आधार पर । उनके ढांचे में विचार करना भी सिखाया जाता है । ऐसे विचार से ज्यादा मिथ्या और क्या हो सकता है ? ऐसे अंधी पुनरुक्ति सिखाई जाती है । और उसे ही विचार करना कहा जाता है । इसे एक दिशा से और समझने की कोशिश करें ।
सागर हमारे अनुभव में । दिखाई पड़ने वाले । अनुभव में । आंखों । इंद्रियों के जगत में । घटता बढ़ता मालूम नहीं पड़ता । घटता बढ़ता है । बहुत बड़ा है । अनंत नहीं । विराट है । नदियां गिरती रहती हैं । सागर में । बाहर नहीं आतीं । आकाश से बादल पानी को भरते रहते हैं । उलीचते रहते हैं । सागर को । कमी नहीं आती । अभाव नहीं हो जाता । फिर भी घटता है । विराट है । अनंत नहीं है । असीम नहीं है । विराट है सागर । इतनी नदियां गिरती हैं । कोई इंच भर फर्क मालूम नहीं पड़ता । बृह्मपुत्र । और गंगाएं । और ह्वांगहो । और अमेजान । कितना पानी डालती रहती हैं प्रतिपल । सागर वैसा का वैसा रहता है । हर रोज सूरज उलीचता रहता है । किरणों से पानी को । आकाश में जितने बादल भर जाते हैं । वे सब सागर से आते हैं । फिर भी सागर जैसा था । वैसा रहता है । फिर भी मैं कहता हूं कि सागर का अनुभव सच में ही घटने बढ़ने का नहीं है । घटता बढ़ता है । लेकिन इतना बड़ा है कि हमें पता नहीं चलता ।
आकाश हमारे अनुभव में एक दूसरी स्थिति है । सब कुछ आकाश में है । आकाश का अर्थ है । जिसमें सब कुछ है । अवकाश । स्पेस । जिसमें सारी चीजें हैं । ध्यान रहे । इसलिए आकाश किसी में नहीं हो सकता । और अगर हम सोचते हों कि आकाश को भी होने के लिए किसी में होना पड़े । तो फिर हमें एक और महत आकाश की कल्पना करनी पड़े । और फिर हम मुश्किल में पड़ेंगे । फिर जिसको तार्किक कहते हैं । इनफिनिट रिग्स । फिर हम अंतहीन नासमझी में पड़ जाएंगे । क्योंकि फिर वह जो महत आकाश है । वह किसमें होगा ? फिर इसका कोई अंत नहीं होगा । फिर और महत आकाश । फिर फिर वही सवाल होगा ।
नहीं । इसलिए आकाश में सब है । और आकाश किसी में नहीं है । आकाश सबको घेरे हुए है । और आकाश अनघिरा है । आकाश का अर्थ है । जिसमें सब हैं । और जो किसी में नहीं है । इसलिए आकाश के भीतर सब कुछ निर्मित होता रहता है । आकाश उससे बड़ा नहीं हो जाता । और आकाश के भीतर सब कुछ विसर्जित होता रहता है । आकाश उससे छोटा नहीं हो जाता । आकाश जैसा है । वैसा है । जस का तस । ऐज़ इट इज़ । आकाश अपनी सचनेस में । अपनी तथाता में रहता है ।
आप मकान बना लेते हैं । आप महल खड़ा कर लेते हैं । आपका महल गिर जाएगा । कल खंडहर हो जाएगा । मिट्टी होकर नीचे गिर जाएगा । आकाश चूमने वाले महल जमीन पर खो जाएंगे वापस । आकाश को पता भी नहीं चलेगा । आपने जब महल बनाया था । तब आकाश छोटा नहीं हो गया था । आपका जब महल गिर जाएगा । तो आकाश बड़ा नहीं हो जाएगा । आकाश में ही बनता है महल । और आकाश में ही खो जाता है । आकाश में कोई अंतर पैदा इससे नहीं होता है । शायद । आकाश और भी निकटतर । जिस बात को मैं आपको समझाना चाहता हूं । उसके और निकटतर है ।
फिर भी । आकाश कितना ही अछूता मालूम पड़ता हो । कितना ही अस्पर्शित मालूम पड़ता हो । हमारे निर्माण से । फिर भी हमारे साधारण अनुभव में ऐसा आता है कि आकाश कम ज्यादा होता होगा । क्योंकि जहां मैं बैठा हूं । अगर आप वहीं बैठना चाहें । तो नहीं बैठ सकेंगे । इसका मतलब यह हुआ कि जिस आकाश को मैंने घेर लिया । अन्यथा आप भी मेरी जगह बैठ सकते हैं । एक जगह हम एक ही मकान बना सकते हैं । उसी जगह दूसरा मकान न बना सकेंगे । उसी जगह तीसरा तो बिलकुल न बना सकेंगे । क्यों ? क्योंकि जो एक मकान हमने बनाया । उसने आकाश को घेर लिया । अगर आकाश को उसने घेर लिया । तो आकाश किसी खास अर्थ में कम हो गया । इसीलिए तो मकान हमें ऊपर उठाने पड़ रहे हैं । मकान इसीलिए ऊपर उठाने पड़ रहे हैं कि जमीन की सतह पर जो आकाश है । वह कम पड़ता जा रहा है । जमीन के दाम बढ़ते चले जाते हैं । तो मकान ऊपर उठने शुरू हो जाते हैं । क्योंकि नीचे दाम बढ़ने लगते हैं । नीचे का आकाश महंगा होने लगा । भरने लगा । ज्यादा भरने लगा । अब वहां जगह कम रह गई । तो मकान को ऊपर उठाना पड़ता है । जल्दी ही हम मकान को जमीन के नीचे भी ले जाना शुरू करेंगे । क्योंकि ऊपर उठाने की भी सीमा है । ऊपर का आकाश भी भरा जाता है ।
आकाश भी भरता मालूम पड़ता है । और जब भरता है । तो उसका अर्थ है कि उतनी जगह कम हो गई । उतना रिक्त स्थान कम हो गया । उतनी एम्पटी स्पेस कम हो गई । जिस जमीन पर हम बैठे हैं । इस जगह पर अब दूसरी जमीन पैदा नहीं हो सकती । माना कि अनंत आकाश चारों तरफ शून्य की तरह फैला हुआ है । कोई कमी नहीं है । लेकिन इतनी जगह पर तो रुकावट हो गई । इतना आकाश तो कम हुआ । भर गया ।
नहीं । परमात्मा इतना भी नहीं भरता । सागर मैंने कहा कि बहुत छोटा है । परमात्मा के हिसाब से । हमारे हिसाब से बहुत बड़ा है । गंगाओं और बृह्मपुत्रों के हिसाब से बहुत बड़ा है । कोई अंतर नहीं पड़ता । उनके गिरने से । फिर भी अंतर पड़ता है । नापतौल में नहीं आता । लेकिन अंतर पड़ता है । आकाश और भी बड़ा है । हमारे सागरों महासागरों से बहुत बड़ा है । फिर भी । आकाश भी भर जाता मालूम होता है ।

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