गुरुवार, अगस्त 19, 2010

जो आपने फ़रमाया


आपके विचार ।
HUMMING WORDS PUBLISHERS पोस्ट " कृपया इस प्रश्न का जबाब शीघ्र दें । " पर Get your book published.. become an author..let the world know of your creativity. You can also get published your own blog book!www.hummingwords.in
Shah Nawaz गंगा अवतरण । महत्वपूर्ण जानकारियों से भरे हुए लेख के लिए धन्यवाद ! आलोक मोहन पोस्ट " परमात्मा ने सृष्टि का निर्माण क्यों किया ???? " पर अक्सर मै सोचता हू । मै कौन हू ? मेरा क्या वजूद है ? क्या मै शरीर हू ? यह पेट मेरा है । यह मेरा पैर है । यह मेरी गर्दन है । यह मेरा मस्तक है आदि । पर ये शरीर तो मिला है । और मिली हुई चीज कभी अपनी नही होती । अपनी चीज तो अपनी होती है । वह कभी नही खोती । सुरु से लेकर अंत तक रहती है । पर मिली चीज हमेशा साथ नही रहती ,बिछुड़ जाती है । जब कुछ भी नही था और जब कुछ भी नही होगा । तब भी मै रहुगा । शरीर तो बीच में मिला है । तो ये मेरा कैसे हो गया । जैसे मेरा मकान(घर) ....मै मकान में जाता हू । पर मेरे साथ मकान नही जाता । मै और मेरा घर अलग अलग है । जब छोटा था तब ये कुछ अलग था । अब कुछ और ..ये शरीर पल पल बदलता रहता है । और हा ..इस शरीर पर अपना कोई बस भी नही । बस चलता तो हमेशा जवान रहते । कभी कोई बीमारी नही लगती ।ये शरीर संसार के काम आता है । और यही मिट जाता है.। ये नाम । पहचान । जाति । कर्म सब इस शरीर और संसार तक सीमित है । इस संसार से जाने बाद सब ख़तम हो जाता है । फिर मै कौन हू ?
बेनामी पोस्ट " स्थायी ख़ुशी की प्रतीक्षा है ? " पर guru to bahut log bna lete hey.shishy koi wirla hi banta hey. wahi sachidanand ko pata hey. atah yogya bano shishya bano.kalyan ho.
रवि कान्त शर्मा पोस्ट " परमात्मा ने सृष्टि का निर्माण क्यों किया ???? " पर एको अहं बहुष्यामि । ईश्वर की इच्छा हुई कि मैं एक से अनेक हो जाऊँ । इसी इच्छा के कारण सृष्टि की उत्पत्ति हुई । यही इच्छा मनुष्य में होती है । तभी मनुष्य शादी करता है । शादी के बाद एक से अनेक हो जाता है । इसी पर कबीर दास जी ने कहा है । इच्छा काया । इच्छा माया । इच्छा जग उपजाया । कहत कबीर इच्छा विवर्जित । ताका पार न पाया ।
@ अजीव अंदाज में उत्तर दिया आपने शर्मा जी । लेकिन ईश्वर ने शादी नहीं की थी ।
राज भाटिय़ा ने कहा ।
सच्चे साधू संत का संसर्ग । अवगुणों को गुणों मे परिवर्तित कर देता है । सत्य वचन जी । लेकिन सिर्फ़ सच्चे साधुओं का संग । और जो आज मिलते नही । अगर कोई हो आप की नजर में । तो नाम जरुर लिखे । धन्यवाद ।
raghvendramanikpuri पोस्ट " सर्वजीत और कबीर साहेब " पर kabir bahut mahan sant the. Unse koi jit nahi paya. Unke gyan ke bhandar ko samajh pana muskil hai. Ye sadharan logo k bas ki bat nahi hai
aghvendramanikpuri पोस्ट " सर्वजीत और कबीर साहेब " पर जिसके पास जानकारी नही होती । वो घमंडी रहता है । जब समझ आने लगता है । तब घमंड जाने लगता है ।
महेन्द्र मिश्र ने कहा ।
बहुत सटीक । विचार । आभार ।
नीरज गोस्वामी ने कहा ।
विनय जी । आपके ब्लॉग पर पहली बार आना हुआ । बहुत अच्छा लगा । आपके विचार बहुत स्पष्ट और प्रभावशाली हैं । मुझे असली साधू संतों से कोई समस्या नहीं है । लेकिन उनकी गिनती बहुत कम है । ये जो धूनी रमाये डेरा बनाये हुए । तथाकथित साधू हैं । वो दरअसल पाखंडी है । और स्वार्थ साधना में लगे रहते हैं । इनसे मुझे चिढ है । इसीलिए मैं इन सबसे दूर रहता हूँ । मेरा मानना है के यदि आपका मन शांत है । कोई लोभ नहीं है । सबके प्रति दिल में प्रेम है । तो फिर आपको किसी साधू के पास जाने की जरूरत नहीं है । हमारा खुद का स्वार्थ या कष्ट हमें ऐसे ढोंगियों के पास ले जाता है । ये लोग ऐसे परेशान दुखी लोगों का शोषण करते हैं । टी.वी पर रेशमी सिंहासन पर बिराजमान फूलों के राज सिंहासन पर बैठ कर मीठी मीठी बातें करने वाले ये लोग किसी काम के नहीं हैं । आपने ऐसे ही साधू की अच्छी व्याख्या की है । आपको पढ़ कर बहुत आनंद मिला । आपके सीखने के गुण ने भी बहुत प्रभावित किया । मुझे भी कम्यूटर की सर्वप्रथम जानकारी सन दो हज़ार एक में हुई । मैं आज साठ वर्ष की उम्र में भी मुझे कुछ नया सीखने को आतुर रहता हूँ । अपना ब्लॉग भी मैंने इसीलिए शुरू किया है । मैं ग़ज़लें शौक से लिखता हूँ । और मेरे गुरु की उम्र मेरे बेटे से भी कम है । गुरु की उम्र नहीं ज्ञान देखा जाता है ।shama ने कहा ।
Sahee kaha aapne..mai ab akele hee, mujhse jo ban padta hai,karne lagee hun..! shama ने कहा ।
Aapki tippanee ke liye dhanywad ! " sansmaran" blog pe...!Bahut adhik zaroorat hai,is jaagruktaa kee...
शोभना चौरे ने कहा ।
aapne bilkul shi kha hai mainne bhi badi badi sansthaon ke sath kam kiya hai par sabhi jagah log apna matalab nikalate hain .isliye main akele hi apni samrthynusar jitna ban sakta hai kam karti hoon .bina paisa lagaye aur bina paisa liye .
Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said..।
जब जीवन ही क्षणिक है । तो सुख दुख स्थायी कैसे हो सकते हैं ?
@ जीवन ही क्षणिक है । लेकिन जीव ( आत्मा ) हमेशा है । ईश्वर अंश जीव अविनाशी । चेतन अमल सहज सुखराशी ।

शुक्रवार, अगस्त 13, 2010

आज के ज्योतिष में कितना दम है ?

मैंने कई शास्त्रों में युगों की आयु के बारे में अलग अलग पडा था । और लोग मुझसे प्रश्न भी करते थे । कि कलियुग की उमर कितनी है । और कितनी शेष है । अब भी मुझे इस बारे में ठोस जानकारी नहीं है ।
पर आत्मग्यानी संत और मेरे पूज्य गुरुदेव की सभी बातें अभी तक सही ही निकली । उससे मैं उनकी ही
बात को प्रामाणिक मानता हूं । कल शाम 13 अगस्त 2010 को जब महाराज जी मथुरा जा रहे थे । शाम को हम लोगों के आग्रह पर आगरा में रुक गये । तब किसी मौज में महाराज जी ने दो महत्वपूर्ण बातें पौराणिक शोधकर्ताओं हेतु बतायीं । एक तो कलियुग की आयु 28 000 बरस है । और दूसरे इस समय इन्द्र की पदवी पर प्रह्लाद है । वही प्रहलाद जो होलिका दहन के लिये प्रसिद्ध है । मेरी निगाह में ये दो तथ्य भी शोधकर्ताओं के लिये काफ़ी महत्वपूर्ण हैं । अभी में इस बात पर स्पष्ट नहीं हूं कि तीसरे तथ्य में मैंने जो सुना । वो पूरी तरह सही ही था । क्योंकि महाराज जी के साथ अन्य महात्मा भी थे और शिष्य लोग आ गये थे । इसलिये थोडा गम्भीर बातचीत का माहौल नहीं था । फ़िर भी महाराज जी ने तीसरा महत्वपूर्ण तथ्य ये बताया कि एक युग में चौदह मनु होते हैं । खैर ये तीनों तथ्य जो महाराज जी से कभी कभी ही मुश्किल से प्राप्त हो पाते हैं । मैं शोधकर्ताओं हेतु प्रकाशित कर रहा हूं । मैं कभी इस बात के लिये दवाव नहीं देता कि आप मेरी बात पूरी तरह आंख बन्द कर मानें । लेकिन जो संतो के माध्यम से प्राप्त दुर्लभ जानकारी जो मैं आपको देता हूं । उससे कई रहस्य अनायास ही खुल जाते है । क्योंकि आत्मग्यानी संत शास्त्र के हवाले से बात नहीं कहते । बल्कि निज अनुभव ग्यान के आधार पर कहते हैं । कल शाम को एक मजेदार बात ज्योतिष पर भी छिडी । वो बात ये थी कि त्रेता युग में महाराज दशरथ के कुलगुरु वशिष्ठ जिन्हें ज्योतिष का भी अच्छा ग्यान था । के तीन ज्योतिष ग्यान एकदम फ़ेल हुये । पहला । उन्होनें जब कैकयी का दशरथ के लिये विवाह प्रस्ताव आया । तो उन्होंने और अन्य पुरोहितों ने स्पष्ट कहा कि ये लडकी खानदान को बिलकुल मटियामेट कर देगी । लिहाजा विवाह प्रस्ताव नामन्जूर कर दिया गया । लेकिन होनी ज्योतिष से अधिक बलबान होती है । रावण की करामात से दशरथ जो अपनी परम्परा के अनुसार एक पत्नीवृत यानी एक ही विवाह करना चाहते थे । उनके तीन रानियों से एक साथ विवाह हुये । जिनमें कौशल्या और सुमित्रा सगी बहिनें थी । और कैकयी अलग थी । ( इस पूरे विवरण को विस्तार से जानने के लिये मेरी पोस्ट दशरथ के तीन विवाह कैसे हुये ? पढें ) यानी वशिष्ठ का ज्योतिष फ़ेल हो गया । दूसरा । जब राम का सीता के साथ विवाह हुआ । तो वशिष्ठ द्वारा राम सीता की कुन्डली मिलाने पर 36 गुण मिले और विवाह को सब प्रकार से उत्तम बताया गया । यानी सीता सुखी रहेगी । ये जोडा बेहद सफ़ल रहेगा ? ये बात वशिष्ठ का ज्योतिष कह रहा था । जनक के पुरोहितों आदि ने भी कुन्डली का मिलान किया होगा । अब सीता कितनी सुखी रही ? और ये शादी कितनी सफ़ल रही ? ये बताने की शायद आवश्यकता नहीं है ।
तीसरा । जब दशरथ ने राम को राजगद्दी देने का फ़ैसला किया । तब भी वशिष्ठ ने मुहूर्त आदि का मिलान करके उस समय को बहुत उत्तम घडी बताया । जिसमें राजतिलक होना था ? लेकिन यहां भी वशिष्ठ का
ज्योतिष फ़ेल हो गया । गद्दी की जगह वनवास हो गया । वो भी चौदह बरस का । वो भी एक की जगह
तीन तीन को । बाद में राम ने यह प्रश्न वशिष्ठ से किया भी कि आप तो कह रहे थे कि योग अच्छा बन रहा
है । फ़िर बुरा कैसे हो गया ? तब वशिष्ठ ने उत्तर दिया कि विधि का लिखा को मेटनहारा ? अब एक प्रश्न ये उठता है । कि वशिष्ठ अलौकिक ग्यान से कुन्डली को जानते थे और मात्र ज्योतिष किताबों का सहारा नहीं लेते थे । फ़िर भी फ़ेल हो गये । तो ज्योतिष की सार्थकता क्या है ? क्या वशिष्ठ आदि ग्यानियों और अन्य पुरोहितों को दशरथ एन्ड फ़ेमिली पर आने वाले संकट का ज्योतिष में कोई इशारा नहीं था । उपाय नहीं था ? कि उन्हें भी एकाध डायमण्ड बता देते ? कोई पूजा वूजा मन्त्र सन्त्र बता देते ? अब चलते चलते एक बात मेरी भी । एक बार एक मित्र के जरिये एक ज्योतिषी जो जोधपुर रिटर्न यानी जोधपुर से ज्योतिष सीखे हुये थे । मेरे पास आये और बहुत सी बातें बतानें लगे । जिनके जरिये ज्योतिष से हीरा पहनकर गिरता आसमान रोका जा सकता है । मैंने कहा मुझे एक नवजात बच्चे का बीस साल या चालीस साल का भविष्यफ़ल उसकी कुन्डली के सहित बनबाना है । वो खुशी खुशी तैयार हो गये । मैंने कहा । बच्चे की जन्मतिथि 23 मार्च 1969 है । और वो बच्चा मैं ही हूं । मैं अपने चालीस साल के जीवन में क्या क्या घट चुका है ? ये ज्योतिष के द्वारा जानना चाहता हूं । यानी लोग आगे की जानना चाहते हैं ? मैं पीछे की जानना चाहता हूं । और आपको फ़लादेश बताने के लिये सिर्फ़ जन्म तिथि और जन्म स्थान की आवश्यकता ही होती है । ज्योतिषी का मुंह फ़क पड गया । उस समय उच्च स्तर के विद्वान आठ लोग बैठे थे । अतः ज्योतिषी छोटे मोटे तर्क से काम नहीं चला सकते थे । खैर ज्योतिषी जी ने मेरी कुन्डली बनाने से इंकार कर दिया । मैं ज्योतिष का समर्थन या असमर्थन कुछ भी नहीं करता । पर आप ये बताइये कि मैंने जो कहा ।
वो क्या गलत था ? आप ये हिट आयडिया अपनाकर देखिये । और ज्योतिषी से आगे की बजाय पिछला
गुजर चुका समय पूछिये ? आपको पता चल जायेगा । आज के ज्योतिष में कितना दम है ?

वृद्ध व्यक्ति के लिये युवती विष के समान है ।

मनुष्य में ब्राह्मण । तेज में सूर्य । शरीर में सिर । और वृत में सत्य ही श्रेष्ठ है । स्त्री वही श्रेष्ठ है जो मद उन्मत न हो । जिस पर विश्चास कर सकें । वही मित्र है । जिसने अपनी इन्द्रियों को जीत लिया वही पुरुष है । ब्राह्मण का तेज पापाचार करने से नष्ट हो जाता है । दुष्ट स्त्रियों के साहचर्य से कुल नष्ट हो जाता है । मनुष्य को राजा रहित और बहुत से राजाओं के नेतृत्व वाले स्थान पर निवास नही करना चाहिये । इसी प्रकार जहां स्त्रियों का नेतृत्व हो या बाल नेतृत्व हो वहां भी निवास करना अच्छा नहीं होता । कौमार्य अवस्था में स्त्री की रक्षा पिता करता है । युवावस्था में उसकी रक्षा पति करता है । वृद्धावस्था में उसकी रक्षा का भार पुत्र उठाता है । स्त्री स्वतंत्र रहने योग्य नहीं होती । धन के लिये आतुर व्यक्ति का न कोई मित्र है और न कोई बंधु । कामातुर व्यक्ति के लिये न कोई भय है और न लज्जा । चिंता से ग्रस्त प्राणी के लिये न सुख है और न नींद । गरीब । दूसरे के द्वारा भेजा गया दूत । परायी औरत से प्रेम करने वाला । तथा दूसरों का धन चुराने वाले व्यक्ति को नींद नहीं आती । जो व्यक्ति रोग रहित । कर्ज रहित । और स्त्री सम्भोग से दूर रहने की इच्छा वाला होता है । वह सुख की नींद सोता है । आचार को देखकर कुल का ग्यान होता है । भाषा को सुनकर देश का ग्यान होता है । शरीर को देखकर भोजन का ग्यान ( अनुमान ) होता है । समुद्र में वर्षा का होना व्यर्थ है । भरे पेट से भोजन का आग्रह व्यर्थ है । धनी को दान देना व्यर्थ है । नीच के लिये किया गया अच्छा कार्य व्यर्थ है । मुख का विकृत हो जाना । स्वर का भंग हो जाना । दीन भाव आ जाना ।
पसीने से लथपथ शरीर । तथा अत्यन्त भय के चिह्न ये सब चिह्न प्राणी में मत्यु के समय उपस्थित होते हैं । किन्तु याचक के शरीर पर ये चिह्न जीवित ही दिखाई देते हैं । विध्या कुरूप के लिये भी रूप है । विध्या
गुप्त धन है । विध्या प्राणी को साधुवृति वाला तथा सबका प्रिय बना देती है । विध्या बन्धु बान्धव के भी
कष्ट दूर करने वाली है । विध्या राजाओं के बीच भी पूज्यनीय है । विध्या से विहीन मनुष्य पशु के समान है । अत्यन्त जतन से छुपाकर रखा गया धन चुराया जा सकता है । पर विध्या को कोई नही चुरा सकता ।
न कोई किसी का मित्र है । न कोई किसी का शत्रु । कारण की वजह से ही सब एक दूसरे के शत्रु मित्र होते हैं । यदि मनुष्य को किसी के साथ शाश्वत प्रेम करना है तो उसके साथ जुआ । धन का लेन देन । एवं उसकी
स्त्री की तरफ़ देखना । इन तीन दोषों को त्याग देना चाहिये । माता । बहिन या पुत्री के साथ एकान्त में
नहीं बैठना चाहिये । क्योंकि इन्द्रियों का समूह अधिक बलवान होता है । वह अति विद्वान को भी दुराचार
को प्रेरित कर सकता है । उपयुक्त अवसर न मिलने से । एकान्त स्थान न होने से । तथा इच्छा के अनुकूल
पुरुष न मिलने से ही स्त्रियों में सतीत्व पाया जाता है । जो खाने पीने की चीज से बालक को । विनम्रता से सज्जन को । धन से स्त्री को । तपस्या से देवता को । और सद व्यवहार से समस्त लोक को वश में कर लेता
है । वही ग्यानी है । जो कपट से मित्र बनाना चाहते है । पाप से धर्म कमाना चाहते हैं । दूसरों को दुखी
करके धन संग्रह करना चाहते हैं । बिना परिश्रम के सुख पूर्वक विध्या अर्जन करना चाहते हैं । और कठोर व्यवहार के द्वारा स्त्रियों को वश में करने की इच्छा रखते हैं । वे निश्चय ही मूर्ख हैं । दरिद्र के लिये गोष्ठी
विष के समान है । वृद्ध व्यक्ति के लिये युवती विष के समान है । भली भांति आत्मसात न की गयी विध्या
विष के समान है । अजीर्ण दशा में किया गया भोजन विष के समान है । अधिक मात्रा में जल पीना । गरिष्ठ
भोजन । धातु की क्षीणता । मल मूत्र का वेग रोकना । दिन में सोना । रात में जागना । इनसे मनुष्य शरीर
में रोग वास करने लगते हैं । प्रातकालीन धूप । अधिक मैथुन । शमशान धूम का सेवन । अग्नि में हाथ सेकना
। रजस्वला स्त्री का मुख देखना । ये दीर्घ आयु का भी विनाश कर देते हैं । शुष्क मांस । वृद्धा स्त्री । बाल सूर्य
। रात में दही खाना । सुबह के समय स्त्री से सम्भोग करना । ये प्राण विनाशक होते हैं । तुरन्त पकाया
गया घी । अंगूर का फ़ल । युवती स्त्री । दूध का सेवन । गरम जल । तथा वृक्ष की छाया । ये शीघ शक्ति देने
वाले होते हैं ।

क्योंकि भली प्रकार से न बुझायी आग संसार को भस्म कर सकती है ।

कुएं का जल । वट वृक्ष की छाया । सर्दी में गरम । तथा गरमी में शीतल होते है । तैल मर्दन और सुन्दर भोजन ये शरीर में बल का संचार करते हैं । किन्तु मार्ग गमन । सम्भोग । और ज्वर ये सधः पुरुष का भी
बल हर लेते हैं । गन्दे कपडे पहनने वाला । दांत साफ़ न करने वाला । अधिक भोजन करने वाला । कठोर वचन बोलने वाला । सूर्योदय तथा सूर्यास्त के समय सोने वाला । लक्ष्मी इनका शीघ्र साथ छोड देती हैं ।
नाखून से तिनका छेदने वाला । प्रथ्वी पर लिखने वाला । पैर न धोने वाला । नग्न होकर सोने वाला ।
अधिक परिहास करने वाला । अपने अंग ( शरीर ) पर या आसन पर बाजा बजाने वाला । इनको लक्ष्मी त्याग देती है । लेकिन सिर को धोकर स्वच्छ रखने वाला । अपने चरणों को धोने वाला । अल्प भोजन करने वाला । नग्न शयन न करने वाला । पर्व रहित दिवसों में ही स्त्री सम्भोग करने वाला । वैश्या गमन से दूर रहने वाला । इनकी चिरकाल से नष्ट हुयी लक्ष्मी भी शीघ्र लौट आती है । बाल सूर्य का तेज । चिता का धुंआ । वृद्ध स्त्री । बासी दही । और झाडू की धूल का सेवन लम्बी आयु की इच्छा रखने वाले को नहीं करना चाहिये । सूप फ़टकने से निकली वायु । नाखून का जल । स्नान आदि के बाद वस्त्र से निचोडा गया जल । बालों से गिरता हुआ जल । तथा झाडू की धूल मनुष्य के पूर्व जन्म के अर्जित पुण्य को भी नष्ट कर देते हैं । स्त्री । राजा । अग्नि । सर्प । स्वाध्याय । शत्रु की सेवा । भोग और आस्वाद में कौन ऐसा बुद्धिमान होगा । जो विश्वास करेगा । अविश्वसनीय पर विश्वास । और विश्वस्त प्राणी पर अधिक विश्वास । नहीं करना चाहिये । क्योकि विश्वास से जो भय उत्पन्न होता है । वह मनुष्य को समूल नष्ट कर देता है । प्राणी को अत्यन्त सरल अथवा अत्यन्त कठोर भी नही होना चाहिये । क्योंकि सरल स्वभाव से सरल और कठोर स्वभाव से कठोर शत्रु को नष्ट किया जा सकता है । अत्यन्त सरल तथा कोमल नहीं होना चाहिये । सरल अर्थात सीधे वृक्ष ही काटे जाते हैं । टेडे तो आराम से खडे रहते हैं । फ़ल से परिपूर्ण वृक्ष एवं गुण्वान व्यक्ति विनम्र हो जाते हैं । किन्तु सूखे वृक्ष और मूर्ख मनुष्य टूट तो सकते हैं पर झुक नहीं सकते । जिस प्रकार दुख बिना मांगे जीवन में आते हैं और चले जाते हैं । उसी प्रकार सुख की भी यही स्थिति है । छह कानों तक पहुंची हुयी गुप्त मन्त्रणा भी नष्ट हो जाती है । अतः मन्त्रणा को चार कानों तक ही सीमित करना चाहिये ।
दो कानों तक रहने वाली मन्त्रणा को तो ब्रह्मा भी जानने में समर्थ नही होता । मनुष्य को पांच वर्ष तक पुत्र का पालन प्यार से करना चाहिये । दस वर्ष तक उसे अनुशासित करना चाहिये । तथा सोलह वरस की आयु में उससे मित्रवत व्यवहार करना चाहिये । कुछ बाघ हिरन के समान मुंह वाले होते हैं । कुछ हिरन बाघ के समान मुंह वाले होते हैं । उनके वास्तविक स्वरूप पर अविश्वास ही बना रहता है । इसलिये बाह्य आकृति से व्यक्ति की अन्तः प्रवृति को नहीं जानना चाहिये । क्षमाशील व्यक्ति में एक ही दोष है । उसमें दूसरा दोष नहीं होता । दोष ये है । जो क्षमाशील होते हैं । मनुष्य उनको अशक्त या असमर्थ मानता है ।
कम शक्तिशाली वस्तुओं का संगठन भी अत्यधिक शक्ति सम्पन्न हो जाता है । जिस प्रकार तिनकों से बटकर
बनायी गयी रस्सी से शक्तिशाली हाथी बांध लिया जाता है । मनुष्य को भूलकर भी दुष्ट एवं छोटे शत्रु की
भी अपेक्षा नहीं करनी चाहिये । क्योंकि भली प्रकार से न बुझायी आग संसार को भस्म कर सकती है ।
जो नयी उमर अथवा युवावस्था में शान्त रहता है । वही वास्तव मे शान्त है । क्योकि धातु क्षय और
सब प्रकार की शक्तियां समाप्त हो जाने पर तो सभी स्वत शान्त हो जाते हैं ।

इसी कर्म की वजह से शंकर हाथ मे कपाल लेकर भिक्षाटन करते हैं ।

भीम अर्जुन आदि पांडव राजपुत्र थे । ये सभी चन्दमा के समान कान्तियुक्त । पराक्रमी । सत्य बोलने वाले । सूर्य के समान प्रतापी और स्वयं अवतारी भगवान कृष्ण से रक्षित थे । फ़िर भी इनको कंजूस धृतराष्ट्र की परवशता के कारण भिक्षा तक मांगनी पडी । इसलिये इस संसार में कौन ऐसा है । किसमें इतनी सामर्थ्य है । जिसको भाग्य के वशीभूत होने के कारण कर्मरेखा नहीं घुमाती । अपने पूर्व संचित कर्म के अधीन होकर ही ब्रह्मा कुम्भकार ( कुम्हार ) के समान ब्रह्माण्ड रूपी इस महाभाण्ड के उदर में चराचर प्राणियों की सृष्टि में नियमतः लगे रहते हैं । इसी कर्म से अभिभूत विष्णु दशावतार के समय परिव्याप्त असीमित महासं कट में अपने को डाल देते हैं । इसी कर्म की वजह से शंकर हाथ मे कपाल लेकर भिक्षाटन करते हैं । इसी कर्म की वजह से सूर्य आकाश में चक्कर काटता है । राजा बलि कितना बडा दानी था । मांगने वाले स्वयं विष्णु थे । विशिष्ट लोगों के सामने दान दिया गया । फ़िर भी दान का फ़ल बंधन प्राप्त हुआ । यह सब भाग्य का खेल है । पूर्व जन्म में प्राणी ने जैसा कर्म किया है । उसी कर्म के अनुसार वह दूसरे जन्म में फ़ल भोगता है । अतः प्राणी स्वयं ही अपने भोग्य फ़ल का निर्माण करता है । अर्थात वह अपने कर्मफ़ल का स्वयं ही विधाता है ।
हम अपने सुख दुख का स्वयं ही कारण हैं । माता के गर्भ में आकर और पूर्व देह में किये गये कर्म के फ़ल हमें भोगने ही पडते हैं । आकाश । समुद्र । पर्वतीय गुफ़ा । तथा माता के सिर पर । माता की गोद में स्थित रहते हुये भी मनुष्य अपने पूर्व संचित कर्म फ़ल का त्याग करने में समर्थ नहीं होता । जिसका किला त्रिकूट जैसे पर्वत पर था । जो समुद्र से घिरा हुआ भी था । और राक्षसों के द्वारा रक्षित था । स्वयं जो विशुद्ध आचरण करने वाला था । जिसको नीति की शिक्षा शुक्राचार्य से प्राप्त हुयी थी । वह रावण भी कालवश नष्ट हो ही गया । जिस अवस्था । जिस समय । जिस दिन । जिस रात्रि । जिस महूर्त । जिस क्षण जैसा होना निश्चित है । वह वैसा ही होगा । अन्यथा नहीं हो सकता । सब अन्तरिक्ष में जा सकते हैं । प्रथ्वी के गर्भ में प्रवेश कर सकते हैं । दसों दिशायें अपने ऊपर धारण कर सकते हैं । किन्तु जो वस्तु उनके भाग्य में नहीं है । उसको प्राप्त नहीं कर सकते । पूर्व जन्म में अर्जित की गयी विध्या । दिया गया धन । तथा किये गये कर्म ही दूसरे जन्म में आगे आगे मिलते जाते हैं । इस संसार में कर्म ही प्रधान है । सुन्दर ग्रहों का योग था । स्वयं वशिष्ठ मुनि ने निर्धारित लग्न में विवाह संस्कार कराये । फ़िर भी सीता को पूर्व जन्म के कर्मों के अनुसार दुख भोगना ही पडा ।
राम को राजगद्दी की जगह वनवास जाना पडा । जब राम लक्ष्मण सीता ये तीनों अपने अपने कर्म के अनुसार दुख भोगते हैं । तो साधारण आदमी के विषय में कु्छ कहना ही व्यर्थ है । न पिता के कर्म से पुत्र को सदगति मिल सकती है । न पुत्र के कर्म से पिता को सदगति मिल सकती है ।
सब अपने कर्म अनुसार ही गति को प्राप्त करते हैं । जैसे सांप हाथी चूहा ये ज्यादा से ज्यादा अपने वास स्थान या बिल तक ही भाग सकते हैं । इससे आगे कहां जा सकते हैं ? इसी तरह अपने कर्म के फ़ल से कौन भाग सकता है ? अर्थात सब कर्म के अधीन ही है । जो मनुष्य सम्मान से प्रसन्न नहीं होता । अपमान से क्रुद्ध नहीं होता । और क्रोध आने पर मुंह से कठोर वाक्य नहीं बोलता । वो निश्चय ही साधुपुरुष है । सभी प्राणियों और पदार्थों की उत्पत्ति के पूर्व में स्थिति नहीं थी । और निधन के अन्त में भी उनकी स्थित नहीं रहती । ये सभी मध्य अवस्था में ही विधमान रहते हैं । फ़िर दुख करने की बात क्या है ? समय न आने पर प्राणी सैकडों बाण लगने पर भी नहीं मरता । और समय आ जाने पर छोटा सा कांटा लगने से मर जाता है । प्राणी को जो सुख दुख प्राप्त होना है । वो उसे उसी स्थान पर खींच ले जाता है । प्राणी की मृत्यु वहीं होती है । जहां उसका हन्ता मौजूद होता है । अपने कर्म से प्रेरित किया गया आदमी स्वयं ही उन स्थानों पर पहुंच जाता है । पूर्व जन्म में किया गया कर्म कर्ता के पीछे पीछे वैसे ही चलता है । जैसे गौशाला में हजार गायों के बीच बछडा अपनी माता को पहचान लेता है । इस प्रकार जब पूर्व जन्म में किया गया कर्म कर्ता में स्थित रहता है । तो अपने पुन्य पाप का फ़ल भोगो । फ़िर क्यों दुखी होते हो ? जैसा पूर्व जन्म में शुभ अशुभ कर्म किया गया है । वैसा ही फ़ल जन्म जन्मान्तर में कर्ता का अनुसरण करता है और उसके पीछे पीछे ही चलता है ।

गुरुवार, अगस्त 12, 2010

जिस मृतक का पिन्डदान नहीं होता । वह आकाश में ही भटकता रहता है ।

आत्मा ( शरीर ) ही पुत्र के रूप मे प्रकट होता है । वह पुत्र यमलोक में पिता का रक्षक है । घोर नरक से पिता का वही उद्धार करता है अतः उसको पुत्र कहा जाता है । अतः पुत्र को पिता के लिये आजीवन श्राद्ध
करना चाहिये । तब वह प्रेत रूप हुआ पिता पुत्र द्वारा दिये गये दान से सुख प्राप्त करता है । प्रेत के निमित्त दी जलांजलि से वह प्रसन्न होकर यमलोक जाता है । चौराहे पर रस्सी की तिगोडिया में कच्चे घडे में लटकाया दूध वायु भूत हुआ वह प्रेत मृत्यु के दिन से तीन दिन तक । आकाश में स्थित उस दूध का पान करता है । अस्थि संचय चौथे दिन करके दिन का प्रथम पहर बीत जाने पर जलांजलि दें । पूर्वाह्न मध्याह्न तथा अपराह्न तथा इनके संधिकाल में जलांजलि नहीं दी जाती । जो मनुष्य जिस स्थान । मार्ग । या घर में मृत्यु को प्राप्त करता है । उसको वहां से शमशान भूमि के अतिरिक्त कही नहीं ले जाना चाहिये । मृत प्राणी वायु रूप धारण करके इधर उधर भटकता है । और वायु रूप होने से ही ऊपर की ओर जाता है । तब वह प्राप्त हुये शरीर के द्वारा ही अपने पुन्य और पाप के फ़लों का भोग करता है । दशाह कर्म करने से मृत मनुष्य के शरीर का निर्माण होता है । नवक और षोडश श्राद्ध करने से जीव उस शरीर में प्रवेश करता है । भूमि पर तिल कुश का निक्षेप करने से वह कुटी धातुमयी हो जाती है । मरणासन्न के मुख में पंच रत्न डालने से जीव ऊपर की ओर चल देता है । यदि ऐसा नहीं होता तो जीव को शरीर प्राप्त नहीं होता । जीव जहां कहीं पशु या स्थावर योनि में जन्मता है । श्राद्ध में दी गयी वस्तु वहीं पहुंच जाती है ।
जब तक मृतक के सूक्ष्म शरीर का निर्माण नहीं होता । तब तक किये गये श्राद्ध से उसकी त्रप्ति नहीं होती । भूख प्यास से व्याकुल वह वायुमण्डल में इधर उधर चक्कर काटता हुआ दशाह के श्राद्ध से त्रप्त होता है । जिस मृतक का
पिन्डदान नहीं होता । वह आकाश में ही भटकता रहता है । वह क्रम से लगातार तीन दिन जल तीन दिन अग्नि तीन दिन आकाश और एक दिन पूर्व मोह ममता के कारण अपने घर में निवास करता है । इसलिये अग्नि में भस्म हो जाने पर प्रेतात्मा को जल से ही त्रप्त करना चाहिये । मृत्यु के पहले तीसरे पांचवे सातवें नवें और ग्यारहवें दिन जो श्राद्ध होता है उसे नवक श्राद्ध कहते हैं । एकादशाह के दिन के श्राद्ध को सामान्य श्राद्ध कहते हैं । जिस प्रकार गर्भ में स्थित जीव का पूर्ण विकास दस मास में होता है । उसी प्रकार दस दिन तक दिये गये पिन्डदान से जीव के उस शरीर की सरंचना होती है । जिस शरीर से उसे यमलोक की यात्रा करनी होती है । पहले दिन जो पिन्डदान दिया जाता है । उससे जीव की मूर्द्धा का निर्माण होता है ।
दूसरे दिन के पिन्डदान से आंख कान और नाक की रचना होती है । तीसरे दिन गण्डस्थल मुख तथा गला । चौथ पिन्ड से ह्रदय कुक्षि प्रदेश उदर भाग । पांचवे दिन कटि प्रदेश पीठ और गुदाभाग । छठे दिन दोनों उरु । सातवें दिन गुल्फ़ । आठवें दिन जंघा । नौवें दिन पैर । तथा दसवें दिन प्रबल क्षुधा की उत्पत्ति होती है ।
मानव शरीर में जो अस्थियो का समूह है । उनकी कुल सख्या तीन सौ साठ है । जल से भरे घडे का दान करने से उन अस्थियों की पुष्टि होती है । इसलिये जल युक्त घटदान से प्रेत को बहुत प्रसन्नता होती है । जिस प्रकार सूर्य की किरणें अपने तेज से सभी तारों को ढक देती हैं । उसी प्रकार प्रेतत्व पर इन क्रियाओ का आच्छादन होने से भविष्य में प्रेतत्व नहीं मिलता । अतः सपिन्डन के बाद कहीं प्रेत शब्द का प्रयोग नहीं होता । मृतक के हेतु शय्यादान की बेहद प्रसंशा की गयी है । यह जीवन अनित्य है । उसे मृत्यु के बाद कौन प्रदान करेगा । जब तक यह जीवन है । तभी तक बन्धु बान्धव अपने हैं । और अपने पिता हैं । ऐसा कहा जाता है । मृत्यु हो जाने पर । यह मर गया है । ऐसा जान करके क्षण भर मे ही वे अपने ह्रदय से स्नेह को दूर कर देते हैं । इसलिये अपना आत्मा ही अपना सच्चा हितैषी है । ऐसा बारम्बार विचार करते हुये जीते हुये ही अपने हित के कार्य कर लेने चाहिये । अन्यथा इस संसार में मरे हुये प्राणी का कौन हितैषी होता है । अर्थात कोई नहीं होता । क्या इसमें कोई संशय है ?

स्त्रियों को सम्भोग की प्राप्ति न होने से बुडापा आ जाता है ।

मनुष्य को गुणहीन पत्नी । कपटी मित्र । दुराचारी राजा । कपूत । गुणहीन कन्या । कुत्सित देश का त्याग एकदम ही कर देना चाहिये । कलियुग मे स्वभाव से ही धर्म समाज से निकल जाता है । तप कर्म में स्थिरता नहीं रहती । सत्य प्राणियों के ह्रदय से दूर हो जाता है । प्रथ्वी बांझ के समान होकर फ़लहीन हो जाती है ।
मनुष्यों में कपट व्यवहार जाग जाता है । ब्राह्मण लालची हो जाते हैं । पुरुष स्त्रियों के वश में हो जाते हैं । स्त्रियां चंचल स्वभाव हो जाती हैं । नीच प्रवृति के लोग ऊंचे पदों पर पहुंच जाते हैं । अतः कलियुग में
धर्मपूर्वक रहना बेहद कठिन हो जाता है । कपूत के होने से मनुष्य को सुख शान्ति नहीं मिलती । दुराचारिणी स्त्री से प्रेम की आशा भी कैसे की जा सकती है । कपटी मित्र का कैसे विश्वास किया जाय ? और भ्रष्ट राजा के राज्य में सुख से कैसे रहा जाय ? दूसरे का खाना । दूसरे का धन । दूसरे की स्त्री से ही सम्भोग । और दूसरे के घर में रहना । ये इन्द्र के एश्वर्य को भी नष्ट कर देते हैं । दुलार में बहुत से दोष हैं और ताडना में बहुत से गुण । इसलिये शिष्य और पुत्र आदि को केवल दुलार करना हरगिज उचित नहीं है । अधिक पैदल चलना प्राणियों के लिये बुडापे का कारण है । पर्वतों के लिये उसका जल बुडापे का कारण है । स्त्रियों को सम्भोग की प्राप्ति न होने से बुडापा आ जाता है । अधिक धूप से वस्त्रों का बुडापा होता है । नीच प्रकृति वाले दूसरे से कलह की इच्छा रखते हैं । मध्यम संधि की इच्छा रखते हैं । उत्तम दूसरे से सम्मान की इच्छा रखते हैं । आलसी व्यापारी । अभिमानी भृत्य । विलासी भिक्षुक । निर्धन कामी । तथा कटु वचन बोलने वाली वैश्या ये सदा अपने कार्य में असफ़ल रहते हैं । निरधन होते हुये दाता बनना । धन होते हुये कंजूस होना । पुत्र का आग्याकारी न होना । दुष्ट की सेवा करना । तथा दूसरे का अहित करते हुये मृत्यु को प्राप्त होना । ये मनुष्य के लिये दुश्चरित हैं । पत्नी से वियोग । अपनों के द्वारा अपमान । उधार का कर्ज । दुष्ट की सेवा करने की विवशता । धनहीन होने पर मित्रों का दूर हो जाना ये बातें मनुष्य को बिना अग्नि के ही जलाती हैं । मनुष्य को हजारों चिंतायें होती हैं । किन्तु नीच व्यक्ति द्वारा अपमान होने की चिंता । भूख से पीडित पत्नी की चिंता । प्रेम से हीन पत्नी की चिंता । तथा काम मे रुकावट ये चिंतायें तलवार के धार के समान चोट करती हैं । अनुकूल पुत्र । धन देने वाली विध्या । स्वस्थ शरीर । सत संगति । तथा मन के अनुकूल वश में हुयी पत्नी ये पुरुष के दुख को समूल नष्ट कर देते हैं । आयु । कर्म । धन । विध्या और मृत्यु ये जन्म के समय ही तय हो जाते हैं । बादल की छाया । दुष्ट का प्रेम । पराई औरत का साथ । जवानी और धन ये कब साथ छोड दें । कोई पता नहीं । इसी तरह जीवन का पता नहीं । धन का पता नहीं । यौवन का भी पता नहीं । स्त्री पुत्र का भी पता नही । किन्तु मनुष्य का धर्म कीर्ति और यश स्थायी होता है ।
सौ वर्ष का जीवन भी बहुत कम है । क्योंकि आधा तो रात में ही चला जाता है । बचा हुआ आधा रोग दुख और बुडापे की असमर्थता में चला जाता है । कुछ ठीक होता है । वह बाल अवस्था । स्त्री भोग और राज सेवा
मे व्यतीत हो जाता है । मृत्यु दिन रात वृद्धावस्था के रूप में इस लोक में विचरण करती रहती है । और प्राणियों को खाकर अपना पेट भरती है । आकाश में घिरे बादल की छाया । तिनके की आग । नीच की सेवा । मृग मरीचिका का जल । वैश्या का प्रेम । और दुष्ट के ह्रदय में उत्पन्न हुयी प्रीत ये जल के बुलबुले के समान कुछ देर के होते हैं । निर्बल का बल राजा । बालक का बल रोना । मूर्ख का बल मौन है । औरत का बल हठ । और चोर का बल झूठ होता है । लोभ आलस्य और विश्वास ये तीन व्यक्ति का विनाश कर देते हैं ।
मनुष्य को भय से उसी समय तक भयभीत होना चाहिये । जब तक वह सामने नही आता । सामने आने पर
निर्भीकता से उसका सामना करना चाहिये । कर्ज । आग । और रोग थोडे भी शेष रह जाने पर बार बार
बडते जाते हैं । अतः उनको खत्म कर देना ही उचित है । वह सभा सभा नहीं जिसमें वृद्धजन नहीं । वे वृद्ध
वृद्ध नहीं जो धर्म का उपदेश नही करते । वह धर्म नहीं जिसमें सत्य नहीं होता । वह सत्य नहीं जिसमें कपट हो ।

अनात्मा में आत्मा का और असत में सत का दर्शन होता है ।

जिस तरह गाय के शरीर में घी होता है । पर वह घी गाय को किसी प्रकार का लाभ नहीं देता । परन्तु उसी घी को दूध आदि क्रिया द्वारा निकाल लेने पर विधपूर्वक प्रयोग करने पर वह घी महा बल देने वाला हो जाता है । उसी प्रकार परमात्मा हर घट में है । लेकिन उसको जाने बिना कोई लाभ होने वाला नहीं हैं । हर घट तेरा सांईया सेज न सूनी कोय । बलिहारी उन घटन की जिन घट परगट होय । इसलिये जो योग रूपी फ़ल को प्राप्त करना चाहते हैं । उनके लिये कर्म ग्यान आवश्यक है । किन्तु जो इस मार्ग पर आगे बड चुके हैं । उनके लिये त्याग वैराग्य और ग्यान ही महत्वपूर्ण है । लेकिन जो शब्द रूप रस आदि विषयों को जानने का इच्छुक है । उसमें राग द्वेष आदि विकार उत्पन्न हो जाते है । और फ़िर वह जीव काम क्रोध लोभ मोह के वशीभूत होकर पापाचार करने लगता है । और कालपाश में जकडता जाता है । जिसके हाथ । उपस्थ ( लिंग ) उदर । और वाणी ये चार संयमित हो गये हैं । उसको ब्राह्मण कहा जाता है । जो दूसरों का धन नहीं लेता । हिंसा नहीं करता । जुआ आदि निन्दित कर्म नही करता । उसके हाथ संयत हैं । जो अन्य स्त्रियों के प्रति किसी भी प्रकार की काम भावना नही रखता । उसका लिंग संयम है । जो शरीर पूर्ति हेतु उचित भोजन करते हैं । उनका उदर संयत हैं । जो सत्य और दूसरों के हित के लिये सीमित बोलते हैं । उनकी वाणी संयमित है । मन बुद्धि और इन्द्रियों की एकता होकर सदा ध्येय तत्व में लगे रहना ध्यान कहलाता है ।
यह ध्यान दो प्रकार का होता है । पहला सबीज और दूसरा निर्बीज । चिन्तन की मूल ताकत बुद्धि दोनों भोंहों के बीच में रहती है । यदि जीव बुद्धि को संसार के विषय में लगाये रहता है । तो ये जाग्रत अवस्था या मनुष्य का जागना ( सामान्य ) कहलाता है । लेकिन जब इन्द्रियां निचेष्ट हो जाती हैं । और केवल मन की चंचलता ही शेष रहती है । और जीव बाहरी और आन्तरिक विषयों को केवल स्वप्न में देखता है । इसको स्वप्न अवस्था कहते हैं । तीसरी सुषुप्ति की स्थिति में मन ह्रदय में स्थित होकर तमोगुण से मोहित हुआ कुछ भी याद नहीं कर पाता । उसको ही सोना कहते हैं । यहीं पर और इसी स्थिति में जो जागना जान जाता है । उसको योगी या तुरीयातीत कहते हैं । जिसने अपनी इन्द्रियों मन आदि को वश में कर लिया है । वह शरीर की जाग्रत अवस्था में भी योगी ही है । अर्थात उस पर मोह लोभ आदि का प्रभाव नहीं होता और तब वह रूप रस गन्ध आदि पांच विषयों में आसक्त भी नहीं होता ।
योगी इन्द्रियों और मन को विषयों से खींचकर । बुद्धि के द्वारा अहंकार को । और प्रकृति के द्वारा बुद्धि को संयत कर के । चित्त शक्ति के द्वारा प्रकृति को भी संयत करके । केवल आत्म स्वरूप में स्थित हो जाता है और खुद को आत्मा ही जानता हुआ । आत्मा को ही देखता है । जीव का अतिम लक्ष्य केवल मुक्ति ही है । यह मुक्ति उसे तभी प्राप्त होती है । जब वह पुष्ट देने वाली तीन गुण वाली प्रकृति का भी त्याग कर देता है । कहिय तात सो परम वैरागी । तृण सम सिद्ध तीन गुन त्यागी । यह प्रकृति पुर्यष्टक कमल रूप माना गया है । संसार की अवस्था में जीव इसी कमल की कर्णिका में स्थित रहता है । इस कमल के आठ पत्ते शब्द रूप रस गन्ध स्पर्श सत रज तम हैं । चित्त की अस्थिरता । भ्रान्ति । दौर्मनस्य । प्रमाद ये योगियों के दोष कहे गये हैं । मुक्त होने पर अनात्मा में आत्मा का और असत में सत का दर्शन होता है । क्या इसमें कोई संशय है ? अर्थात इसमे कोई संशय नहीं है ।

आत्मा ही सबका जानने वाला है ।

मैं ही ब्रह्म हूं । इस बात का सही ग्यान होने से मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति होती है । मैं और ब्रह्म इन दोनोंपदों ( स्थित ) का सही अर्थ पता चलने पर सत्य बोध होता है । एक अहम शब्द ( मैं ) से शरीर और दूसरे से आत्मा का बोध करना है । इन दोनो का एक हो जाना ही खुद को जानना है । ग्यान से अग्यान की निवृति होती है । उस निवृति या स्थिति के बाद प्राणी की जो परम लक्ष्य से एकता की स्थिति बनती है । वही मुक्ति है । यह तो निश्चित है कि परमात्मा है । बस उसको जानना ही है । उसी परमात्मा से आकाश । आकाश से वायु । वायु से अग्नि । अग्नि से जल । जल से प्रथ्वी की उत्पत्ति हुयी है । जो इस जगत का हेतु कारक है । इसके बाद सत्रह तत्व उत्पन्न हुये । हाथ पैर वाणी लिंग गुदा ये पांच कर्म इन्द्रियां हैं । आंख कान नाक त्वचा तथा जीभ ये पांच ग्यान इन्द्रियां हैं । प्राण अपान समान उदान व्यान नाम के पांच वायु होते हैं । मन बुद्धि चित्त अहम ये चार मिलकर अंतःकरण होता है । जिसमें मन संदेही होता है । बुद्धि निश्चयात्मक होती है । इसका स्वरूप सूक्ष्म होता है । आत्मा के रूप में भगवान हिरण्यगर्भ अंतकरण में रहते हैं । वही जीवात्मा हैं । इस प्रकार इस समस्त प्रपंच से परे उस परमात्मा के द्वारा पांच महाभूतों से बने शरीर की उत्पत्ति होती है । उन्ही महाभूतों से ब्रह्माण्ड की रचना भी हुयी । जिस शरीर को हम जानते हैं । इसको स्थूल शरीर कहते है ।यह आवरण है पांच तत्वों से बना दूसरा सूक्ष्म शरीर है ।
जिस प्रकार जल मे सूर्य की छाया पडती है । उस तरह से बेर के समान उसकी आकृति होती है । तब जीव स्वरूप होकर वह ब्रह्म प्राण आदि से संयुक्त होकर शरीर तत्वों को धारण करता है । जाग्रति । सुषुप्ति । स्वप्न अवस्था के
कार्यों को जानने वाला तथा साक्षी हुआ जो है । उसको जीव माना गया है । इस तुरीया से हटकर वह ब्रह्म अपने निर्गुण स्वभाव में रहता है । इस क्रियाशील शरीर के साथ रहने अथवा न रहने पर भी वह हमेशा शुद्ध स्वभाव वाला है । उसमें कैसा भी विकार नहीं होता । जागना सोना और स्वप्न इन तीन अवस्थाओं के कारण ही परमात्मा को तीन प्रकार का मान लिया जाता है । वह अंतकरण में स्थित रहता है और तुरीया की इन तीन अवस्थाओं में इन्द्रियों की क्रियाओं को देखता हुआ विकारयुक्त हो जाता है । इन्द्रियों के द्वारा शब्द रूप रस गन्ध स्पर्श इन पांच विषयों का जब मनुष्य को सत्य रूप ग्यान होता है । उसे जागना कहते हैं ।
सोना और स्वप्न की स्थिति में विषय की अपेक्षा में कार्य हेतु साधन की चिंता में बुद्धि एकाग्र हो जाती है । इसके आगे कारण अवस्था में ब्रह्म की स्थिति है । इस प्रकार यह आत्मा काल के वश में होने के कारण जीवात्मा बनकर शरीर स्वरूप होकर रहता है । किसी भी साधक को समाधि आदि ग्यान आरम्भ करने से पूर्व उस परम लक्ष्य की धारणा चित्त में बनानी होगी । इसके बाद मोक्ष के इच्छुक साधु को पंच तत्वों के शरीर में फ़ंसे उस क्षेत्रग्य जीवात्मा को शरीर से अलग ही मानना चाहिये । क्योंकि आत्मतत्व को शरीर से अलग न मानने पर ब्रह्म तत्व से साक्षात्कार करने में अनेक बाधायें होती हैं । अतः उन बाधाओ को दूर करना ही होता है । जो संसार की विषय वासनाओं से उत्पन्न हैं । उस स्थित में समस्त को शून्य कर देना होता है । यह पांच तत्वों का शरीर घडे के समान है । इसको घट कहा गया है । जैसे घट के अन्दर जो आकाश है । उसे घटाकाश कहा जाता है । किन्तु उस भ्रम को हटा दिया जाय । तो वह समग्र दिखाई देता है ।
यही उदाहरण जीवात्मा के मोक्ष मार्ग पर लागू होता है । मोक्ष की साधना में उसे शरीर से ( खुद को ) अलग की धारणा करनी ही होती है । जिससे वह बंधा हुआ है । उसे ग्यान द्वारा भ्रम को खत्म करना होता है । यही सत्य है । अष्टांग योग से समाधि के द्वारा या संत मत के सुरती शब्द योग द्वारा मनुष्य के लिये आत्म कल्याण सम्भव है । स्वयं का आत्म कल्याण कर लेना ही परम कल्याण है । इस ग्यान से बडा और बेहतर फ़िर कुछ भी नहीं है । आत्मा देह रहित रूप रहित इन्द्रियों से परे है । ये आत्मा स्वयं प्रकाशित है । आंख कान आदि इन्द्रियां स्वयं को भी नहीं जान सकती । परन्तु आत्मा ही सबका जानने वाला है । जब आत्मा योग ध्यान के द्वारा विकार रहित होकर ह्रदय पटल पर प्रकाशित होता है । तो जीव के सारे पापकर्म नष्ट हो जाते हैं । और ग्यान उत्पन्न होता है । जैसे दर्पण में निगाह डालने पर अपने को देख पाते हैं ।
वैसे ही आत्मा को देखने पर इन्द्रियों । इन्द्रियों के विषय । पांच महाभूत । आदि समस्त को आराम से देखा जा सकता है । जिस तरह हम दृष्य जगत को देखते हैं । मन बुद्धि चित्त अहंकार और अव्यक्त पुरुष अथवा चेतन । इन सभी का ग्यान करके संसार बंधन से मुक्त हुआ जा सकता है । सभी इन्द्रियो को मन में स्थापित करें । मन को अहम में । अहम को बुद्धि में । बुद्धि को प्रकृति में । प्रकृति को पुरुष में । और पुरुष को पारब्रह्म में विलीन किया जाता है । इस प्रकार ग्यान ज्योति का प्रकाश होता है । और वह मनुष्य मुक्त हो जाता है । इस प्रकार जो अपने को आंतरिक शरीर रूप और आत्मा से जान लेता है । वही श्रेष्ठ है । उसी ने जीवन का वास्तविक लक्ष्य पा लिया ।

वह अपने जीवन काल में ही ब्रह्म स्वरूप हो जाता है ।

मृत्यु लोक में जन्म लेने वाले प्राणी की मृत्यु निश्चित है । मरे हुये प्राणी के मुख से जीवात्मा वायु का सूक्ष्म रूप धारण करके निकल जाता है । लोगों के नेत्र कान नाक आदि नौ द्वारों तथा तालु रन्ध्र से भी जीवात्मा
अंतिम गति के अनुसार बाहर जाता है । नरक को प्राप्त होने वालों का जीवात्मा गुदा मार्ग से निकलता है । प्राण्वायु के निकलते ही शरीर कटे पेड के समान निराधार होकर गिर जाता है । और उसके तत्व अपने
अपने तत्व में जाकर मिल जाते हैं । काम क्रोध आदि विकार और पांच इन्द्रियों का समूह शरीर में चोर के समान रहता है । इसी शरीर में अहंकार युक्त मन भी रहता है । वही सबका नायक या नेता है । तब विभिन्न पाप पुन्य से संयुक्त होने पर काल उसको मार डालता है । संसार में भोग के लिये शरीर का निर्माण जीव के कर्म अनुसार होता है । मनुष्य अपने सतकर्म और दुष्कर्म के अनुसार ही दूसरे शरीर को प्राप्त होता है । शरीर में विधमान धातुयें माता पिता से प्राप्त होती हैं । इन्हीं से निर्मित ये शरीर षाटकोशिक यानी छह कोशो। से निर्मित त्वचा रक्त । मांस । मेदा । मज्जा । अस्थि । होता है । शरीर में सभी प्रकार के वायु रहते हैं । मूत्र । पुरीष तथा उन्हीं के योग से उत्पन्न अन्य व्याधियां भी रहती हैं । पुरुष का शरीर छोटी बडी नसों से बंधा हुआ एक स्तम्भ के समान है । जिसके नीचे पैर रूपी दो अन्य स्तम्भ होते हैं । पांच इन्द्रियों सहित इसमें नौ द्वार हैं । सांसारिक विषयों से युक्त काम क्रोध से घिरा हुआ बैचेन जीव इस शरीर में रहता है । राग द्वेष से व्याप्त यह शरीर तृष्णा का दुस्तर किला है । अनेकों लोभ से भरे हुये जीव का यह शरीर पुर है । इसी शरीर में सभी देवता और चौदह लोक स्थित हैं । इसी तरह के सब शरीर हैं । जो लोग अपने को इस तरह से नहीं जान पाते । वे निसंदेह पशु के समान ही हैं । इस संसार में तीन अग्नि । तीन लोक । तीन वेद । तीन देवता । तीन काल । तीन संधिया । तीन वर्ण । तथा तीन शक्तियां मानी गयी हैं । मनुष्य के शरीर में पैर से ऊपर कमर तक ब्रह्मा का निवास है । नाभि से गर्दन तक हरि या विष्णु का वास है ।
मुख से मस्तक तक महादेव का वास है । इस संसार में जो प्राणी आत्मा के अधीन होकर रहता है । वह निश्चित ही सब प्रकार से सुखी है । शब्द स्पर्श रूप रस गन्ध ये पांच विषय हैं । इनके वश में रहने वाला सदैव दुखी रहता है । हिरन शब्द । हाथी स्पर्श । पतंगा रूप । भंवरा गन्ध । मछली रस ।
ये जीव एक ही विषय के सेवन से मारे जाते हैं । तो मनुष्य को तो ये पांचों एक साथ लगे हुये हैं । मनुष्य बाल अवस्था में माता पिता के अधीन । युवावस्था में स्त्री के अधीन । और बुडापा या अन्त समय पुत्र पौत्र के मोह अधीन हो जाता है । और वह मूर्ख किसी भी अवस्था में आत्मा के अधीन नहीं रहता और अन्त में दुर्गति को प्राप्त
होता है । प्राणी मृत्यु के बाद तुरन्त भी दूसरे शरीर में प्रविष्ट हो सकता है और बिलम्ब से भी हो सकता
है । शरीर के अन्दर जो धुंआ रहित ज्योति के समान ( जिसको अक्षर पुरुष कहते हैं यही सभी शरीरों को धारण करता है । सारे शरीर इसी ज्योति पर बनते हैं । ) जीवात्मा विधमान रहता है । वह मृत्यु के तुरन्त बाद वायवीय शरीर धारण कर लेता है । उस एक शरीर में प्रविष्ट होते हुये प्राणी के कालक्रम भोजन या गुण संक्रमण की जो स्थित है । उसे मूर्ख नहीं अपितु ग्यानी व्यक्ति ही देख पाते हैं । विद्वान इसको अतिवाहक वायवीय शरीर कहते हैं । भूत प्रेत पिशाचों का शरीर तथा मनुष्यों का पिन्डज शरीर भी ऐसा ही होता है । पुत्र आदि के द्वारा जो पिन्डदान दिया जाता है । उस पिन्डज शरीर से वायवीय शरीर एकाकार हो जाते हैं । इसके अलावा कोई कोई जीवात्मा बिलम्ब से भी दूसरा शरीर प्राप्त करता है । क्योंकि मृत्यु के बाद वह अपने कर्म अनुसार यमलोक को जाता है । और चित्रगुप्त के आदेश अनुसार नरक भोगता है । वहां की यातनाओं को भोगने के बाद उसे पशु पक्षी आदि की योनि प्राप्त होती है । जीव जिस शरीर को पाता है । उसी शरीर से मोह ममता करने लगता है । लेकिन सतकर्म से जिसने अपने कालुष्य को नष्ट कर दिया है । और जो भक्ति में लगा रहता है । जो शब्द रूप रस आदि विषयों का त्याग कर देता है ।
जो राग द्वेष छोडकर विरक्त सेवाभाव वाला । और जैसा भी भोजन मिले उससे संतुष्ट रहता है । जिसका मन वाणी शरीर संयमित है । जो वैरागी सा नित ध्यान योग में अधिक तत्पर रहता है । जो अहंकार बल दर्प काम क्रोध परिग्रह इन छह विकारों का त्याग करके निर्भय और शान्त हो जाता है । वह अपने जीवन काल में ही ब्रह्म स्वरूप हो जाता है । और इसके बाद उस श्रेष्ठ मनुष्य के लिये कुछ भी करना शेष नहीं रहता । क्या इसमें कोई संशय है ? अर्थात इसमें कोई संशय नहीं है ।

वे जीव वायु रूप होकर भटकते हैं ।

यमलोक का विस्तार छियासी हजार योजन है । एक योजन में बारह किलोमीटर होते हैं । मृत्यु लोक के बीच से ही उसके लिये रास्ता जाता है । वह रास्ता दहकते हुये तांबे के समान जलता हुआ अति कठिन और भयंकर रास्ता है । पापी तथा मूर्खों को उस रास्ते पर जाना होता है । अनेक प्रकार के कांटो से भरा हुआ ऊंची नीची भूमि वाला वह रास्ता वृक्ष आदि किसी भी प्रकार की छाया से रहित ही है । जहां पर दो मिनट कोई विश्राम कर सके ऐसी कोई व्यवस्था वहां नहीं है । मार्ग में खाने पीने की भी कोई व्यवस्था नहीं हैं । अत्यन्त दुर्गम उस मार्ग में जीव कष्ट और पीडा से कांपने लगता है । जिसका जितना और जैसा पाप है । उसका उतना ही और वैसा ही मार्ग है । इस मार्ग से जाते हुये प्राणी करुण चीत्कार करते हैं और कुछ तो वहां की कुव्यवस्था के प्रति विद्रोह भी करने लगते हैं । जो लोग संसार के प्रति कोई तृष्णा नहीं रखते वे उस मार्ग को सुखपूर्वक पार कर जाते हैं । अपने जीवन में मनुष्य जिन जिन वस्तुओं को दान देता है । वे सब वस्तुयें उसे यमलोक के मार्ग में उपयोग के लिये मिल जाती हैं । जिन मृतक पापियों का मरने के बाद जलांजलि और श्राद्ध नहीं होता । वे जीव वायु रूप होकर भटकते हैं । दक्षिण और नैऋत दिशा के मध्य में विवस्वत के पुत्र यमराज की पुरी है । यह सम्पूर्ण नगर वज्र के समान बना है । देवता और असुर शक्तियां भी इसका भेदन नहीं कर सकती हैं । यह चौकोर है । इसमें चार द्वार । सात चहारदीवारी तथा तोरण हैं । इसका विस्तार एक हजार योजन है । सभी प्रकार के रत्नों से सुसज्जित । चमकती बिजली और सूर्य के तेज के समान इस पुरी में यमराज अपने दूतों के साथ निवास करता है । इसका विस्तार पांच सौ योजन ऊंचा है । हजार खम्बों पर स्थित यह भवन वैदूर्य मणि से सजा हुआ है । यहीं पर दस योजन में फ़ैला हुआ । नीले मेघ के समान आसन पर धर्मराज रहते हैं । यहां पर शीतल मन्द वायु बहती है । अनेक प्रकार के उत्सव और व्याख्यान होते रहते हैं । इन्हीं के बीच धर्मराज का समय व्यतीत होता है । उस पुर के मध्य भाग में प्रवेश करने पर चित्रगुप्त का भवन पडता है । इसका विस्तार पचीस योजन का है । इसकी ऊंचाई दस योजन है । इसमें आने जाने के लिये सैकडों गलियां है । सैकडों दीपक इस भवन में जलते हैं । बन्दीजनों के द्वारा गाये बजाये गीतों से यह भवन गूंजता रहता है । इस भवन में मुक्ता मणियों से बना एक आसन है । जिस पर बैठकर चित्रगुप्त मनुष्य तथा अन्य जीवों की आयु गणना करते हैं । किसी के पुन्य या पाप के प्रति उनमें कोई मोह नहीं होता । जीव ने जो भी अर्जित किया होता है । वे उसको जानते हैं । और अठारह दोषों से रहित जीव द्वारा किये गये कर्म को लिखते हैं । चित्रगुप्त के भवन से पहले ज्वर ( बुखार ) का बहुत बडा भवन है । उनके दक्षिण से शूल और लताविस्फ़ोटक के भवन हैं । पश्चिम में कालपाश अजीर्ण और अरुचि के भवन हैं । मध्य पीठ के उत्तर में विषूचिका ईशान में शिरोर्ति । आग्नेय में मूकता । नैऋत्य कोण में अतिसार वायव्य कोण मे दाह संग्यक रोग का घर है । चित्रगुप्त इन सभी से नित्य परिवृत रहते हैं ।

शनिवार, अगस्त 07, 2010

दीप और पाताल लोक का रहस्य..

प्लक्ष दीप के स्वामी मेधातिथि के सात पुत्र हुये । इनके नाम क्रमशः । शान्तभव । शिशिर । सुखोदय । नन्द । शिव । क्षेमक और ध्रुव थे । ये सभी प्लक्ष दीप के राजा बने । इस दीप में । गोमेद । चन्द्र । नारद । दुन्दुभि । सोमक । सुमनस । वैभ्राज । ये सात पर्वत हैं । यहां अनुतप्ता । शिखी । विपाशा । त्रिदिवा । क्रमु । अमृता । सुकृता । ये सात नदी हैं ।
वपुष्मान । शाल्मकदीप के स्वामी हुये । इस दीप में स्थित सात वर्ष ( देश ) के नाम से प्रसिद्ध उनके सात पुत्र थे । जिनके नाम । श्वेत । हरित । जीमूत । रोहित । वैधुत । मानस । सुप्रभ हैं । यहां कुमुद । उन्नत । द्रोण । महिष । बलाहक । क्रौंच्च । कुकुद्मान । ये सात पर्वत हैं । योनि । तोया । वितृष्णा । चन्द्रा । शुक्ला । विमोचनी । विधूति ये सात नदी हैं ।
कुशदीप के स्वामी ज्योतिष्मान थे । इनके सात पुत्र हुये । जिनके नाम । उद्भिद । वेणुमान । द्वैरथ । लम्बन । धृति । प्रभाकर । कपिल थे । इन्हीं के नाम पर सात देश हैं । यहां विद्रुम । हेमशील । धुमानु । पुष्पवान ।
कुशेशय । हरि । मन्दराचल ये सात पर्वत हैं । यहां धूतपापा । शिवा । पवित्रा । सन्मति । विधुदभ्र । मही ।
काशा ये सात नदी हैं ।
क्रौंच्च दीप के स्वामी धुतिमान के भी सात पुत्र थे । इनके नाम । कुशल । मन्दग । उष्ण । पीवर । अन्धकारक । मुनि । दुन्दुभि हुये । यहां । क्रौंच्च । वामन । अन्धकारक । दिवावृत । महाशैल । दुन्दुभि । पुण्डरीकवान
ये सात वर्ष पर्वत हैं । यहां । गौरी । कुमुद्वती । संध्या । रात्रि । मनोजवा । ख्याति । पुण्डरीका ये सात नदी
हैं ।
शाकदीप के राजा भव्य के भी सात पुत्र थे । इनके नाम । जलद । कुमार । सुकुमार । अरुणीबक । कुसुमोद ।
समोदार्कि । महाद्रुम थे । यहां । सुकुमारी । कुमारी । नलिनी । धेनुका । इक्षु । वेणुका । गभस्ति ये सात नदी
हैं ।
पुष्कर दीप के राजा शबल के दो पुत्र । महावीर और धातिक थे । इन्ही के नाम पर दो वर्ष या देश यहां थे ।इन दोनों देशों के मध्य मानसोत्तर नामक वर्षपर्वत है । यह पचास हजार योजन में फ़ैला हुआ तथा इतना ही ऊंचा है । यह मण्डलाकार है इस पुष्कर दीप को स्वादिष्ट जलवाला समुद्र चारों ओर से घेरकर स्थित है । उस समुद्र के सामने उससे दुगना जनजीवन से रहित । स्वर्णमयी जमीन वाली जगत की स्थित दिखाई देती है । यहां पर दस हजार योजन ( एक योजन बराबर बारह किलोमीटर ) में फ़ैला हुआ लोकालोक पर्वत है । जो अन्धकार से भरा हुआ है । यह अन्धकार भी अण्डकटाह से घिरा है ।
इस भूमि की ऊंचाई सत्तर हजार योजन है । इसमें दस दस हजार योजन की दूरी पर एक एक पाताल लोक स्थित है । जिन्हें अतल । वितल । नितल । गभिस्तान । महातल । सुतल । तथा पाताल कहते हैं । इन पाताल लोकों की भूमि । काली । सफ़ेद । लाल । पीला । शक्कर के समान । शैलमयी और स्वर्णमयी है । यहां पर दैत्य तथा नाग निवास करते हैं ।
अब दारुण पुष्कर दीप में जो नरक हैं । उनके नाम । रौरव । सूकर । रोध । ताल । विशसन । महाज्वाल । तप्तकुम्भ । लवण । विमोहित । रुधिर । वैतरणी । कृमिश । कृमिभोजन । असिपत्रवन । कृष्ण । नानाभक्ष
या लालाभक्ष । दारुण । पूयवह । पाप । वह्यिज्वाल । अधःशिरा । संदंश । कृष्णसूत्र । तमस । अवीचि । श्वभोजन । अप्रतिष्ठ । उष्णवीचि हैं । इनके ऊपर क्रमानुसार अन्य लोकों की स्थिति है । इन लोकों को जल । अग्नि । वायु । आकाश । घेरे हुये है । इस प्रकार अवस्थित ब्रह्माण्ड प्रधान तत्व से आवेष्टित है । वह ब्रह्माण्ड अन्य ब्रह्माण्ड की अपेक्षा दस गुना अधिक है ।
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