शुक्रवार, जुलाई 16, 2010

गाय में तैतीस करोङ देवताओं का रहस्य..???

गो और गौ शब्द में महज एक मात्रा का फ़र्क है । पर संस्कृत भाषा और इस एक शब्द ने हिंदू धर्म का न सिर्फ़ बहुत बङा नुकसान किया । बल्कि ढेरों फ़ालतू के रीत रिवाज और अंधविश्वास भी पैदा कर दिये । हाँलाकि गौ कोई नुकसानदेह नहीं है । इसकी चर्चा मैं आगे करूँगा । पर अध्याम चिंतन के स्तर पर इससे हमारा बेहद नुकसान हुआ । गो कहते हैं । इन्द्रियों को । और गौ कहते हैं । गाय को । तुलसीदास ने रामायण में लिखा है । गो गोचर जहाँ लगि मन जाई । सो सब माया जानों भाई ।
सीधी सी बात है । इन्द्रियाँ और उनके विचरण का स्थान ( गोचर ) यानी जहाँ तक मन कुलाँचे मारता है । यह सब माया जगत है । अर्थात इनमें सत्यता नहीं है । ये नहीं मानते । तो ये देखें । ब्रह्म सत्य ।जगत मिथ्या । मिथ्या यानी झूठ । जिसका तात्विक अर्थ ये है । कि ये अग्यान निद्रा में प्रतीत हो रहा है । वास्तव में इसका कोई अस्तित्व नहीं हैं । मुझसे लोग अक्सर इस विषय पर खासा मजाक करते हैं । बाबा ये रसगुल्ला खाकर देखो । मीठा भी है । मजा भी दे रहा है । और है भी । तो जब ये रसगुल्ला है । तो जगत फ़िर क्यों नहीं हैं ? वास्तव में असली और तात्विक स्तर पर इसका उत्तर देना साधारण बात नहीं है । पर " प्रभु कृपा " से एक उदाहरण मौजूद है । जो इसकी काट करता है ।
स्वप्न में भी रसगुल्ला होता है । शेर होता है । औरत होती है । कामवासना होती है । स्वप्न में क्या नहीं होता ? वहाँ भी रसगुल्ला मीठा लगता है । शेर से भय लगता है । स्वपन का नकली संभोग भी वीर्य स्खलित कर देता है । तो वो क्या सत्य होता है ? लेकिन उस अवस्था में उस समय बिलकुल सत्य ही लगता है ।
खैर । आज बात गौ और गो की हो रही है । हिंदू धर्म में जाने कब से ये मान्यता बन गयी कि गौ ( गाय ) में तैतीस करोङ देवताओं का वास होता है । बात तो सही है । पर गौ ( गाय ) में नहीं गो ( इन्द्रियों ) में होता है । अब ये गो और गौ एक कैसे हो गया । इस पर एक बङे पौराणिक शोध की आवश्यकता है । दरअसल पुराने समय से ही गाय भारतीय जनमानस का अटूट हिस्सा रही है । आपने कही नहीं पढा होगा कि श्रीकृष्ण गाय और भेंस चराने ले गये । रिषियों मुनियों के आश्रम में कहीं भेंस का जिक्र नहीं आया होगा । इसका रहस्य क्या है ? दूध । घी ।माखन । गोबर । मूत्र । मुँह से निकलने वाला फ़ेन । गाय के मुँह से निकलने वाली सांस । ये मानव जीवन के लिये इतनी उपयोगी है । कि इसके समान दूसरा पशु एक भी नहीं है ।
इसको कोई सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं है कि गाय के दुग्ध पदार्थ अन्य दूसरे दुधारू पशुओं की अपेक्षा अत्यन्त शक्तिशाली होते हैं । इसके गोबर और मूत्र से तमाम विषैले और बेहद हानिकारक कीटाणुओं जीवाणुओं का नाश हो जाता है । पँचगव्य । दूध । दही । घी । गोबर । मूत्र । का सेवन करने से अनेकों असाध्य रोग ठीक किये जा सकतें हैं । सांस का रोगी यदि इसके आसपास ही रहे तो कुछ ही दिनों में उसको बेहद लाभ होता है । इस तरह उपयोगी पशु के रूप में एक गाय के अनेकों लाभ हैं । श्रीकृष्ण और उनके घर वाले पागल नहीं थे । जो एक लाख गाय रखते थे । इक लख गऊएं नन्द बबा के । नौ मन माखन होय । वैसे यदि एक लाख सिर्फ़ नन्द जी के ही घर थी । तो पूरे गोकुल में दस लाख तो होंगी ही । ये रहती कहाँ होंगी ? इनका दूध कौन दुहता होगा ? मक्खन कौन निकालता होगा ? कितने पात्रों में रखा जाता होगा ? कितने लोग इस कार्य के लिये नियुक्त होंगें ? गौशाला कितनी बङी होगी ? क्योंकि गोकुल आदि अफ़्रीका या अमेरिका के बराबर क्षेत्रफ़ल वालें तो हैं नहीं ? ऐसे अधार्मिक प्रश्न कभी कभी मेरी भी उल्टी खोपढी में आ ही जातें हैं ।
( बचपन में पहली बार मैं रामलीला देखने गया । तो रावण के दस सिर देखकर मुझे टेंशन हो गयी कि यह सोते वक्त करवट कैसे लेता होगा ? हा..हा..हा ) इसी टेंशन प्रवृति से मैंने धर्म शोध में रुचि ली । इसीलिये मैं अक्सर अपने लेखों में जिक्र करता हूँ । कोई भी मामला हो । दिमाग की खिङकी खोलकर ही उस पर विचार करें । पर अफ़सोस धर्म के मामले में हमारे रवैया शुतुरमुर्ग जैसा ही है ।
तो साहब इस तरह यह गऊ माता अपनी उपयोगिता के कारण हमारे जीवन का अहम हिस्सा थी । अब हमारी ( खास तौर पर हिंदू धर्म की ) आदत है कि हम सूर्य की पूजा करते हैं । चन्द्रमा की पूजा करतें हैं । जल की । वायु की । इन्द्र की ( पानी बरसाता रहे । ) इसी तरह पत्नी द्वारा पति की । (करवाचौथ ) पति द्वारा पत्नी की ? यानी खुद अपनी पूजा छोङकर हर चूहे बिल्ली तक की पूजा करते हैं । तो गाय तो फ़िर भी बहुत उपयोगी थी । और इस दृष्टि से आदर के योग्य थी । सेवा के योग्य थी । इस तरह अपने महत्व के कारण गाय को अहम स्थान और आदर प्राप्त था । धीरे धीरे गो और गौ के फ़र्क को न जानने के कारण हम गाय में तैतीस करोङ देवता बताने लगे । जबकि तैतीस करोङ देवता हमारी गो यानी इन्द्रियों में विराजते हैं । यानी आँख का अलग । कान का अलग । नाक का अलग । ह्रदय का अलग । कामेंद्री का अलग । हाथ का अलग । पैर का अलग । पचीस प्रकृतियों के अलग । इस प्रकार सब कुल तैतीस करोङ आवृतियाँ बनती हैं । यानी मनुष्य में तैतीस करोङ विभिन्न क्रियायें या फ़ंकशन होते हैं । जिनका प्रत्येक का एक एक छोटा या बङा देवता नियुक्त होता हैं । इस तरह अब आप समझ गये होंगे कि तैतीस करोङ देवता गो ( इन्द्रियों ) में वास करते हैं न कि गौ ( गाय ) में । इस सम्बन्ध में और अधिक जानने के लिये पढें । मेरा लेख " क्या है । तैतीस करोङ देवताओं का रहस्य ??

गुरुवार, जुलाई 15, 2010

गुरुपूर्णिमा उत्सव पर आप सभी सादर आमन्त्रित हैं ।


गुर्रुब्रह्मा गुर्रुविष्णु गुर्रुदेव महेश्वरा । गुरुः साक्षात पारब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः ।श्री श्री 1008 श्री स्वामी शिवानन्द जी महाराज " परमहँस "
अनन्तकोटि नायक पारब्रह्म परमात्मा की अनुपम अमृत कृपा से ग्राम - उवाली । पो - उरथान । बुझिया के पुल के पास । करहल । मैंनपुरी । में सदगुरुपूर्णिमा उत्सव बङी धूमधाम से सम्पन्न होने जा रहा है । गुरुपूर्णिमा उत्सव का मुख्य उद्देश्य इस असार संसार में व्याकुल पीङित एवं अविधा
से ग्रसित श्रद्धालु भक्तों को ग्यान अमृत का पान कराया जायेगा । यह जीवात्मा सनातन काल से जनम मरण की चक्की में पिसता हुआ धक्के खा रहा है व जघन्य यातनाओं से त्रस्त एवं बैचेन है ।
जिसे उद्धार करने एवं अमृत पिलाकर सदगुरुदेव यातनाओं से अपनी कृपा से मुक्ति करा देते हैं । अतः ऐसे सुअवसर को न भूलें एवं अपनी आत्मा का उद्धार करें । सदगुरुदेव का कहना है । कि मनुष्य यदि पूरी तरह से ग्यान भक्ति के प्रति समर्पण हो । तो आत्मा को परमात्मा को जानने में सदगुरु की कृपा से पन्द्रह मिनट का समय लगता है । इसलिये ऐसे पुनीत अवसर का लाभ उठाकर आत्मा की अमरता प्राप्त करें ।
नोट-- यह आयोजन 25-07-2010 को उवाली ( करहल ) में होगा । जिसमें दो दिन पूर्व से ही दूर दूर से पधारने वाले संत आत्म ग्यान पर सतसंग करेंगे ।
विनीत -
राजीव कुलश्रेष्ठ । आगरा । पंकज अग्रवाल । मैंनपुरी । पंकज कुलश्रेष्ठ । आगरा । अजब सिंह परमार । जगनेर ( आगरा ) । राधारमण गौतम । आगरा । फ़ौरन सिंह । आगरा । रामप्रकाश राठौर । कुसुमाखेङा ।
भूरे बाबा उर्फ़ पागलानन्द बाबा । करहल । चेतनदास । न . जंगी मैंनपुरी । विजयदास । मैंनपुरी । बालकृष्ण श्रीवास्तव । आगरा । संजय कुलश्रेष्ठ । आगरा । रामसेवक कुलश्रेष्ठ । आगरा । चरन सिंह यादव । उवाली ( मैंनपुरी । उदयवीर सिंह यादव । उवाली ( मैंनपुरी । मुकेश यादव । उवाली । मैंनपुरी ।
रामवीर सिंह यादव । बुझिया का पुल । करहल । सत्यवीर सिंह यादव । बुझिया का पुल । करहल । कायम सिंह । रमेश चन्द्र । नेत्रपाल सिंह । अशोक कुमार । सरवीर सिंह

रविवार, जुलाई 11, 2010

टोटका @ जैसे को तैसा

शिकोहाबाद से सुनयना श्रीवास्तव का फ़ोन आया । कि किसी ने उसके मकान के ऊपर वाले हिस्से में । यानी छत वाले पोर्शन में । लेट्रीन की दीवाल में ईंटों की संधि में एक काले कपङे में बाँधकर कुछ सामान रख दिया था । इसे देखकर वह चिंतित हो गयी । क्योंकि साफ़ तौर पर यह किसी अन्य द्वारा किया गया टोटका था । बल्कि ये अन्य द्वारा नहीं । उसी की एकमात्र पङोसन सरला द्वारा किया गया । टोटका था । ऐसा इसलिये था । क्योंकि सुनयना की छत मात्र उसी पडोसन से मिलती थी । और किसी का वहाँ
पहुँचना मुमकिन ही नहीं था । सुनयना चिंतित हो उठी । क्योंकि ऐसे ही एक टोटके के फ़लस्वरूप वह अपने ऊपर काफ़ी गम्भीर परिणाम भोग चुकी थी । और वह इस तरह के टोटके का उपाय भी अब जानती थी । वह उपाय ये था । कि किसी बाल्टी आदि से पानी की तेज धारा से इस टोटके को छुये बिना दूर बहा दिया जाय । लेकिन यह टोटका ऊँचे स्थान पर रखा था । अतः ये उपाय काम नहीं कर सकता था । अतः उसने झाङू में फ़ंसाकर उस टोटके को दूर सङक पर फ़ेंक दिया । ये उपाय भी किसी हद तक सही था । लेकिन फ़िर भी वह किसी घटना को लेकर आशंकित थी । दरअसल जिन क्षेत्रों में हमें जानकारी नहीं होती । उनमें हमारा आशंकित होना । भयभीत होना स्वाभाविक ही है । इसी उधेङबुन में उसे मेरा ख्याल आया । और उसने फ़ोन पर मुझे सारी बात बतायी । मैंने कहा । don't worry . जो जैसा करता है । वैसा भरता है ? उसने कहा । फ़िर पहले दूसरे का किया । मुझे क्यों भरना पङा ?
मैंने कहा । वह छुपकर किया गया वार था । जो अनजाने में तुम्हें लग गया । लेकिन बाद में उसको ही भोगना पङा । यदि कोई पागल तुम्हें ईंट मार रहा है । तो उससे बचाव करना । और उस बचाव का तरीका जानना भी तुम्हारे लिये आवश्यक है । ये संसार का नियम है ।पर सुनयना संतुष्ट न हुयी ।
तीन दिन बाद उसका दूसरा फ़ोन आया । सुनयना द्वारा छत से सङक पर फ़ेंका गया टोटका शीघ्र ही उस गली में चर्चा का विषय बन गया । मध्यम आलू के साइज की वह काले कपङे की छोटी पोटली को गली की सभी औरतें पुरुष उत्सुकता से देख रहे थे । पर न कोई छू रहा था । न कोई खोलकर देखने का साहस कर रहा था । तभी गली की एक लालची औरत ने कहा । कि वह इस टोटके को खोल देगी । परन्तु इसमें जो भी निकलेगा । वह सामान उसी का होगा । किसी को क्या आपत्ति हो सकती थी ।
वास्तव में वह औरत सोच रही थी कि इसमें रुपये या चाँदी सोने की कोई चीज भी हो सकती है ? किसी ने कुछ नहीं कहा । तो उसने वो पोटली खोल दी । पोटली में हल्दी की गांठ । लोंग । बताशे । फ़ूल । बालों का छोटा गुच्छा और एक रुपया था । सिंदूर आदि जैसा भी रंग था । निश्चय ही ये टोटका था । खिसियायी सी लालची औरत एक रुपये का भी लोभ नहीं छोङ पायी । और उसे ले गयी ।
जैसा कि होना था । टोटके को छेङ देने से वो उसी दिन अप्रत्याशित रूप से गम्भीर स्थिति में बीमार पङ गयी । और एक रुपये के चक्कर में तीन सौ रुपये इलाज में उठ गये । और बेहद कमजोर हो गयी । सो अलग । सुनयना ने विजयी भाव से यही बताने के लिये फ़ोन किया था । कि देखो उसकी बात सही निकली । टोटका अपना काम कर गया । किया किसीने । भरना किसी को पङा । अब वह निश्चिंत थी क्योंकि टोटका रूपी कारतूस चल चुका था । और बुझा कारतूस कुछ नहीं बिगाङ सकता था । उसने मेरी हँसी बनाते हुये कहा । उसका ( पडोसन ) तो कुछ नहीं हुआ । जिसने टोटका किया था ?
मैंने कहा । धैर्य रखो.. ?
दरअसल ये घटना जिस स्थान की है । उसको और इस घटना से जुङे लोगों से मैं भली प्रकार परिचित था । रमेश दुबे मृतक संस्कार कराने वाला एक निम्न पंडित था । और एक मृतक संस्कार में मृतक की हैसियत के अनुसार उसे काफ़ी सामान और पैसा मिल जाता था । पहले रमेश दुबे एक अत्यन्त सीधे सच्चे स्वभाव का व्यक्ति था । और उसे भली प्रकार अहसास था कि वह किस स्तर का पंडित है ? कालांतर में उसका जीवन कई ऊँच नीच घटनाओं से गुजरा । और रमेश को अहसास हुआ कि पैसा और प्रतिष्ठा के बिना इस निर्दयी समाज में जीवन कीङे मकोङे के समान ही है । रमेश के एक मामा मन्त्रविधा । हस्तरेखा तन्त्रविधा आदि के ग्याता थे । वह अक्सर आते थे । पर टोना टोटका से उनका सम्बन्ध मैंने कभी नहीं सुना था । न ही वह किसी के अहित के लिये इन विध्याओं का प्रयोग करते थे ।
उस बस्ती में कुछ अन्य भगत थे । जो पैसे के बदले ऐसी क्रियाओं को अंजाम देते थे । उन्होंने रमेश को इन विधाओं के बारे में जानकारी देनी चाही । पर उसने अधिक इंट्रेस्ट नहीं लिया । उसे धन कमाने की धुन सवार थी ।
कुछ समय पश्चात रमेश का विवाह कन्नोज के पास से हुआ । और यहीं से उसके जीवन में बदलाव आना शुरु हो गया । रमेश की पत्नी न सिर्फ़ रंगीले स्वभाव की थी । बल्कि इस तरह के टोना टोटका तन्त्र मन्त्र की कई विध्याओं की माहिर थी । कुछ समय तो उसने ससुराल में शान्ति से काटा । और फ़िर अपना रंग दिखाना शुरु कर दिया । रमेश को भांग का सेवन करने की आदत थी । और वह अपनी पत्नी की उफ़नती नदिया के समान उमङती जवानी को उसकी चाहत के अनुसार पूर्ति करने में नाकामयाब रहा । तान्त्रिक परिवार से आयी हुयी लङकी इन मामलो में पहले ही तेज थी । लिहाजा रमेश के काम पर जाते ही उसके पास मनचलों की भीङ इकठ्ठी होने लगती । इसी बीच में क्या हुआ । कि रमेश के मन्त्रविध्या के जानकार मामा का असमय ही अंत समय आ गया । और उन्होंने अपना ग्यान । विध्या । और शक्ति जाते जाते रमेश को दे दी । अब ये दोनों पति पत्नी एक जैसे हो गये । धीरे धीरे
उसकी पत्नी झाङ फ़ूंक और अन्य इलाज करने लगी । और रमेश भी सप्ताह में एक दिन देवी के नाम पर गद्दी लगाने लगा । सहारा देवी का और काम नीचता के । जाहिर है । कि इससे उनकी अतिरिक्त आमदनी होने लगी । और रमेश बाबू महा पंडित के रूप में पुजने लगे ।
अब रमेश के पास काफ़ी दूर दूर से लोग अपनी तरह तरह की भूत आदि की समस्यायें । बीमारी । बिजनेस न चलना । जैसी समस्या ले के आने लगे । मुहल्ले के लोग रमेश की इस बङती ख्याति से काफ़ी प्रसन्न हुये और उसकी इज्जत करने लगे । ऐसे ही किसी समय में मैं एक बार सुनयना के घर पहुँचा था । जब उसने मुझे सारी बात बताई थी । सुनयना भी रमेश से एक दो बार चाँदी की पायल खोने पर पूछ आयी थी । जिसे रमेश ने गोलमाल उत्तर के रूप में कि घर में ही है । कह दिया था ।
मैंने उसे हिदायत दी । कि वैसे तो उसकी मर्जी है । जो चाहे करे । पर अगर मेरी माने तो रमेश की ऐसे मामलों में सहायता न ले ।क्योंकि...? अब आईये । इस घटना के मुख्य किरदार के बारे में बात करते हैं । सुनयना की पडोसन सरला देवी पचास साल की धार्मिक औरत थी । और धन परिवार आदि से संतुष्ट सुखी जीवन जी रही थी । वह भी कभी कभी रमेश की गद्दी में चली जाती थी । और कमर दर्द आदि जैसी बातों के लिये ही झाङ फ़ूंक करवा
लेती थी । एक दो बार उसका बुखार कई दिनों तक न उतरा । जो संयोगवश रमेश के " झारा " देने पर उतर गया । इससे सरला की श्रद्धा रमेश के प्रति और भी बङ गयी । इसी समय में सरला का नवजात नाती जो छह महीने का था । उसे नजर लग गयी । और वो अक्सर रोता रहता था । रमेश ने झारा लगाकर उसको भी ठीक कर दिया । और उसके लिये कई गंडे ताबीज बना डाले । मैं ऐसे ही एक समय सरला के घर गया । तो उसका पूरा परिवार ही मुझे गंडा ताबीज पहने नजर आया ।
पर मैंने उनसे कुछ कहा नहीं । इस परिवार का रमेश की गद्दी में काफ़ी आना जाना हो गया था । इसी बीच सरला की पुत्रवधू काफ़ी बीमार रहने लगी थी । और ...? डेढ साल बाद ..?
सुनयना का फ़ोन आया । तो बातों ही बातों में सरला का जिक्र छिङ गया । सरला का हँसता खेलता परिवार घोर विपत्तियों के मकङजाल में फ़ँस चुका था । उसकी पुत्रवधू दो बार आत्महत्या की कोशिश कर चुकी थी । पर बहुत प्रयास करके सतर्कता से बचा ली गयी ।अब वह अलग मकान लेकर रहने लगी थी । और बेहद जिद्दी स्वभाव की हो गयी थी । सरला और उसका पति अनजानी गम्भीर बीमारियों से ग्रसित हो गये थे । ये सुखी परिवार टूटकर बिखर चुका था । और अनजानी आशंकाओं से सहमा हुआ
दहशत में जीता था । रमेश बाबू के सारे " टोटके " फ़ैल हो गये थे । और खुद की पत्नी के आचरण से रमेश उखङा उखङा रहता था । वह अपनी पत्नी की बदचलनी के बारे में भली भांति जानता था ।
अंत बुरे का बुरा । इसी को कलियुग की मलेच्छ प्रवृति कहा गया है ।
अब मैं वह रहस्य क्लियर करता हूँ । जिनके लिये मैंने इस लेख में ? का प्रयोग किया है । दरअसल टोना टोटका । मन्त्र आदि द्वारा नीच कर्म में प्रवृत्त होना । उसी तरह है । जैसे कि एक निर्बल किस्म के इंसान को कुछ छिछोरे टायप के लोग परेशान करें । और उनसे बदला लेने के लिये वह भले आदमियों की जगह गुन्डो का सहारा ले । तो वे गुन्डे जो ऐसे ही मौकों की ताक में रहते हैं । उस समय तो बङिया सहारा देंगे ।आप भी खुश हो जाओगे । भाई बहुत अच्छे आदमी हैं । लेकिन बाद में वही " बबाल ए जान " बन जायेंगे । और तुम्हारे ही घर में बैठकर माँस मदिरा का सेवन करेंगे । जुआ खेलेंगे । और तुम्हारी ही बहन बेटी से ढीटता से काम भोग करेंगे । और तुम लाचारी से देखने के सिवाय कुछ नहीं कर पाओगे । क्योंकि इस स्थिति को स्वयं तुमने निमन्त्रण दिया था ।
ठीक ऐसे ही ये देवी आदि के नाम पर गद्दी लगाने वाले वास्तव में कुछ नीच शक्तियों के उपासक होते हैं । जो शीघ्र सिद्ध हो जाती हैं । क्योंकि वास्तव में वे तो गुंडो की भांति चाहते ही हैं कि उन्हें खुराक देने वाला कोई मिले । ये भूत प्रेत और छोटी तपस्या के बल पर बनी देवियाँ छोटे मोटे काम और छोटे मोटे रहस्य बताने में सक्षम होते हैं । और भगत लोग आसानी से इनसे कार्य लेने लगते हैं ।
जिसका भारी मुआवजा । अंत में भगत और इनसे सहायता लेने वाले को चुकाना ही पङता है । जरा विचार करें । नव दुर्गा के अन्तर्गत आने वाली देवी । कोई मामूली देवी है । जो तुम्हारी खोई हुयी तोङिया ( पायल ) बतायेगी । तुम्हारी कमर का दर्द ठीक करेगी । तुम्हारे नाती का बुखार उतारेगी । और हर हफ़्ते जाने कितने । ऐरे गेरे नत्थू खेरे । गद्दी लगाते हैं । उन सबके हाजिरी देगी । देवी शक्ति । इच्छा शक्ति है और एक बङी ताकत है । जिसके आवेश के लिये सुन्दर व्यवस्था । एक लम्बी तपस्या । एक लम्बा सदाचारी जीवन । और अन्य बहुत कुछ की आवश्यकता होती है । उदाहरण । रामकृष्ण परमहँस । तो आप विचार करें । कि गली गली में देवी को बुलाने वाले क्या और किस स्तर के लोग हैं ? और आप इनसे जुङकर किन्ही नीच दुष्ट शक्तियो के अदृष्य मकङजाल में तो नहीं फ़ँस रहे ?
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