बुधवार, मार्च 31, 2010

भक्ति से सब प्राप्त हो सकता है..

भक्ति स्वतंत्र सकल सुख खाणी . बिनु सत्संग ना पावहिं प्राणी...
तुलसी का ये दोहा बेहद विलक्षण है . भक्ति..वास्तविक भक्ति
स्वतंत्र है कोई बन्धन नहीं कोई नियम नहीं कोई देवता नहीं
ये गूढ भक्ति सम्पूर्ण सुखों की खान है..लेकिन कोई भी इसको
बिना सत्संग के नहीं पा सकता है..क्या तुलसी झूठ बोल रहे है
हरगिज नहीं..फ़िर भक्ति तो सभी कर रहें हैं और सभी दुखी
और अशान्त है..तुलसी कौन से सत्संग की बात कर रहे है .
सत्संग तो आजकल इतना सस्ता है कि रोटी सब्जी उससे कई गुना महँगी है सुबह उठकर टी.वी खोलो तो सत्संग सुनाने वालों की लम्बी लाइन लगी है..फ़िर हमें सम्पूर्ण सुख क्यों नहीं मिल रहे ..दरअसल तुलसी जिस सत्संग की बात कर रहे वो सुनने का नहीं बल्कि अनुभव का सत्संग है..हँस दीक्षा पा लेने के बाद के अनुभव का सत्संग ..आगे देखिये..
एक घङी आधी घङी आधी हू पुनि आधि .
तुलसी संगति साधु की कटे कोटि अपराध..
ये चौथाई घङी की संगति कौन सी संगति है जो हमारे करोङो जन्म के अपराध काटने की क्षमता रखती है..मैं फ़िर कहूँगा क्या तुलसीदास झूठ बोल रहे हैं ...? हरगिज नहीं ..दरअसल ये सच्चे संत की संगति की तरफ़ तुलसी ने इशारा किया है और सच्चे संत थोक के भाव नहीं मिलते विचार करें ऐसा होता तो पापमुक्त होना कितना आसान था..आज कितने
संत हैं जो आसानी से सुलभ हैं और हरेक ने कभी न कभी अपने जीवन में सौ , दोसौ घंटे का सत्संग अवश्य सुना होगा तो फ़िर परेशानी क्या है..दरअसल जिन प्रवचनकर्ताओं को आप संत मानते हैं उनकी भीङ हमेशा बनी रही है .द्वापर युग के लास्ट में परीक्षित जब शापित हो गया और म्रत्यु के भय से मुक्ति का रास्ता खोज रहा था तो अठासी हजार ॠषियों ने कहा राजन जो तुम खोज रहे हो वो कोई मामूली बात नही हैं ..भले ही ये आश्चर्य की बात हो पर आयु में हम सबसे बहुत छोटे श्री शुकदेव जी ही इस ग्यान को जानते हैं .
तात स्वर्ग अपवर्ग सुख धरिय तुला इक अंग ...तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सत्संग..
हे तात..स्वर्ग और अपवर्ग (प्रायः लोग स्वर्ग को ही सबसे बङा स्थान मानते हैं और मरने के बाद स्वर्ग पहुँच जाना सबसे बङी उपलब्धि..मुझे क्षमा करें पर किसी का देहांत होने के बाद उसे स्वर्गवासी कहा जाता है और प्रायः सभी
के लिये ऐसा कहतें है .जरा विचार करें मरने से आदमी स्वर्गवासी हो जाता है इससे बङी बात क्या हो सकती है..खैर..अपवर्ग स्वर्ग की अपेक्षा कई गुना बेहतर हैं पर वो भी कोई बङी उपलब्धि नहीं ..ये मैं नहीं कह रहा तुलसी कह रहें है कि तराजू के एक पलङे में स्वर्ग और अपवर्ग दोनों को रख दो फ़िर भी इनकी महत्ता उतनी भी नहीं बल्कि उसके सामने एक तिनके की हैसियत रखती है जो महत्व एक क्षण के सत्संग का है जाहिर है ये सत्संग कोई बेहद ऊँची ही चीज है और थोङी हँसी सी आती है आजकल मुफ़्त में मिल रहा है ..मैं इतना ही कह सकता हूँ ..जय हो कलियुग की..आगे क्या बताऊँ आप मुझसे ज्यादा ही समझदार हैं .??

अलख हमारा देश है ..

जाति हमारी आत्मा ,प्राण हमारा नाम .
अलख हमारा देश है , गगन हमारा ग्राम ..
जब कभी सत्संग होता है तो प्रायः बहुत से लोग कहते हैं कि कोई ऐसी बात बताओ जिसमें थोङे में ही बहुत कुछ हो...वास्तव में कबीर का ऊपर लिखा दोहा हरेक जीव के लिये लिये अंतिम सत्य है..इससे बङा न कोई सत्य है और न ही कभी होगा..बस लिखे हुये इस परिचय को जिसको तुम भूल गये हो जानना होगा..दोहे का अर्थ ज्यादा कठिन नहीं है .इसलिये मैंने विद्धता दिखाना आवश्यक नहीं समझा .
मात पिता भगिनी सुत दारा ,ये सब माया क्रत परिवारा ...
तुलसी का ये दोहा मेरे लिये अक्सर विवाद का विषय बनता है .मैं सत्संग में अक्सर कहता हूँ कि माता पिता बहन पुत्र भाई आदि जो भी तुम्हारे सम्बन्धी है ये सब माया है . इस पर लोग बिगङ जाते है ..बाबाजी तुम तो हमारे घर को ही बिगाङने के चक्कर में हो..मैं उत्तर देता हूँ कि तुम तुलसी को मानते हो रामायण का अखंड पाठ या उसके किसी अंश जैसेसुन्दरकाण्ड
बालकाण्ड आदि का पाठ करते हो..हाँ बाबा करते हैं...तो फ़िर भैया ये मैं नहीं कह रहा ..ये तो तुलसी बाबा कह रहा है..तब हारकर उन्हें चुप रह जाना पङता है...अगर मैंने यही बात कही होती तो लोग डंडा बजा सकते थे..वास्तव में रामचरितमानस में ऐसे अनेक गूढ रहस्य वाले दोहे है जिन पर आमतौर पर लोगों का ध्यान नहीं जाता..मैं समय समय पर ऐसे दोहों का
विवेचन आपके लिये पेश करता रहूँगा..वास्तव में तुलसीदास ने इस दोहे में यह बताया है कि जिस परिवार में तुझे इतनी आसक्ति है ये कभी पूर्वजन्मों की आसक्ति का ही फ़ल है और तू मुक्त और अमरलोक का आत्मा अपनी आसक्ति के कारण ही फ़ँसा दुर्दशा को प्राप्त है..हकीकत में तो तेरा कोई परिवार ही नही है ..इसका ये अर्थ नहीं है कि अपने परिवार को ही दुश्मन मान लो . बल्कि ये समस्त जीव जगत ही तेरा परिवार है और तू सबसे प्रेम कर मोह न कर ..ये कैसा प्रेम है और ये कैसा रहस्य है ये ढाई अक्षर का महामन्त्र जिसमें कि मन से परे देखने की शक्ति है हमें अपने आप बताने लगता है .
गांठी दाम न बाँधहि नहिं नारी से नेह ..कह कबीर उन संत की हम लें चरनन की खेह ..
जो जेव में एक भी पैसा न रखता हो और औरत से (कामवासना रूपी लगाव ) कोई लगाव न रखता हो .कबीर कहते है कि ऐसे संत की चरनधूलि पाकर कोई भी धन्य हो सकता है..वास्तव में कबीर ने सच्चे संत और गुरु की तरफ़ इशारा किया है सच्चे संत के ये दो प्रमुख लक्षण हैं .

चिठ्ठी का मतलब समझो..और पते पर पहुँचो..

मैंने एक बात अक्सर देखी है कि जीवन की कोई छोटीमोटी
कला के भी आप कलाकार होंगे तो लोग आपको ग्यानी मानेंगे
लेकिन आप जब धार्मिक चर्चा करेंगे तो उसमें अपना ग्यान
बताने वाले और विरोध करने वाले बङी संख्या में होंगे..कल
की वार्ता में बहस का मुद्दा ये था कि किसी पुराण या रामायण
कथा भागवत या कोई अखंड पाठ बार बार दोहराने का कुछ
लाभ है.लोगों का मानना था कि इससे मुक्ति हो जायेगी..और
बस इतना ही बहुत है..मेरा मानना थोङा अलग था..जैसे आप
प्रधानमन्त्री या किसी सफ़ल आदमी का जीवनपरिचय बार बार पङते रहें तो क्या आप प्रधानमन्त्री बन जायेंगे ..कम से कम मेरे विचार में तो ऐसा नहीं हो सकता .किसी सफ़ल आदमी का जीवन परिचय पङना प्रेरणा का तो कार्य कर सकता है पर पङने से ही हम उसके समान हो जाँय ऐसा नही हो सकता है..पर हम असल व्यवहार ऐसा ही करते हैं ..वास्तव में ये वेद पुराण या अन्य धार्मिक ग्रन्थ भवसागर से पार जाने के लिये भगवान की चिठ्ठियां मात्र हैं इनमें लिखे पते को पढ लो कैसे जाना है उसका मतलव समझ लो और धीरे धीरे चलने की व्यवस्था करो बार बार चिठ्ठी ही पङते रहोगे तो जाओगे कब .ये अनमोल जीवन जो साढे बारह लाख साल की चार प्रकार की चौरासी लाख योनियों को भोगने के बाद मिलता है फ़िर सहज ही नहीं मिलने बाला..लोग कहते हैं जो तुम कह रहे हो उसका क्या प्रमाण है..मैं कहता हूँ इस दुनियां में अमेरिका है ? हाँ है
मैं कहता हूँ इसका क्या प्रमाण है..सामने वाला कहता है कि प्रमाण चाहिये तो अमेरिका चलकर आँखों से देखना
होगा..मैं कहता हूँ प्रभु की सत्ता को जानना है धर्म ग्रन्थों में लिखी बातों का सत्य जानना है तो आपको नामजहाज की सवारी पर बैठना होगा..ढाई अक्षर का ये नाम जहाज आपको अद्रश्य और अलौकिक दुनिया में ले जायेगा ये निश्चित है औरये भी मैं नहीं शंकरजी .गौतम, बुद्ध, महावीर ,नानक ,कबीर तुलसी, रामक्रष्ण परमहँस ,दादू ,मीरा,विवेकानन्द...लिस्ट लम्बी है ने कहा है..
कहे हूँ कह जात हूँ , कहूँ बजाकर ढोल.स्वांसा खाली जात है तीन लोक का मोल .??
रैन गवांयी सोय के , दिवस गवांया खाय ...मानस जन्म अमोल था कोङी बदले जाय .??

विष्णु की नाक में रुई..?

एक औरत किसी लालसा से बहुत दिनों तक विष्णु की भक्ति
करती रही पर कोई फ़ल प्राप्त नहीं हुआ ..तब किसी ने उसे
सुझाव दिया कि शंकर की भक्ति करो उससे जल्दी लाभ होगा
उसने वैसा ही करने की सोची लेकिन सुझाव देने वाले ने कहा
ऐसा करना कि शंकर को ऊँचा रखना और विष्णु को नीचे..
उस औरत ने बात मान ली और विष्णु को उठाकर नीचे रख
दिया और शंकर को ऊपर वाले खाने में बैठा दिया..फ़िर जब
वह औरत पूजा आदि के लिये अगरवत्ती जलाने लगी तो
उसको ख्याल आया कि अगरवत्ती की खुशबू विष्णु को भी
लगेगी और इस तरह तो उनकी भी पूजा हो जायेगी..तो
मेरा शायद काम न हो ..फ़िर कुछ विचार करके उसने विष्णु
की नाक में रुई चिपका दी और पूजा करने लगी ..इससे विष्णु
प्रकट हो गये.और कहा कि तुम्हारी आस्था कितनी सच्ची है जो इस मूर्ति में भी तुम असली का अनुभव भाव रखती हो..कहते हैं कि विष्णु ने उसकी इच्छा पूरी कर दी .

तुलसी जा संसार को भयो मोतियाबिंद..

एक बार की बात है तुलसीदास जी सत्संग कर रहे थे . अचानक वे मौज में बोले..
घट में है सूझत नहीं लानत ऐसी जिन्द .
तुलसी जा संसार को भयो मोतियाबिंद ..
अर्थात वो सर्वव्यापी परमात्मा और कहीं नहीं तेरे इसी घट (शरीर) में तो है पर तुझे दिखाई नहीं देता . ऐसी जिन्दगी को लानत है..इस संसार को मोतियाबिंद हो गया है.
किसी शिष्य ने उत्सुकता से कहा..महाराज जी ये मोतियाबिंद हो तो गया अब कटेगा कैसे..? तुलसी ने उत्तर दिया..
सतगुरु पूरे वैध है अंजन है सतसंग .
ग्यान सराई जब लगे तो कटे मोतियाबिंद ..
अर्थात पूर्ण सतगुरु ही इसके वैध है और अंजन इसका सत्संग है..ये जब ग्यान रूपी सलाई से लगाया जाता है तो अग्यान रूपी मोतियाबिंद कट जाता है .
कस्तूरी कुंडल बसे म्रग ढूँढे वन मांहि .
ऐसे घट घट राम है दुनिया देखे नांहि ..
इसका अर्थ बताना जरूरी नही ..पर कभी कभी कितना आश्चर्य होता है..
मलहि कि छूटे मल के धोये , घ्रत पाव कोई वारि बिलोये .
अर्थात गन्दगी से गन्दगी नहीं छूटती और पानी को बिलोने(छाछ की तरह ) से घी नहीं निकलता .. ये सच है कि माचिस में आग है पर उसको जलाना पङेगा.. ये सच है कि दूध में घी है पर उसको निकालना पङेगा.. ये सच है कि परमात्मा तुम्हारे अंदर है .पर एक विशेष युक्ति से तुम्हें उससे मिलना होगा . जय गुरुदेव की..जय राम जी की ..

ग्यान के चार मार्ग..

अलौकिक ग्यान के तीन मार्ग हैं और आत्मग्यान का सिर्फ़ एक ही मार्ग है..इस विषय पर विद्धानों में काफ़ी मतभेद हो सकते हैं पर मेरा अनुभव तो यही कहता है. मैं किसी को बाध्य भी नहीं करता कि वो मेरी ही बात सही माने.. मैं सबसे नीचे से चलता हूँ..आप लोग खुद ही समझ सकते हैं कि सही क्या है..?
4-मीन मार्ग- मीन मछली को कहते हैं. यहाँ खास बात ये है कि मछली कितनी उँचाई तक जा सकती है और उसकी क्षमता क्या है..?
मछली दरअसल पानी की लहर के साथ ही ऊँचाई पर जा सकती है और जैसे ही लहर नीचे होगी . मछली नीचे आ जायेगी .
-- वास्तव में इसकी तुलना उन छोटे छोटे सिद्धों से की गयी है जो कि छोटी मोटी सिद्धि के द्वारा कुछ चमत्कारिक चीजें दिखलातें हैं . ये भी गिनती में बहुत नही होते पर अक्सर इनका मिल जाना कोई बङी बात भी नही है .
3-मरकट मार्ग- मरकट बंदर को कहते है . बंदर पेङ पर रहता है और जाहिर है कि उसकी पहुँच पेङ की सबसे ऊपर की डाली तक हो सकती है इससे ऊपर पहुँच पाना उसके लिये संभव नही है
--इस तुलना में भी सिद्धि ही आते है पर ये "मीन " की अपेक्षा काफ़ी शक्तिशाली होते है और कई प्रकार के असंभव कार्य कर सकते है . जैसे पानी पर चलना..आग पर चलना आदि हजारों प्रकार की नहीं बल्कि लाखों प्रकार की सिद्धियां होती है..ये योगी उनमें फ़ँस जाते हैं और योगमार्ग से पथभ्रष्ट हो जाते है..फ़िर भी ये
दुर्लभ ही होते हैं और अपनी सिद्धी के बल पर बिलासितापूर्ण जीवन जीते है और अंत में भक्ति के दुरुपयोग से इनको नरक की प्राप्ति होती है..पर अपने जीवनकाल में इनकी भगवान के समान पूजा होती है .
2-मकर मार्ग-मकर मकङी को कहते है..मकङी भले ही आपको एक छोटा जीव लगती हो पर इसकी विलक्षण खूबी पर आपका कभी ध्यान गया है ..ये अपना संसार खुद ही बना लेती है ये कहीं भी चली जाय इच्छा होते ही यह अपने मुँह से तार निकालती है और जाला बुनकर रहने लगती है..दूसरे ये अपने ही तार के सहारे बेहद ऊँचाई से उतर भी सकती है और चङ भी सकती है..ये तार निकालती भी है और स्वयं अपना तार खा भी जाती है..यानी रहने के लिये यह स्वयं पर ही निर्भर है..बस इसमें एक कमीं होती है कि अपना जाल ये बिना किसी सहारे (आधार ) के नही बना सकती है .
--तुलना..जाहिर है कि ऐसा योगी कितना शक्तिशाली होगा आप कल्पना नहीं कर सकते ..आप को वो किस्सा याद होगा कि एक राजा जीते जी स्वर्ग जाना चाहता था .वह वशिष्ठ जी के पास गया तो उन्होनें विनम्रता से मना कर दिया और विश्वामित्र जो उनसे चिङते थे ..इसी बात पर राजा को स्वर्ग में भेजने को तैयार हो गये..क्योंकि जीते जी स्वर्ग जाना नियम के विरुद्ध था..अतः दोनों में ठन गयी .विश्वामित्र ने उसे अपने योगबल से स्वर्ग की तरफ़ उठाया और वशिष्ठ ने उसे वहीं रोक दिया..और वह त्रिशंकु होकर लट्का रहा .बाद में विश्वामित्र ने अपनी बात रखने के लिये योगबल से एक अलग स्वर्ग (मकङी की तरह ) का निर्माण कर दिया..ये इसी मार्ग के योगी थे..ये बहुत ही दुर्लभ होतें हैं इसमें कोई सन्देह नहीं हैं .
1-विहंगम मार्ग--विहंगम पक्षी को कहते हैं..पक्षी के बारे में यहाँ ऊँचाई और पहुँच के लिये कहा गया है जाहिर है कि पक्षी आसमान की अनंत ऊँचाइयों में कहीं भी किधर भी आ जा सकता है वह अपनी इच्छा से एकदम प्रथ्वी पर और फ़िर अनंत आसमान में कहीं भी आ जा सकता है . यही संतो का मार्ग है..और यही मुक्ति का मार्ग भी है..आप स्वयंतुलना करे कि ऊपर के तीनों मार्गों की सीमाएं हैं और जब सीमा है तो बन्धन है..तो फ़िर आत्मा मुक्त कहाँ हुयी..इससे ज्यादा वताना वर्जित है..वास्तव में साधारण अवस्था में जीवों को अलौकिक ग्यान के बारे में अधिक बताना लाभ की जगह उनका नुकसान करना ही है और इसीलिये इसे प्रभु की आग्या से गुप्त रखा गया है..देखें गीता आदि धर्मग्रन्थ..जब जीव को आत्मा के उद्धार की चिंता होती है तव ये ग्यान गुरु द्वारा विधिवत दिया जाता है .

भूत के पैर..तुमने मेरे पैर नहीं देखे.??.

ये किस्सा मुझ एक मित्र ने बताया..एक टेम्पो चलाने वाला रात के समय मैंनपुरी से भोगाँव वाली सङक पर जा रहा था.उसकी टेम्पो में दो औरते बैठी हुयी थी..रास्ते में एक भुतहा स्थान पङता है..रात के ग्यारह बजे के लगभग का समय था..अचानक रास्ते में दो सवारियां नजर आयीं जो टेम्पो को रुकने का इशारा कर रही थी..टेम्पो वाला रोकता
इससे पहले ही उसका ध्यान उनके पैरों की तरफ़ गया और वो बिना रोके ही टेम्पो निकाल ले गया..वह बेहद घबराया हुआ था..टेम्पो वाली सवारियों ने पूछा .तुमने उन्हें बैठाया क्यों नहीं..?
वह बोला कि तुमने देखा नहीं वो कौन थे ..उनके पैर नहीं थे .और जानते हो पैर किसके नहीं होते..?
वे सवारियां मुस्कराकर बोली ..लगता है तुमने बिठाते
समय हमारे पैर नहीं देखे..ये सुनते ही टेम्पो बाले ने पीछे मुङकर देखा और वहीं बेहोश हो गया क्योंकि उनके भी पैर नहीं थे ..वह इस घटना के बाद भयंकर बीमार पङ गया और मुश्किल से एक महीने में ठीक हुआ .

कीट न जाने भ्रंग को ये करले आप समान..

भ्रंगी गुरु...??
कीट न जाने भ्रंग को ये करले आप समान..
कभी कभी मेरे मन में ये बात आती है कि जो जानकारी मैं
ब्लाग के माध्यम से सबको दे रहा हूँ .वो क्या कोई नयी बात है या और लोग उसे नहीं जानते..इस बारे में मेरी कोई निश्चित राय नहीं है पर जब भी मैं सत्संग में इस बात को कहता हूँ कि विहंगम मार्ग ही असली संतों का मार्ग है और गुरुओं में भ्रंग गुरु सबसे श्रेष्ठ हैं तो अक्सर लोग मुझसे पूछ बैठते हैं कि
प्रेमी जी ये बताईये कि भ्रंग गुरु किसे कहते हैं ?
आइये भ्रंग के बारे में जाने..
भ्रंग संस्क्रत भाषा का शब्द है..और भ्रंग कीट उस चींटेनुमा कीट को कहते है जिसके पंख होते हैं और जो उङ सकता है..कुछ जगह इसे लखारी..,कुछ जगह इसे घुरघुली..आदि कहते हैं . इसका नाम चाहे स्थान के हिसाब से कुछ भी हो पर इसकी पहचान बेहद सरल है..यह खासतौर पर दीवारों, जंगलों, दरबाजों आदि पर मिट्टी का गोल घर बनाता है उस घर में छेद रूपी कई दरबाजे होते है ..इसकी सबसे बङी खास बात ये होती है कि ये किसी भी प्रकार के प्रजनन के द्वारा
बच्चे पैदा नहीं करता, बल्कि ये घास में रहने वाले तिनके के समान कीङे को उठाकर अपने घर ले आता है इसकी हूँ..हूँ रूपी गुंजार से भयभीत कीङा बेहोश हो जाता है और फ़िर इसकी निरंतर गुंजार से भयभीत कीट इसी का रूप धारण कर लेता है..ये प्रभु की अनंत रहस्यमय लीलाओं में से एक है..और फ़िर तिनके के समान वह कीङा भ्रंगी के समान ही शक्तिशाली हो जाता है और वैसा ही रूप धारण कर लेता है ऐसे ही भ्रंग गुरु एक साधारण जीव को पात्र बनाकर उसे अनंत ऊँचाईयों तक पहुँचाने की सामर्थ्य रखते है..पर भ्रंग गुरु कई जन्मों के पुण्य से मिलते हैं और बेहद दुर्लभ होते है..और ये किसी को भी बेहद आसानी से मिल सकते हैं इस सम्बन्ध में मैं एक विस्त्रत लेख लिखूँगा दरअसल कम शब्दों में सतगुरु कैसे मिले ..ये समझाना संभव नही है
अंत में तुलसीदास जी कहते हैं..पारस और संत में यही अंतरो जान..वो लोहा कंचन करे ये करले आपु समान

जीव तो नित्य है .फ़िर कैसा रोना..

क्षिति जल पावक गगन समीरा .पँच रचित अति अधम शरीरा .. प्रगट सो तनु तब आगे सोवा , जीव नित्य तब केहि लग रोवा ..
बाली के मरने पर श्रीराम ने समझाया कि हे तारा प्रथ्वी , जल . अग्नि , आकाश , और वायु इन पाँच तत्वों से इस अधम शरीर
की रचना हुयी है लेकिन इसमें रहने वाला जीव अविनाशी और नित्य है इसलिये इसके (शरीर के ) मर जाने पर रोना व्यर्थ है .
उमा कहँउ मैं अनुभव अपना , सत हरिनाम जगत सब सपना .शंकर जी पार्वती से कहते हैं कि हे पार्वती मैं अपने अनुभव से कहता हूँ कि ये द्रश्यमान जगत एक सपना मात्र है .अर्थात वास्तव में नजर आने पर भी यह एक भ्रम मात्र ही है और इस माया प्रपँचमय जगत में हरि नाम (ढाई अक्षर का महामन्त्र ) ही सत्य का बोध कराने वाला है .

गगन चढइ रज पवन प्रसंगा , कीचहि मिले नीच जल संगा ..
आसमान की और उठने वाली वायु के सम्पर्क में आकर धूल आसमान में पहुँच जाती है और वही धूल जब नीच जल (जल में नीचे की और बहने की प्रव्रति होति है ,इसलिये यह उपमा दी गयी है ) के सम्पर्क में आती है तो कीच का रूप ले लेती है इसलिये अच्छी संगति पर विशेष जोर दिया गया है .
अब प्रभु क्रपा करहु येहि भांती , सब तजि भजन करहुँ दिन राती ..
हे प्रभु मैं माया में आकर आपको भूल गया था .अब इस प्रकार किरपा करें कि सब कुछ भुलाकर नाम (ढाई अक्षर का महामन्त्र में ) का सुमरण करूँ .
यह फ़ल साधन से नहिं होई , तुम्हरी किरपा पाय कोई कोई
हे प्रभु आपकी प्राप्ति किसी भक्ति ,या योग साधन या अन्य किसी साधन से नहीं होति बल्कि उल्टे ये तो अहम को और बङाने वाले हैं आपकी किरपा प्राप्त करने के लिये समर्पण ही सबसे उत्तम उपाय है..अर्थात समर्पण कर देने से आपकी क्रपा सहज ही होती है ..

मंगलवार, मार्च 30, 2010

इतिहास झूठा हो सकता है..?

एक बार मैं श्री महाराज जी से पुराण आदि ग्रन्थों पर चर्चा कर रहा था और अपने सटीक तर्कों से उनमें गलतियां निकाल रहा था..महाराज जी ने कहा , मूल ग्रन्थ गुप्त और संस्क्रत भाषा में होने से उनका ग्यान हरेक के लिये समझना बेहद जटिल था..और आज भी है.इसलिये जब अलग अलग लोगों ने उन पर टिप्पणियां की तो धीरे धीरे उनमें काफ़ी बदलाव हो गया और अपने को विद्धान मानने वाले लोगों ने अपनी तरफ़ से उसमें और मसाला भी जोङ दिया इस तरह मूल विषय लगभग लुप्त हो गया और नयी चीज बन गयी . मूल ग्रन्थ अनुभव पर आधारित थे और विभिन्न टीकाएं अध्ययन पर आधारित हैं . कबीर ने कहा है कि तू कहता कागज की लेखी ..मैं कहता आँखिन की देखी..इसलिये आज जो भी धर्म साहित्य उपलब्ध है उसमें काफ़ी मिलावट हो चुकी है और इसीलिये वो भ्रमित कर देने वाला हो गया है..लेकिन मेरी समझ में महाराज जी की बात ठीक से नही आयी तब उन्होनें एक घटना सुनायी..एक आदमी इतिहास पर शोध कर रहा था .उसका मानना था कि इतिहास में काफ़ी कुछ गलत लिखा है .वह ढेर सारी पुस्तकों से सामग्री लेता था और शोध के द्वारा सटीक बात खोजकर उसको नोट करता जाता था..तभी उसकी पत्नी ने बताया कि पङोस में एक आदमीकी हत्या हो गयी है . उसने पूछा कि किसने की है ?
उसकी पत्नी ने कहा कि सही पता नही चल रहा कोई कहता
है कि वह अपने लङकों से असंतुष्ट था सो जायदाद के लिये
लङकों ने मार डाला..कोई कहता है कि उसकी लङकी का चालचलन ठीक नहीं था सो लङकी ने ही मरवा डाला
कोई कहता है वह अपने घर की स्थिति से काफ़ी परेशान था और खुद ही मर गया..कोई कहता है कि उसकी रंजिश
चल रही थी सो उसने मरवा डाला..कोई कहता है कि वह दूसरी औरत रखता था इस चक्कर में मारा गया था .दरअसल आंशिक रूप से सभी बातें सत्य थी पर जिस कारण से वो मरा वो पता नहीं चल रहा था उस आदमी ने पता लगाने की बहुत कोशिश की पर पता नहीं चला ..उसने कहा कि जब मेरे घर के पीछे की ये कल की घटना मुझे ठीक से पता नहीं चल रही तो हजारों साल पहले इतिहास में क्या घटा होगा इसका पता कैसे चलेगा..उसने अपने सभी शोधपत्र जलाकर फ़ेंक दिये..और निर्णय लिया जो तुम्हारे अनुभव में आता है वही सबसे बङा सत्य है..
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