शुक्रवार, अगस्त 13, 2010

वृद्ध व्यक्ति के लिये युवती विष के समान है ।

मनुष्य में ब्राह्मण । तेज में सूर्य । शरीर में सिर । और वृत में सत्य ही श्रेष्ठ है । स्त्री वही श्रेष्ठ है जो मद उन्मत न हो । जिस पर विश्चास कर सकें । वही मित्र है । जिसने अपनी इन्द्रियों को जीत लिया वही पुरुष है । ब्राह्मण का तेज पापाचार करने से नष्ट हो जाता है । दुष्ट स्त्रियों के साहचर्य से कुल नष्ट हो जाता है । मनुष्य को राजा रहित और बहुत से राजाओं के नेतृत्व वाले स्थान पर निवास नही करना चाहिये । इसी प्रकार जहां स्त्रियों का नेतृत्व हो या बाल नेतृत्व हो वहां भी निवास करना अच्छा नहीं होता । कौमार्य अवस्था में स्त्री की रक्षा पिता करता है । युवावस्था में उसकी रक्षा पति करता है । वृद्धावस्था में उसकी रक्षा का भार पुत्र उठाता है । स्त्री स्वतंत्र रहने योग्य नहीं होती । धन के लिये आतुर व्यक्ति का न कोई मित्र है और न कोई बंधु । कामातुर व्यक्ति के लिये न कोई भय है और न लज्जा । चिंता से ग्रस्त प्राणी के लिये न सुख है और न नींद । गरीब । दूसरे के द्वारा भेजा गया दूत । परायी औरत से प्रेम करने वाला । तथा दूसरों का धन चुराने वाले व्यक्ति को नींद नहीं आती । जो व्यक्ति रोग रहित । कर्ज रहित । और स्त्री सम्भोग से दूर रहने की इच्छा वाला होता है । वह सुख की नींद सोता है । आचार को देखकर कुल का ग्यान होता है । भाषा को सुनकर देश का ग्यान होता है । शरीर को देखकर भोजन का ग्यान ( अनुमान ) होता है । समुद्र में वर्षा का होना व्यर्थ है । भरे पेट से भोजन का आग्रह व्यर्थ है । धनी को दान देना व्यर्थ है । नीच के लिये किया गया अच्छा कार्य व्यर्थ है । मुख का विकृत हो जाना । स्वर का भंग हो जाना । दीन भाव आ जाना ।
पसीने से लथपथ शरीर । तथा अत्यन्त भय के चिह्न ये सब चिह्न प्राणी में मत्यु के समय उपस्थित होते हैं । किन्तु याचक के शरीर पर ये चिह्न जीवित ही दिखाई देते हैं । विध्या कुरूप के लिये भी रूप है । विध्या
गुप्त धन है । विध्या प्राणी को साधुवृति वाला तथा सबका प्रिय बना देती है । विध्या बन्धु बान्धव के भी
कष्ट दूर करने वाली है । विध्या राजाओं के बीच भी पूज्यनीय है । विध्या से विहीन मनुष्य पशु के समान है । अत्यन्त जतन से छुपाकर रखा गया धन चुराया जा सकता है । पर विध्या को कोई नही चुरा सकता ।
न कोई किसी का मित्र है । न कोई किसी का शत्रु । कारण की वजह से ही सब एक दूसरे के शत्रु मित्र होते हैं । यदि मनुष्य को किसी के साथ शाश्वत प्रेम करना है तो उसके साथ जुआ । धन का लेन देन । एवं उसकी
स्त्री की तरफ़ देखना । इन तीन दोषों को त्याग देना चाहिये । माता । बहिन या पुत्री के साथ एकान्त में
नहीं बैठना चाहिये । क्योंकि इन्द्रियों का समूह अधिक बलवान होता है । वह अति विद्वान को भी दुराचार
को प्रेरित कर सकता है । उपयुक्त अवसर न मिलने से । एकान्त स्थान न होने से । तथा इच्छा के अनुकूल
पुरुष न मिलने से ही स्त्रियों में सतीत्व पाया जाता है । जो खाने पीने की चीज से बालक को । विनम्रता से सज्जन को । धन से स्त्री को । तपस्या से देवता को । और सद व्यवहार से समस्त लोक को वश में कर लेता
है । वही ग्यानी है । जो कपट से मित्र बनाना चाहते है । पाप से धर्म कमाना चाहते हैं । दूसरों को दुखी
करके धन संग्रह करना चाहते हैं । बिना परिश्रम के सुख पूर्वक विध्या अर्जन करना चाहते हैं । और कठोर व्यवहार के द्वारा स्त्रियों को वश में करने की इच्छा रखते हैं । वे निश्चय ही मूर्ख हैं । दरिद्र के लिये गोष्ठी
विष के समान है । वृद्ध व्यक्ति के लिये युवती विष के समान है । भली भांति आत्मसात न की गयी विध्या
विष के समान है । अजीर्ण दशा में किया गया भोजन विष के समान है । अधिक मात्रा में जल पीना । गरिष्ठ
भोजन । धातु की क्षीणता । मल मूत्र का वेग रोकना । दिन में सोना । रात में जागना । इनसे मनुष्य शरीर
में रोग वास करने लगते हैं । प्रातकालीन धूप । अधिक मैथुन । शमशान धूम का सेवन । अग्नि में हाथ सेकना
। रजस्वला स्त्री का मुख देखना । ये दीर्घ आयु का भी विनाश कर देते हैं । शुष्क मांस । वृद्धा स्त्री । बाल सूर्य
। रात में दही खाना । सुबह के समय स्त्री से सम्भोग करना । ये प्राण विनाशक होते हैं । तुरन्त पकाया
गया घी । अंगूर का फ़ल । युवती स्त्री । दूध का सेवन । गरम जल । तथा वृक्ष की छाया । ये शीघ शक्ति देने
वाले होते हैं ।

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