गुरुवार, अगस्त 19, 2010

जो आपने फ़रमाया


आपके विचार ।
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Shah Nawaz गंगा अवतरण । महत्वपूर्ण जानकारियों से भरे हुए लेख के लिए धन्यवाद ! आलोक मोहन पोस्ट " परमात्मा ने सृष्टि का निर्माण क्यों किया ???? " पर अक्सर मै सोचता हू । मै कौन हू ? मेरा क्या वजूद है ? क्या मै शरीर हू ? यह पेट मेरा है । यह मेरा पैर है । यह मेरी गर्दन है । यह मेरा मस्तक है आदि । पर ये शरीर तो मिला है । और मिली हुई चीज कभी अपनी नही होती । अपनी चीज तो अपनी होती है । वह कभी नही खोती । सुरु से लेकर अंत तक रहती है । पर मिली चीज हमेशा साथ नही रहती ,बिछुड़ जाती है । जब कुछ भी नही था और जब कुछ भी नही होगा । तब भी मै रहुगा । शरीर तो बीच में मिला है । तो ये मेरा कैसे हो गया । जैसे मेरा मकान(घर) ....मै मकान में जाता हू । पर मेरे साथ मकान नही जाता । मै और मेरा घर अलग अलग है । जब छोटा था तब ये कुछ अलग था । अब कुछ और ..ये शरीर पल पल बदलता रहता है । और हा ..इस शरीर पर अपना कोई बस भी नही । बस चलता तो हमेशा जवान रहते । कभी कोई बीमारी नही लगती ।ये शरीर संसार के काम आता है । और यही मिट जाता है.। ये नाम । पहचान । जाति । कर्म सब इस शरीर और संसार तक सीमित है । इस संसार से जाने बाद सब ख़तम हो जाता है । फिर मै कौन हू ?
बेनामी पोस्ट " स्थायी ख़ुशी की प्रतीक्षा है ? " पर guru to bahut log bna lete hey.shishy koi wirla hi banta hey. wahi sachidanand ko pata hey. atah yogya bano shishya bano.kalyan ho.
रवि कान्त शर्मा पोस्ट " परमात्मा ने सृष्टि का निर्माण क्यों किया ???? " पर एको अहं बहुष्यामि । ईश्वर की इच्छा हुई कि मैं एक से अनेक हो जाऊँ । इसी इच्छा के कारण सृष्टि की उत्पत्ति हुई । यही इच्छा मनुष्य में होती है । तभी मनुष्य शादी करता है । शादी के बाद एक से अनेक हो जाता है । इसी पर कबीर दास जी ने कहा है । इच्छा काया । इच्छा माया । इच्छा जग उपजाया । कहत कबीर इच्छा विवर्जित । ताका पार न पाया ।
@ अजीव अंदाज में उत्तर दिया आपने शर्मा जी । लेकिन ईश्वर ने शादी नहीं की थी ।
राज भाटिय़ा ने कहा ।
सच्चे साधू संत का संसर्ग । अवगुणों को गुणों मे परिवर्तित कर देता है । सत्य वचन जी । लेकिन सिर्फ़ सच्चे साधुओं का संग । और जो आज मिलते नही । अगर कोई हो आप की नजर में । तो नाम जरुर लिखे । धन्यवाद ।
raghvendramanikpuri पोस्ट " सर्वजीत और कबीर साहेब " पर kabir bahut mahan sant the. Unse koi jit nahi paya. Unke gyan ke bhandar ko samajh pana muskil hai. Ye sadharan logo k bas ki bat nahi hai
aghvendramanikpuri पोस्ट " सर्वजीत और कबीर साहेब " पर जिसके पास जानकारी नही होती । वो घमंडी रहता है । जब समझ आने लगता है । तब घमंड जाने लगता है ।
महेन्द्र मिश्र ने कहा ।
बहुत सटीक । विचार । आभार ।
नीरज गोस्वामी ने कहा ।
विनय जी । आपके ब्लॉग पर पहली बार आना हुआ । बहुत अच्छा लगा । आपके विचार बहुत स्पष्ट और प्रभावशाली हैं । मुझे असली साधू संतों से कोई समस्या नहीं है । लेकिन उनकी गिनती बहुत कम है । ये जो धूनी रमाये डेरा बनाये हुए । तथाकथित साधू हैं । वो दरअसल पाखंडी है । और स्वार्थ साधना में लगे रहते हैं । इनसे मुझे चिढ है । इसीलिए मैं इन सबसे दूर रहता हूँ । मेरा मानना है के यदि आपका मन शांत है । कोई लोभ नहीं है । सबके प्रति दिल में प्रेम है । तो फिर आपको किसी साधू के पास जाने की जरूरत नहीं है । हमारा खुद का स्वार्थ या कष्ट हमें ऐसे ढोंगियों के पास ले जाता है । ये लोग ऐसे परेशान दुखी लोगों का शोषण करते हैं । टी.वी पर रेशमी सिंहासन पर बिराजमान फूलों के राज सिंहासन पर बैठ कर मीठी मीठी बातें करने वाले ये लोग किसी काम के नहीं हैं । आपने ऐसे ही साधू की अच्छी व्याख्या की है । आपको पढ़ कर बहुत आनंद मिला । आपके सीखने के गुण ने भी बहुत प्रभावित किया । मुझे भी कम्यूटर की सर्वप्रथम जानकारी सन दो हज़ार एक में हुई । मैं आज साठ वर्ष की उम्र में भी मुझे कुछ नया सीखने को आतुर रहता हूँ । अपना ब्लॉग भी मैंने इसीलिए शुरू किया है । मैं ग़ज़लें शौक से लिखता हूँ । और मेरे गुरु की उम्र मेरे बेटे से भी कम है । गुरु की उम्र नहीं ज्ञान देखा जाता है ।shama ने कहा ।
Sahee kaha aapne..mai ab akele hee, mujhse jo ban padta hai,karne lagee hun..! shama ने कहा ।
Aapki tippanee ke liye dhanywad ! " sansmaran" blog pe...!Bahut adhik zaroorat hai,is jaagruktaa kee...
शोभना चौरे ने कहा ।
aapne bilkul shi kha hai mainne bhi badi badi sansthaon ke sath kam kiya hai par sabhi jagah log apna matalab nikalate hain .isliye main akele hi apni samrthynusar jitna ban sakta hai kam karti hoon .bina paisa lagaye aur bina paisa liye .
Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said..।
जब जीवन ही क्षणिक है । तो सुख दुख स्थायी कैसे हो सकते हैं ?
@ जीवन ही क्षणिक है । लेकिन जीव ( आत्मा ) हमेशा है । ईश्वर अंश जीव अविनाशी । चेतन अमल सहज सुखराशी ।

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