शुक्रवार, अगस्त 13, 2010

इसी कर्म की वजह से शंकर हाथ मे कपाल लेकर भिक्षाटन करते हैं ।

भीम अर्जुन आदि पांडव राजपुत्र थे । ये सभी चन्दमा के समान कान्तियुक्त । पराक्रमी । सत्य बोलने वाले । सूर्य के समान प्रतापी और स्वयं अवतारी भगवान कृष्ण से रक्षित थे । फ़िर भी इनको कंजूस धृतराष्ट्र की परवशता के कारण भिक्षा तक मांगनी पडी । इसलिये इस संसार में कौन ऐसा है । किसमें इतनी सामर्थ्य है । जिसको भाग्य के वशीभूत होने के कारण कर्मरेखा नहीं घुमाती । अपने पूर्व संचित कर्म के अधीन होकर ही ब्रह्मा कुम्भकार ( कुम्हार ) के समान ब्रह्माण्ड रूपी इस महाभाण्ड के उदर में चराचर प्राणियों की सृष्टि में नियमतः लगे रहते हैं । इसी कर्म से अभिभूत विष्णु दशावतार के समय परिव्याप्त असीमित महासं कट में अपने को डाल देते हैं । इसी कर्म की वजह से शंकर हाथ मे कपाल लेकर भिक्षाटन करते हैं । इसी कर्म की वजह से सूर्य आकाश में चक्कर काटता है । राजा बलि कितना बडा दानी था । मांगने वाले स्वयं विष्णु थे । विशिष्ट लोगों के सामने दान दिया गया । फ़िर भी दान का फ़ल बंधन प्राप्त हुआ । यह सब भाग्य का खेल है । पूर्व जन्म में प्राणी ने जैसा कर्म किया है । उसी कर्म के अनुसार वह दूसरे जन्म में फ़ल भोगता है । अतः प्राणी स्वयं ही अपने भोग्य फ़ल का निर्माण करता है । अर्थात वह अपने कर्मफ़ल का स्वयं ही विधाता है ।
हम अपने सुख दुख का स्वयं ही कारण हैं । माता के गर्भ में आकर और पूर्व देह में किये गये कर्म के फ़ल हमें भोगने ही पडते हैं । आकाश । समुद्र । पर्वतीय गुफ़ा । तथा माता के सिर पर । माता की गोद में स्थित रहते हुये भी मनुष्य अपने पूर्व संचित कर्म फ़ल का त्याग करने में समर्थ नहीं होता । जिसका किला त्रिकूट जैसे पर्वत पर था । जो समुद्र से घिरा हुआ भी था । और राक्षसों के द्वारा रक्षित था । स्वयं जो विशुद्ध आचरण करने वाला था । जिसको नीति की शिक्षा शुक्राचार्य से प्राप्त हुयी थी । वह रावण भी कालवश नष्ट हो ही गया । जिस अवस्था । जिस समय । जिस दिन । जिस रात्रि । जिस महूर्त । जिस क्षण जैसा होना निश्चित है । वह वैसा ही होगा । अन्यथा नहीं हो सकता । सब अन्तरिक्ष में जा सकते हैं । प्रथ्वी के गर्भ में प्रवेश कर सकते हैं । दसों दिशायें अपने ऊपर धारण कर सकते हैं । किन्तु जो वस्तु उनके भाग्य में नहीं है । उसको प्राप्त नहीं कर सकते । पूर्व जन्म में अर्जित की गयी विध्या । दिया गया धन । तथा किये गये कर्म ही दूसरे जन्म में आगे आगे मिलते जाते हैं । इस संसार में कर्म ही प्रधान है । सुन्दर ग्रहों का योग था । स्वयं वशिष्ठ मुनि ने निर्धारित लग्न में विवाह संस्कार कराये । फ़िर भी सीता को पूर्व जन्म के कर्मों के अनुसार दुख भोगना ही पडा ।
राम को राजगद्दी की जगह वनवास जाना पडा । जब राम लक्ष्मण सीता ये तीनों अपने अपने कर्म के अनुसार दुख भोगते हैं । तो साधारण आदमी के विषय में कु्छ कहना ही व्यर्थ है । न पिता के कर्म से पुत्र को सदगति मिल सकती है । न पुत्र के कर्म से पिता को सदगति मिल सकती है ।
सब अपने कर्म अनुसार ही गति को प्राप्त करते हैं । जैसे सांप हाथी चूहा ये ज्यादा से ज्यादा अपने वास स्थान या बिल तक ही भाग सकते हैं । इससे आगे कहां जा सकते हैं ? इसी तरह अपने कर्म के फ़ल से कौन भाग सकता है ? अर्थात सब कर्म के अधीन ही है । जो मनुष्य सम्मान से प्रसन्न नहीं होता । अपमान से क्रुद्ध नहीं होता । और क्रोध आने पर मुंह से कठोर वाक्य नहीं बोलता । वो निश्चय ही साधुपुरुष है । सभी प्राणियों और पदार्थों की उत्पत्ति के पूर्व में स्थिति नहीं थी । और निधन के अन्त में भी उनकी स्थित नहीं रहती । ये सभी मध्य अवस्था में ही विधमान रहते हैं । फ़िर दुख करने की बात क्या है ? समय न आने पर प्राणी सैकडों बाण लगने पर भी नहीं मरता । और समय आ जाने पर छोटा सा कांटा लगने से मर जाता है । प्राणी को जो सुख दुख प्राप्त होना है । वो उसे उसी स्थान पर खींच ले जाता है । प्राणी की मृत्यु वहीं होती है । जहां उसका हन्ता मौजूद होता है । अपने कर्म से प्रेरित किया गया आदमी स्वयं ही उन स्थानों पर पहुंच जाता है । पूर्व जन्म में किया गया कर्म कर्ता के पीछे पीछे वैसे ही चलता है । जैसे गौशाला में हजार गायों के बीच बछडा अपनी माता को पहचान लेता है । इस प्रकार जब पूर्व जन्म में किया गया कर्म कर्ता में स्थित रहता है । तो अपने पुन्य पाप का फ़ल भोगो । फ़िर क्यों दुखी होते हो ? जैसा पूर्व जन्म में शुभ अशुभ कर्म किया गया है । वैसा ही फ़ल जन्म जन्मान्तर में कर्ता का अनुसरण करता है और उसके पीछे पीछे ही चलता है ।

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