गुरुवार, अगस्त 12, 2010

वे जीव वायु रूप होकर भटकते हैं ।

यमलोक का विस्तार छियासी हजार योजन है । एक योजन में बारह किलोमीटर होते हैं । मृत्यु लोक के बीच से ही उसके लिये रास्ता जाता है । वह रास्ता दहकते हुये तांबे के समान जलता हुआ अति कठिन और भयंकर रास्ता है । पापी तथा मूर्खों को उस रास्ते पर जाना होता है । अनेक प्रकार के कांटो से भरा हुआ ऊंची नीची भूमि वाला वह रास्ता वृक्ष आदि किसी भी प्रकार की छाया से रहित ही है । जहां पर दो मिनट कोई विश्राम कर सके ऐसी कोई व्यवस्था वहां नहीं है । मार्ग में खाने पीने की भी कोई व्यवस्था नहीं हैं । अत्यन्त दुर्गम उस मार्ग में जीव कष्ट और पीडा से कांपने लगता है । जिसका जितना और जैसा पाप है । उसका उतना ही और वैसा ही मार्ग है । इस मार्ग से जाते हुये प्राणी करुण चीत्कार करते हैं और कुछ तो वहां की कुव्यवस्था के प्रति विद्रोह भी करने लगते हैं । जो लोग संसार के प्रति कोई तृष्णा नहीं रखते वे उस मार्ग को सुखपूर्वक पार कर जाते हैं । अपने जीवन में मनुष्य जिन जिन वस्तुओं को दान देता है । वे सब वस्तुयें उसे यमलोक के मार्ग में उपयोग के लिये मिल जाती हैं । जिन मृतक पापियों का मरने के बाद जलांजलि और श्राद्ध नहीं होता । वे जीव वायु रूप होकर भटकते हैं । दक्षिण और नैऋत दिशा के मध्य में विवस्वत के पुत्र यमराज की पुरी है । यह सम्पूर्ण नगर वज्र के समान बना है । देवता और असुर शक्तियां भी इसका भेदन नहीं कर सकती हैं । यह चौकोर है । इसमें चार द्वार । सात चहारदीवारी तथा तोरण हैं । इसका विस्तार एक हजार योजन है । सभी प्रकार के रत्नों से सुसज्जित । चमकती बिजली और सूर्य के तेज के समान इस पुरी में यमराज अपने दूतों के साथ निवास करता है । इसका विस्तार पांच सौ योजन ऊंचा है । हजार खम्बों पर स्थित यह भवन वैदूर्य मणि से सजा हुआ है । यहीं पर दस योजन में फ़ैला हुआ । नीले मेघ के समान आसन पर धर्मराज रहते हैं । यहां पर शीतल मन्द वायु बहती है । अनेक प्रकार के उत्सव और व्याख्यान होते रहते हैं । इन्हीं के बीच धर्मराज का समय व्यतीत होता है । उस पुर के मध्य भाग में प्रवेश करने पर चित्रगुप्त का भवन पडता है । इसका विस्तार पचीस योजन का है । इसकी ऊंचाई दस योजन है । इसमें आने जाने के लिये सैकडों गलियां है । सैकडों दीपक इस भवन में जलते हैं । बन्दीजनों के द्वारा गाये बजाये गीतों से यह भवन गूंजता रहता है । इस भवन में मुक्ता मणियों से बना एक आसन है । जिस पर बैठकर चित्रगुप्त मनुष्य तथा अन्य जीवों की आयु गणना करते हैं । किसी के पुन्य या पाप के प्रति उनमें कोई मोह नहीं होता । जीव ने जो भी अर्जित किया होता है । वे उसको जानते हैं । और अठारह दोषों से रहित जीव द्वारा किये गये कर्म को लिखते हैं । चित्रगुप्त के भवन से पहले ज्वर ( बुखार ) का बहुत बडा भवन है । उनके दक्षिण से शूल और लताविस्फ़ोटक के भवन हैं । पश्चिम में कालपाश अजीर्ण और अरुचि के भवन हैं । मध्य पीठ के उत्तर में विषूचिका ईशान में शिरोर्ति । आग्नेय में मूकता । नैऋत्य कोण में अतिसार वायव्य कोण मे दाह संग्यक रोग का घर है । चित्रगुप्त इन सभी से नित्य परिवृत रहते हैं ।

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