बुधवार, जून 30, 2010

विकलांग बंदगी


उनका बचपन नहीं होता ।
वे चाबी के खिलौने से ।
घिसटते हैं कुछ दूर तक ।
चलते नहीं कभी वो ।
खेलते नहीं बच्चों के साथ ।
हाय वो चलने से लाचार ।
क्योंकि पैर है बेकार ।
यूँ भाग भागकर खेलना ।
है , केवल सपना । क्या होगा साकार ।
माँ की उम्मीदें नहीं वो ।
बुङापे की लाठी । ना वो पिता की ।
कैसे दें बहन की रक्षा का वचन वो ?
नहीं बन पाते भाई के हाथ ।
किस्मत के मारे बेचारे ।
कैसे निभायें । इन सम्बन्धों का साथ ।
प्रभु यदि देते हो जीवन ।
तो देना हाथ पैर सलामत ।
क्योंकि ये जीवन है । तुम्हारी अमानत ।
फ़िर न हो यूँ घिसट घिसटकर जीना ।
तंग दायरों में कैद ये जिंदगी ।
हम भी सक्षम हों भगवन ।
ये बार बार बंदगी ।

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