बुधवार, जून 30, 2010

पैसा ही भगवान

बङी तेजी से जीवन मूल्यों में । हो रहा है परिवर्तन ।
विद्वान बताते हैं कारण । कलि का है ये नर्तन । तीव्र उथल पुथल का दौर है ।
सत्ता की कुर्सी पर । कल कोई और । आज कोई और है ।
यही हाल है । बिजनेस का । बचा न कोई तबका ।
कल तक करोङपति थे । सेठ धनपति राय ।
जाने किस मनहूस की पङ गयी हाय ।
आज कचौङी बेचते है ।
बङे ताज्जुब से उसे देखते हैं ।
जो क्वालिस से जाता है ।
किसीने पूछा । पहचान वाला है क्या ? बोले ।
नही ! ये ठेला लगाता था । यहाँ ।
आज मैं खङा हूँ । जहाँ ।
किस्मत सट्टा लाटरी शेयर जैसी हो गयी ।
आदमी की जिंदगी नोटों में खो गयी ।
बेहद उठापटक का दौर है । तेजी मंदी का जोर है ।
लेकिन मैं न नेता हूँ । न उधोगपति । सिर्फ़ एक बीबी का इकलौता पति ।
अपनी नौकरी है प्राइवेट । सो बीबी करती है । हेट ।
रईसों को देखकर भरतीं हैं आहें । चंचल हो गयीं हैं । उसकी निगाहें ।
जाने किसकी तलाश है । वैसे उसे खुद पर विश्वास है ।
अभी भी उसके दम का दमूङा है । बाकी सब तो घास कूङा है ।
फ़िर एक दिन जब नौकरी से वापस आया ।
घर खुला बीबी को गायब पाया । पुत्र से पूछा । तो उसने बताया ।
मम्मी गयी है । मेरे कार वाले नये पापा के साथ ।
बहुत धनी है । आठ बंगले हैं । उनके पास ।
मैंने पूछा । कब आयेगी ।
बोला ," आप करोङपति बनेंगे ।
या जब कोई लाटरी लग जायेगी ।
मैंने फ़िर लङके से पूछा ।
अब तू क्या करेगा । पुत्र ।
बोला ! पैसे के लिये कुछ भी करूँगा । पिता श्री !
पैसा ही सब कुछ है । इसके बिना दुख ही दुख है ।
पैसा हो तो अप्सरायें भी पास बुलातीं हैं ।
न हो तो । खुद की बीबी भी भाग जाती है ।
जैसे मम्मी गयी । अच्छा डैड टाटा ।
चलता हूँ । क्योंकि सोचना है ।
खोजना है । वो तरीका ?
जो बना दे बिरला या टाटा ।

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