शनिवार, मई 15, 2010

लन्काकाण्ड 1

लन्काकाण्ड 1
tulasi das .. Ram Charit Manas..ramayan
story of the lord rama..king of ayodhya
by...rajeev kumar kulshrestha
लव निमेष परमानु जुग बरष कलप सर चंड ।
भजसि न मन तेहि राम को कालु जासु कोदंड ।।
सिंधु बचन सुनि राम सचिव बोलि प्रभु अस कहेउ ।
अब बिलंबु केहि काम करहु सेतु उतरे कटकु ।।
सुनहु भानुकुल केतु जामवंत कर जोरि कह।
नाथ नाम तव सेतु नर चढ़ि भव सागर तरिहिं ।।
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
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यह लघु जलधि तरत कति बारा । अस सुनि पुनि कह पवनकुमारा ।।
प्रभु प्रताप बड़वानल भारी । सोषेउ प्रथम पयोनिधि बारी ।।
तब रिपु नारी रुदन जल धारा । भरेउ बहोरि भयउ तेहिं खारा ।।
सुनि अति उकुति पवनसुत केरी । हरषे कपि रघुपति तन हेरी ।।
जामवंत बोले दोउ भाई । नल नीलहि सब कथा सुनाई ।।
राम प्रताप सुमिरि मन माहीं । करहु सेतु प्रयास कछु नाहीं ।।
बोलि लिए कपि निकर बहोरी । सकल सुनहु बिनती कछु मोरी ।।
राम चरन पंकज उर धरहू । कौतुक एक भालु कपि करहू ।।
धावहु मर्कट बिकट बरूथा । आनहु बिटप गिरिन्ह के जूथा ।।
सुनि कपि भालु चले करि हूहा । जय रघुबीर प्रताप समूहा ।।
अति उतंग गिरि पादप लीलहि लेहिं उठाइ ।
आनि देहिं नल नीलहि रचहिं ते सेतु बनाइ ।।
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
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सैल बिसाल आनि कपि देही । कंदुक इव नल नील ते लेहीं ।।
देखि सेतु अति सुंदर रचना । बिहसि कृपानिधि बोले बचना ।।
परम रम्य उत्तम यह धरनी । महिमा अमित जाइ नहिं बरनी ।।
करिहउं इहाँ संभु थापना । मोरे हृदय परम कलपना ।।
सुनि कपीस बहु दूत पठाए । मुनिबर सकल बोलि ले आए ।।
लिंग थापि बिधिवत करि पूजा । सिव समान प्रिय मोहि न दूजा ।।
सिव द्रोही मम भगत कहावा । सो नर सपनेहु मोहि न पावा ।।
संकर बिमुख भगति चह मोरी । सो नारकी मूढ़ मति थोरी ।।
संकर प्रिय मम द्रोही सिव द्रोही मम दास ।
ते नर करहि कलप भरि घोर नरक महु बास ।।
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
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जे रामेस्वर दरसनु करिहहिं । ते तनु तजि मम लोक सिधरिहहिं ।।
जो गंगाजलु आनि चढ़ाइहि । सो साजुज्य मुक्ति नर पाइहि ।।
होइ अकाम जो छल तजि सेइहि । भगति मोरि तेहि संकर देइहि ।।
मम कृत सेतु जो दरसनु करिही । सो बिनु श्रम भवसागर तरिही ।।
राम बचन सब के जिय भाए । मुनिबर निज निज आश्रम आए ।।
गिरिजा रघुपति के यह रीती । संतत करहिं प्रनत पर प्रीती ।।
बांधा सेतु नील नल नागर । राम कृपा जसु भयउ उजागर ।।
बूड़हिं आनहि बोरहिं जेई । भए उपल बोहित सम तेई ।।
महिमा यह न जलधि कइ बरनी । पाहन गुन न कपिन्ह कइ करनी ।।
श्री रघुबीर प्रताप ते सिंधु तरे पाषान।
ते मतिमंद जे राम तजि भजहिं जाइ प्रभु आन ।।
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
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बांधि सेतु अति सुदृढ़ बनावा । देखि कृपानिधि के मन भावा ।।
चली सेन कछु बरनि न जाई । गर्जहिं मर्कट भट समुदाई ।।
सेतुबंध ढिग चढ़ि रघुराई । चितव कृपाल सिंधु बहुताई ।।
देखन कहुँ प्रभु करुना कंदा । प्रगट भए सब जलचर बृंदा ।।
मकर नक्र नाना झष ब्याला । सत जोजन तन परम बिसाला ।।
अइसेउ एक तिन्हहि जे खाहीं । एकन्ह के डर तेपि डेराहीं ।।
प्रभुहि बिलोकहि टरहिं न टारे । मन हरषित सब भए सुखारे ।।
तिन्ह की ओट न देखिअ बारी । मगन भए हरि रूप निहारी ।।
चला कटकु प्रभु आयसु पाई । को कहि सक कपि दल बिपुलाई ।।
सेतुबंध भइ भीर अति कपि नभ पंथ उड़ाहिं ।
अपर जलचरन्हि ऊपर चढ़ि चढ़ि पारहि जाहिं ।।
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
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अस कौतुक बिलोकि दोऊ भाई । बिहसि चले कृपाल रघुराई ।।
सेन सहित उतरे रघुबीरा । कहि न जाइ कपि जूथप भीरा ।।
सिंधु पार प्रभु डेरा कीन्हा । सकल कपिन्ह कहु आयसु दीन्हा ।।
खाहु जाइ फल मूल सुहाए । सुनत भालु कपि जंह तंह धाए ।।
सब तरु फरे राम हित लागी । रितु अरु कुरितु काल गति त्यागी ।।
खाहिं मधुर फल बटप हलावहिं । लंका सन्मुख सिखर चलावहिं ।।
जहँ कहु फिरत निसाचर पावहिं । घेरि सकल बहु नाच नचावहिं ।।
दसनन्हि काटि नासिका काना । कहि प्रभु सुजसु देहिं तब जाना ।।
जिन्ह कर नासा कान निपाता । तिन्ह रावनहि कही सब बाता ।।
सुनत श्रवन बारिधि बंधाना । दस मुख बोलि उठा अकुलाना ।।
बांध्यो बननिधि नीरनिधि जलधि सिंधु बारीस ।
सत्य तोयनिधि कंपति उदधि पयोधि नदीस ।।
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
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निज बिकलता बिचारि बहोरी । बिहसि गयउ ग्रह करि भय भोरी ।।
मंदोदरी सुन्यो प्रभु आयो । कौतुकही पाथोधि बंधायो ।।
कर गहि पतिहि भवन निज आनी । बोली परम मनोहर बानी ।।
चरन नाइ सिरु अंचलु रोपा । सुनहु बचन पिय परिहरि कोपा ।।
नाथ बयरु कीजे ताही सो । बुधि बल सकिअ जीति जाही सो ।।
तुम्हहि रघुपतिहि अंतर कैसा । खलु खद्योत दिनकरहि जैसा ।।
अतिबल मधु कैटभ जेहिं मारे । महाबीर दितिसुत संघारे ।।
जेहि बलि बांधि सहजभुज मारा । सोइ अवतरेउ हरन महि भारा ।।
तासु बिरोध न कीजिअ नाथा । काल करम जिव जाके हाथा ।।
रामहि सोंपि जानकी नाइ कमल पद माथ ।
सुत कहु राज समर्पि वन जाइ भजिअ रघुनाथ ।।
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नाथ दीनदयाल रघुराई । बाघउ सनमुख गए न खाई ।।
चाहिअ करन सो सब करि बीते । तुम्ह सुर असुर चराचर जीते ।।
संत कहहिं असि नीति दसानन । चौथेपन जाइहि नृप कानन ।।
तासु भजन कीजिअ तहँ भर्ता । जो कर्ता पालक संहर्ता ।।
सोइ रघुवीर प्रनत अनुरागी । भजहु नाथ ममता सब त्यागी ।।
मुनिबर जतनु करहिं जेहि लागी । भूप राजु तजि होहि बिरागी ।।
सोइ कोसलधीस रघुराया । आयउ करन तोहि पर दाया ।।
जो पिय मानहु मोर सिखावन । सुजसु होइ तिहु पुर अति पावन ।।
अस कहि नयन नीर भरि गहि पद कंपित गात ।
नाथ भजहु रघुनाथहि अचल होइ अहिवात ।।
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
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तब रावन मयसुता उठाई । कहे लाग खल निज प्रभुताई ।।
सुनु तें प्रिया बृथा भय माना । जग जोधा को मोहि समाना ।।
बरुन कुबेर पवन जम काला । भुज बल जितेंउ सकल दिगपाला ।।
देव दनुज नर सब बस मोरे । कवन हेतु उपजा भय तोरे ।।
नाना विधि तेहि कहेसि बुझाई । सभा बहोरि बैठ सो जाई ।।
मंदोदरी हदय अस जाना । काल बस्य उपजा अभिमाना ।।
सभा आइ मंत्रिन्ह तेहि बूझा । करब कवन बिधि रिपु से जूझा ।।
कहहिं सचिव सुनु निसिचर नाहा । बार बार प्रभु पूछहु काहा ।।
कहहु कवन भय करिअ विचारा । नर कपि भालु अहार हमारा ।।
सब के बचन श्रवन सुनि कह प्रहस्त कर जोरि ।
निति बिरोध न करिअ प्रभु मत्रिंन्ह मति अति थोरि ।।
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
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कहहिं सचिव सठ ठकुरसोहाती । नाथ न पूर आव एहि भांती ।।
वारिधि नाघि एक कपि आवा। तासु चरित मन महु सबु गावा ।।
छुधा न रही तुम्हहि तब काहू । जारत नगरु कस न धरि खाहू ।।
सुनत नीक आगे दुख पावा । सचिवन अस मत प्रभुहि सुनावा ।।
जेहिं बारीस बंधायउ हेला । उतरेउ सेन समेत सुबेला ।।
सो भनु मनुज खाव हम भाई । वचन कहहि सब गाल फुलाई ।।
तात वचन मम सुनु अति आदर । जनि मन गुनहु मोहि करि कादर ।।
प्रिय वानी जे सुनहि जे कहहीं । ऐसे नर निकाय जग अहहीं ।।
बचन परम हित सुनत कठोरे । सुनहिं जे कहहि ते नर प्रभु थोरे ।।
प्रथम बसीठ पठउ सुनु नीती । सीता देइ करहु पुनि प्रीती ।।
नारि पाइ फिरि जाहि जो तो न बढ़ाइअ रारि ।
नाहिं त सन्मुख समर महि तात करिअ हठि मारि ।।
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
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यह मत जो मानहु प्रभु मोरा । उभय प्रकार सुजसु जग तोरा ।।
सुत सन कह दसकंठ रिसाई । असि मति सठ केहि तोहि सिखाई ।।
अबहीं ते उर संसय होई । बेनुमूल सुत भयहु घमोई ।।
सुनि पितु गिरा परुष अति घोरा । चला भवन कहि वचन कठोरा ।।
हित मत तोहि न लागत कैसे । काल विवस कहु भेषज जैसे ।।
संध्या समय जानि दससीसा । भवन चलेउ निरखत भुज बीसा ।।
लंका सिखर उपर आगारा । अति बिचित्र तहं होइ अखारा ।।
बैठ जाइ तेही मंदिर रावन । लागे किंनर गुन गन गावन ।।
बाजहिं ताल पखाउज बीना । नृत्य करहिं अपछरा प्रबीना ।।
सुनासीर सत सरिस सो संतत करइ बिलास ।
परम प्रबल रिपु सीस पर तद्यपि सोच न त्रास ।।
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
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इहां सुबेल सैल रघुबीरा । उतरे सेन सहित अति भीरा ।।
सिखर एक उतंग अति देखी । परम रम्य सम सुभ्र बिसेषी ।।
तहँ तरु किसलय सुमन सुहाए । लछिमन रचि निज हाथ डसाए ।।
ता पर रूचिर मृदुल मृगछाला । तेहीं आसन आसीन कृपाला ।।
प्रभु कृत सीस कपीस उछंगा । बाम दहिन दिसि चाप निषंगा ।।
दुहु कर कमल सुधारत बाना । कह लंकेस मंत्र लगि काना ।।
बड़भागी अंगद हनुमाना । चरन कमल चापत बिधि नाना ।।
प्रभु पाछें लछिमन बीरासन । कटि निषंग कर बान सरासन ।।
एहि बिधि कृपा रूप गुन धाम रामु आसीन ।
धन्य ते नर एहि ध्यान जे रहत सदा लयलीन ।।
पूरब दिसा बिलोकि प्रभु देखा उदित मंयक ।
कहत सबहि देखहु ससिहि मृगपति सरिस असंक ।।
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
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पूरब दिसि गिरिगुहा निवासी । परम प्रताप तेज बल रासी ।।
मत्त नाग तम कुंभ बिदारी । ससि केसरी गगन वन चारी ।।
बिथुरे नभ मुकुताहल तारा । निसि सुंदरी केर सिंगारा ।।
कह प्रभु ससि महुँ मेचकताई । कहहु काह निज निज मति भाई ।।
कह सुग़ीव सुनहु रघुराई । ससि महु प्रगट भूमि के झाई ।।
मारेउ राहु ससिहि कह कोई । उर मंह परी स्यामता सोई ।।
कोउ कह जब बिधि रति मुख कीन्हा । सार भाग ससि कर हरि लीन्हा ।।
छिद्र सो प्रगट इंदु उर माहीं । तेहि मग देखिअ नभ परिछाहीं ।।
प्रभु कह गरल बंधु ससि केरा । अति प्रिय निज उर दीन्ह बसेरा ।।
बिष संजुत कर निकर पसारी । जारत विरहवंत नर नारी ।।
कह हनुमंत सुनहु प्रभु ससि तुम्हारा प्रिय दास ।
तव मूरति बिधु उर बसति सोइ स्यामता अभास ।।
नवान्हपारायण।। सातवां विश्राम
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
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पवन तनय के बचन सुनि बिहसे रामु सुजान ।
दच्छिन दिसि अवलोकि प्रभु बोले कृपा निधान ।।
देखु बिभीषन दच्छिन आसा । घन घंमड दामिनि विलासा ।।
मधुर मधुर गरजइ घन घोरा । होइ बृष्टि जनि उपल कठोरा ।।
कहत बिभीषन सुनहु कृपाला । होइ न तड़ित न बारिद माला ।।
लंका सिखर उपर आगारा । तहं दसकंधर देख अखारा ।।
छत्र मेघडंबर सिर धारी । सोइ जनु जलद घटा अति कारी ।।
मंदोदरी श्रवन ताटंका । सोइ प्रभु जनु दामिनी दमंका ।।
बाजहिं ताल मृदंग अनूपा । सोइ रव मधुर सुनहु सुरभूपा ।।
प्रभु मुसुकान समुझि अभिमाना । चाप चढ़ाइ बान संधाना ।।
छत्र मुकुट ताटंक तब हते एकहीं बान ।
सबके देखत महि परे मरमु न कोऊ जान ।।
अस कौतुक करि राम सर प्रबिसेउ आइ निषंग ।
रावन सभा ससंक सब देखि महा रसभंग ।।
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
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कंप न भूमि न मरुत विसेषा। अस्त्र सस्त्र कछु नयन न देखा ।।
सोचहिं सब निज हृदय मझारी । असगुन भयउ भयंकर भारी ।।
दसमुख देखि सभा भय पाई । बिहसि बचन कह जुगुति बनाई ।।
सिरउ गिरे संतत सुभ जाही । मुकुट परे कस असगुन ताही ।।
सयन करहु निज निज गृह जाई । गवने भवन सकल सिर नाई ।।
मंदोदरी सोच उर बसेऊ । जब ते श्रवनपूर महि खसेऊ ।।
सजल नयन कह जुग कर जोरी । सुनहु प्रानपति बिनती मोरी ।।
कंत राम बिरोध परिहरहू । जानि मनुज जनि हठ मन धरहू ।।
विस्वरुप रघुवंस मनि करहु वचन बिस्वासु ।
लोक कल्पना वेद कर अंग अंग प्रति जासु ।।
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
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पद पाताल सीस अज धामा । अपर लोक अंग अंग बिश्रामा ।।
भृकुटि बिलास भयंकर काला । नयन दिवाकर कच घन माला ।।
जासु घ्रान अस्विनीकुमारा । निसि अरु दिवस निमेष अपारा ।।
श्रवन दिसा दस बेद बखानी । मारुत स्वास निगम निज बानी ।।
अधर लोभ जम दसन कराला। माया हास बाहु दिगपाला।।
आनन अनल अंबुपति जीहा । उतपति पालन प्रलय समीहा ।।
रोम राजि अष्टादस भारा । अस्थि सैल सरिता नस जारा ।।
उदर उदधि अधगो जातना । जगमय प्रभु का बहु कलपना ।।
अहंकार सिव बुद्धि अज मन ससि चित्त महान ।
मनुज बास सचराचर रुप राम भगवान ।।
अस बिचारि सुनु प्रानपति प्रभु सन बयरु बिहाइ ।
प्रीति करहु रघुबीर पद मम अहिवात न जाइ ।।
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
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बिहसा नारि बचन सुनि काना । अहो मोह महिमा बलवाना ।।
नारि सुभाउ सत्य सब कहहीं । अवगुन आठ सदा उर रहहीं ।।
साहस अनृत चपलता माया । भय अविवेक असौच अदाया ।।
रिपु कर रुप सकल ते गावा । अति विसाल भय मोहि सुनावा ।।
सो सब प्रिया सहज बस मोरे । समुझि परा प्रसाद अब तोरे ।।
जानिउ प्रिया तोरि चतुराई । एहि विधि कहहु मोरि प्रभुताई ।।
तव बतकही गूढ़ मृगलोचनि । समुझत सुखद सुनत भय मोचनि ।।
मंदोदरि मन महु अस ठयऊ । पियहि काल बस मतिभ्रम भयऊ ।।
एहि बिधि करत बिनोद बहु प्रात प्रगट दसकंध।
सहज असंक लंकपति सभा गयउ मद अंध।।
फूलह फरइ न बेंत जदपि सुधा बरषहि जलद।
मूरुख हृदय न चेत जौ गुर मिलहि बिरंचि सम।।
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
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इहां प्रात जागे रघुराई। पूछा मत सब सचिव बोलाई।।
कहहु बेगि का करिअ उपाई। जामवंत कह पद सिरु नाई।।
सुनु सर्बग्य सकल उर बासी। बुधि बल तेज धर्म गुन रासी।।
मंत्र कहउँ निज मति अनुसारा। दूत पठाइअ बालिकुमारा।।
नीक मंत्र सब के मन माना। अंगद सन कह कृपानिधाना।।
बालितनय बुधि बल गुन धामा। लंका जाहु तात मम कामा।।
बहुत बुझाइ तुम्हहि का कहऊ। परम चतुर मैं जानत अहऊ।।
काजु हमार तासु हित होई। रिपु सन करेहु बतकही सोई।।
प्रभु अग्या धरि सीस चरन बंदि अंगद उठेउ।
सोइ गुन सागर ईस राम कृपा जा पर करहु।।
स्वयं सिद्ध सब काज नाथ मोहि आदरु दियउ।
अस बिचारि जुबराज तन पुलकित हरषित हियउ।।
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
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बंदि चरन उर धरि प्रभुताई। अंगद चलेउ सबहि सिरु नाई।।
प्रभु प्रताप उर सहज असंका। रन बाँकुरा बालिसुत बंका।।
पुर पैठत रावन कर बेटा। खेलत रहा सो होइ गै भैंटा।।
बातहिं बात करष बढ़ि आई। जुगल अतुल बल पुनि तरुनाई।।
तेहि अंगद कहु लात उठाई। गहि पद पटकेउ भूमि भवाई।।
निसिचर निकर देखि भट भारी। जहँ तहँ चले न सकहिं पुकारी।।
एक एक सन मरमु न कहहीं। समुझि तासु बध चुप करि रहहीं।।
भयउ कोलाहल नगर मझारी। आवा कपि लंका जेहीं जारी।।
अब धौं कहा करिहि करतारा। अति सभीत सब करहिं बिचारा।।
बिनु पूछें मगु देहि दिखाई। जेहि बिलोक सोइ जाइ सुखाई।।
गयउ सभा दरबार तब सुमिरि राम पद कंज।
सिंह ठवनि इत उत चितव धीर बीर बल पुंज।।
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
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तुरत निसाचर एक पठावा। समाचार रावनहि जनावा।।
सुनत बिहसि बोला दससीसा। आनहु बोलि कहाँ कर कीसा।।
आयसु पाइ दूत बहु धाए। कपिकुंजरहि बोलि लै आए।।
अंगद दीख दसानन बैंसे। सहित प्रान कज्जलगिरि जैसे।।
भुजा बिटप सिर सृंग समाना। रोमावली लता जनु नाना।।
मुख नासिका नयन अरु काना। गिरि कंदरा खोह अनुमाना।।
गयउ सभा मन नेकु न मुरा। बालितनय अतिबल बांकुरा।।
उठे सभासद कपि कहु देखी। रावन उर भा क्रोध बिसेषी।।
जथा मत्त गज जूथ महु पंचानन चलि जाइ।
राम प्रताप सुमिर मन बैठ सभा सिरु नाइ।।
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
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कह दसकंठ कवन तें बंदर। मैं रघुबीर दूत दसकंधर।।
मम जनकहि तोहि रही मिताई। तव हित कारन आयउ भाई।।
उत्तम कुल पुलस्ति कर नाती। सिव विरंचि पूजेहु बहु भांती।।
वर पायहु कीन्हेहु सब काजा। जीतेहु लोकपाल सब राजा।।
नृप अभिमान मोह बस किंबा। हरि आनिहु सीता जगदंबा।।
अब सुभ कहा सुनहु तुम्ह मोरा। सब अपराध छमिहि प्रभु तोरा।।
दसन गहहु तृन कंठ कुठारी। परिजन सहित संग निज नारी।।
सादर जनकसुता करि आगें। एहि बिधि चलहु सकल भय त्यागें।।
प्रनतपाल रघुबंसमनि त्राहि त्राहि अब मोहि।
आरत गिरा सुनत प्रभु अभय करैगो तोहि।।
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
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रे कपिपोत बोलु संभारी। मूढ़ न जानेहि मोहि सुरारी।।
कहु निज नाम जनक कर भाई। केहि नाते मानिऐ मिताई।।
अंगद नाम बालि कर बेटा। तासों कबहुं भई ही भेटा।।
अंगद बचन सुनत सकुचाना। रहा बालि बानर मैं जाना।।
अंगद तहीं बालि कर बालक। उपजेहु बंस अनल कुल घालक।।
गर्भ न गयहु ब्यर्थ तुम्ह जायहु। निज मुख तापस दूत कहायहु।।
अब कहु कुसल बालि कह अहई। बिहसि बचन तब अंगद कहई।।
दिन दस गए बालि पहिं जाई। बूझेहु कुसल सखा उर लाई।।
राम बिरोध कुसल जसि होई। सो सब तोहि सुनाइहि सोई।।
सुनु सठ भेद होइ मन ताके। श्रीरघुबीर हृदय नहिं जाके।।
हम कुल घालक सत्य तुम्ह कुल पालक दससीस।
अंधउ बधिर न अस कहहिं नयन कान तव बीस।।
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
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सिव बिरंचि सुर मुनि समुदाई। चाहत जासु चरन सेवकाई।।
तासु दूत होइ हम कुल बोरा। अइसिहु मति उर बिहर न तोरा।।
सुनि कठोर बानी कपि केरी। कहत दसानन नयन तरेरी।।
खल तव कठिन बचन सब सहऊ। नीति धर्म मैं जानत अहऊ।।
कह कपि धर्मसीलता तोरी। हमहु सुनी कृत पर त्रिय चोरी।।
देखी नयन दूत रखवारी। बूड़ि न मरहु धर्म ब्रतधारी।।
कान नाक बिनु भगिनि निहारी। छमा कीन्हि तुम्ह धर्म बिचारी।।
धर्मसीलता तव जग जागी। पावा दरसु हमहु बड़भागी।।
जनि जल्पसि जड़ जंतु कपि सठ बिलोकु मम बाहु।
लोकपाल बल बिपुल ससि ग्रसन हेतु सब राहु।।
पुनि नभ सर मम कर निकर कमलन्हि पर करि बास।
सोभत भयउ मराल इव संभु सहित कैलास।।
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
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तुम्हरे कटक माझ सुनु अंगद। मो सन भिरिहि कवन जोधा बद।।
तव प्रभु नारि बिरह बलहीना। अनुज तासु दुख दुखी मलीना।।
तुम्ह सुग्रीव कूलद्रुम दोऊ। अनुज हमार भीरु अति सोऊ।।
जामवंत मंत्री अति बूढ़ा। सो कि होइ अब समरारूढ़ा।।
सिल्पि कर्म जानहिं नल नीला। है कपि एक महा बलसीला।।
आवा प्रथम नगरु जेंहिं जारा। सुनत बचन कह बालिकुमारा।।
सत्य बचन कहु निसिचर नाहा। साँचेहु कीस कीन्ह पुर दाहा।।
रावन नगर अल्प कपि दहई। सुनि अस बचन सत्य को कहई।।
जो अति सुभट सराहेहु रावन। सो सुग्रीव केर लघु धावन।।
चलइ बहुत सो बीर न होई। पठवा खबरि लेन हम सोई।।
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
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सत्य नगरु कपि जारेउ बिनु प्रभु आयसु पाइ।
फिरि न गयउ सुग्रीव पहिं तेहि भय रहा लुकाइ।।
सत्य कहहि दसकंठ सब मोहि न सुनि कछु कोह।
कोउ न हमारें कटक अस तो सन लरत जो सोह।।
प्रीति बिरोध समान सन करिअ नीति असि आहि।
जौ मृगपति बध मेड़ुकन्हि भल कि कहइ कोउ ताहि।।
जद्यपि लघुता राम कहु तोहि बधे बड़ दोष।
तदपि कठिन दसकंठ सुनु छत्र जाति कर रोष।।
बक्र उक्ति धनु बचन सर हृदय दहेउ रिपु कीस।
प्रतिउत्तर सड़सिन्ह मनहु काढ़त भट दससीस।।
हँसि बोलेउ दसमौलि तब कपि कर बड़ गुन एक।
जो प्रतिपालइ तासु हित करइ उपाय अनेक।।
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
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धन्य कीस जो निज प्रभु काजा। जहँ तहँ नाचइ परिहरि लाजा।।
नाचि कूदि करि लोग रिझाई। पति हित करइ धर्म निपुनाई।।
अंगद स्वामिभक्त तव जाती। प्रभु गुन कस न कहसि एहि भांती।।
मैं गुन गाहक परम सुजाना। तव कटु रटनि करउ नहिं काना।।
कह कपि तव गुन गाहकताई। सत्य पवनसुत मोहि सुनाई।।
बन बिधंसि सुत बधि पुर जारा। तदपि न तेहि कछु कृत अपकारा।।
सोइ बिचारि तव प्रकृति सुहाई। दसकंधर मैं कीन्हि ढिठाई।।
देखेउ आइ जो कछु कपि भाषा। तुम्हरें लाज न रोष न माखा।।
जौं असि मति पितु खाए कीसा। कहि अस बचन हसा दससीसा।।
पितहि खाइ खातेउ पुनि तोही। अबहीं समुझि परा कछु मोही।।
बालि बिमल जस भाजन जानी। हतउ न तोहि अधम अभिमानी।।
कहु रावन रावन जग केते। मैं निज श्रवन सुने सुनु जेते।।
बलिहि जितन एक गयउ पताला। राखेउ बाँधि सिसुन्ह हयसाला।।
खेलहिं बालक मारहिं जाई। दया लागि बलि दीन्ह छोड़ाई।।
एक बहोरि सहसभुज देखा। धाइ धरा जिमि जंतु बिसेषा।।
कौतुक लागि भवन लै आवा। सो पुलस्ति मुनि जाइ छोड़ावा।।
एक कहत मोहि सकुच अति रहा बालि की कांख।
इन्ह महु रावन तैं कवन सत्य बदहि तजि माख।।
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
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सुनु सठ सोइ रावन बलसीला। हरगिरि जान जासु भुज लीला।।
जान उमापति जासु सुराई। पूजेउ जेहि सिर सुमन चढ़ाई।।
सिर सरोज निज करन्हि उतारी। पूजेउ अमित बार त्रिपुरारी।।
भुज बिक्रम जानहिं दिगपाला। सठ अजहू जिन्ह कें उर साला।।
जानहिं दिग्गज उर कठिनाई। जब जब भिरउ जाइ बरिआई।।
जिन्ह के दसन कराल न फूटे। उर लागत मूलक इव टूटे।।
जासु चलत डोलति इमि धरनी। चढ़त मत्त गज जिमि लघु तरनी।।
सोइ रावन जग बिदित प्रतापी। सुनेहि न श्रवन अलीक प्रलापी।।
तेहि रावन कह लघु कहसि नर कर करसि बखान।
रे कपि बर्बर खर्ब खल अब जाना तव ग्यान।।
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
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सुनि अंगद सकोप कह बानी। बोलु संभारि अधम अभिमानी।।
सहसबाहु भुज गहन अपारा। दहन अनल सम जासु कुठारा।।
जासु परसु सागर खर धारा। बूड़े नृप अगनित बहु बारा।।
तासु गर्ब जेहि देखत भागा। सो नर क्यों दससीस अभागा।।
राम मनुज कस रे सठ बंगा। धन्वी कामु नदी पुनि गंगा।।
पसु सुरधेनु कल्पतरु रूखा। अन्न दान अरु रस पीयूषा।।
बैनतेय खग अहि सहसानन। चिंतामनि पुनि उपल दसानन।।
सुनु मतिमंद लोक बैकुंठा। लाभ कि रघुपति भगति अकुंठा।।
सेन सहित तब मान मथि बन उजारि पुर जारि।।
कस रे सठ हनुमान कपि गयउ जो तव सुत मारि।।
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
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सुनु रावन परिहरि चतुराई। भजसि न कृपासिंधु रघुराई।।
जौ खल भएसि राम कर द्रोही। ब्रह्म रुद्र सक राखि न तोही।।
मूढ़ बृथा जनि मारसि गाला। राम बयर अस होइहि हाला।।
तव सिर निकर कपिन्ह के आगें। परिहहिं धरनि राम सर लागें।।
ते तव सिर कंदुक सम नाना। खेलहहिं भालु कीस चौगाना।।
जबहिं समर कोपहि रघुनायक। छुटिहहिं अति कराल बहु सायक।।
तब कि चलिहि अस गाल तुम्हारा। अस बिचारि भजु राम उदारा।।
सुनत बचन रावन परजरा। जरत महानल जनु घृत परा।।
कुंभकरन अस बंधु मम सुत प्रसिद्ध सक्रारि।
मोर पराक्रम नहिं सुनेहि जितेउ चराचर झारि।

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