शनिवार, मई 15, 2010

बालकाण्ड 13


tulasi das .. Ram Charit Manas..ramayanstory of the lord rama..king of ayodhya
by...rajeev kumar kulshrestha
गरजहि गज घंटा धुनि घोरा। रथ रव बाजि हिंस चहु ओरा॥
निदरि घनहि घुर्म्मरहिं निसाना। निज पराइ कछु सुनिअ न काना॥
महा भीर भूपति के द्वारे। रज होइ जाइ पषान पबारे॥
चढ़ी अटारिन्ह देखहिं नारीं। लिए आरती मंगल थारी
गावहिं गीत मनोहर नाना। अति आनंदु न जाइ बखाना॥
तब सुमंत्र दुइ स्यंदन साजी। जोते रबि हय निंदक बाजी
दोउ रथ रुचिर भूप पहिं आने। नहिं सारद पहिं जाहिं बखाने॥
राज समाजु एक रथ साजा। दूसर तेज पुंज अति भ्राजा
तेहि रथ रुचिर बसिष्ठ कहु हरषि चढ़ाइ नरेस।
आपु चढ़ेउ स्यंदन सुमिरि हर गुर गौरि गनेस
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
satguru-satykikhoj.blogspot.com
सहित बसिष्ठ सोह नृप कैसें। सुर गुर संग पुरंदर जैसें॥
करि कुल रीति बेद बिधि राऊ। देखि सबहि सब भाँति बनाऊ॥
सुमिरि रामु गुर आयसु पाई। चले महीपति संख बजाई॥
हरषे बिबुध बिलोकि बराता। बरषहिं सुमन सुमंगल दाता
भयउ कोलाहल हय गय गाजे। ब्योम बरात बाजने बाजे॥
सुर नर नारि सुमंगल गाई। सरस राग बाजहिं सहनाई
घंट घंटि धुनि बरनि न जाहीं। सरव करहिं पाइक फहराहीं॥
करहिं बिदूषक कौतुक नाना। हास कुसल कल गान सुजाना
तुरग नचावहिं कुँअर बर अकनि मृदंग निसान॥
नागर नट चितवहिं चकित डगहिं न ताल बँधान॥
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
satguru-satykikhoj.blogspot.com
बनइ न बरनत बनी बराता। होहिं सगुन सुंदर सुभदाता॥
चारा चाषु बाम दिसि लेई। मनहु सकल मंगल कहि देई॥
दाहिन काग सुखेत सुहावा। नकुल दरसु सब काहू पावा॥
सानुकूल बह त्रिबिध बयारी। सघट सवाल आव बर नारी॥
लोवा फिरि फिरि दरसु देखावा। सुरभी सनमुख सिसुहि पिआवा॥
मृगमाला फिरि दाहिनि आई। मंगल गन जनु दीन्हि देखाई
छेमकरी कह छेम बिसेषी। स्यामा बाम सुतरु पर देखी॥
सनमुख आयउ दधि अरु मीना। कर पुस्तक दुइ बिप्र प्रबीना॥
मंगलमय कल्यानमय अभिमत फल दातार।
जनु सब साचे होन हित भए सगुन एक बार
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
satguru-satykikhoj.blogspot.com
मंगल सगुन सुगम सब ताकें। सगुन ब्रह्म सुंदर सुत जाके॥
राम सरिस बरु दुलहिनि सीता। समधी दसरथु जनकु पुनीता
सुनि अस ब्याहु सगुन सब नाचे। अब कीन्हे बिरंचि हम सांचे॥
एहि बिधि कीन्ह बरात पयाना। हय गय गाजहिं हने निसाना
आवत जानि भानुकुल केतू। सरितन्हि जनक बंधाए सेतू॥
बीच बीच बर बास बनाए। सुरपुर सरिस संपदा छाए
असन सयन बर बसन सुहाए। पावहिं सब निज निज मन भाए॥
नित नूतन सुख लखि अनुकूले। सकल बरातिन्ह मंदिर भूले
आवत जानि बरात बर सुनि गहगहे निसान।
सजि गज रथ पदचर तुरग लेन चले अगवान॥
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
satguru-satykikhoj.blogspot.com
मासपारायण दसवा विश्राम
कनक कलस भरि कोपर थारा। भाजन ललित अनेक प्रकारा॥
भरे सुधासम सब पकवाने। नाना भाँति न जाहिं बखाने
फल अनेक बर बस्तु सुहाईं। हरषि भेंट हित भूप पठाईं॥
भूषन बसन महामनि नाना। खग मृग हय गय बहुबिधि जाना
मंगल सगुन सुगंध सुहाए। बहुत भाँति महिपाल पठाए॥
दधि चिउरा उपहार अपारा। भरि भरि कांवरि चले कहारा
अगवानन्ह जब दीखि बराता।उर आनंदु पुलक भर गाता॥
देखि बनाव सहित अगवाना। मुदित बरातिन्ह हने निसाना
हरषि परसपर मिलन हित कछुक चले बगमेल।
जनु आनंद समुद्र दुइ मिलत बिहाइ सुबेल॥
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
satguru-satykikhoj.blogspot.com
बरषि सुमन सुर सुंदरि गावहिं। मुदित देव दुंदुभीं बजावहिं॥
बस्तु सकल राखीं नृप आगे। बिनय कीन्ह तिन्ह अति अनुरागे
प्रेम समेत राय सबु लीन्हा। भै बकसीस जाचकन्हि दीन्हा॥
करि पूजा मान्यता बड़ाई। जनवासे कहु चले लवाई
बसन बिचित्र पांवड़े परहीं। देखि धनहु धन मदु परिहरहीं॥
अति सुंदर दीन्हेउ जनवासा। जहँ सब कहु सब भांति सुपासा
जानी सिय बरात पुर आई। कछु निज महिमा प्रगटि जनाई॥
हृदय सुमिरि सब सिद्धि बोलाई। भूप पहुनई करन पठाई॥
सिधि सब सिय आयसु अकनि गईं जहाँ जनवास।
लिए संपदा सकल सुख सुरपुर भोग बिलास
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
satguru-satykikhoj.blogspot.com
निज निज बास बिलोकि बराती। सुर सुख सकल सुलभ सब भाँती॥
बिभव भेद कछु कोउ न जाना। सकल जनक कर करहिं बखाना
सिय महिमा रघुनायक जानी। हरषे हृदय हेतु पहिचानी॥
पितु आगमनु सुनत दोउ भाई। हृदय न अति आनंदु अमाई
सकुचन्ह कहि न सकत गुरु पाहीं। पितु दरसन लालचु मन माहीं॥
बिस्वामित्र बिनय बड़ि देखी। उपजा उर संतोषु बिसेषी
हरषि बंधु दोउ हृदय लगाए। पुलक अंग अंबक जल छाए॥
चले जहाँ दसरथु जनवासे। मनहु सरोबर तकेउ पिआसे
भूप बिलोके जबहिं मुनि आवत सुतन्ह समेत।
उठे हरषि सुखसिंधु महु चले थाह सी लेत
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
satguru-satykikhoj.blogspot.com
मुनिहि दंडवत कीन्ह महीसा। बार बार पद रज धरि सीसा॥
कौसिक राउ लिये उर लाई। कहि असीस पूछी कुसलाई
पुनि दंडवत करत दोउ भाई। देखि नृपति उर सुखु न समाई॥
सुत हिय लाइ दुसह दुख मेटे। मृतक सरीर प्रान जनु भेंटे
पुनि बसिष्ठ पद सिर तिन्ह नाए। प्रेम मुदित मुनिबर उर लाए॥
बिप्र बृंद बंदे दुहु भाई। मन भावती असीसे पाई
भरत सहानुज कीन्ह प्रनामा। लिए उठाइ लाइ उर रामा॥
हरषे लखन देखि दोउ भ्राता। मिले प्रेम परिपूरित गाता
पुरजन परिजन जातिजन जाचक मंत्री मीत।
मिले जथाबिधि सबहि प्रभु परम कृपाल बिनीत
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
satguru-satykikhoj.blogspot.com
रामहि देखि बरात जुड़ानी। प्रीति कि रीति न जाति बखानी॥
नृप समीप सोहहिं सुत चारी। जनु धन धरमादिक तनुधारी
सुतन्ह समेत दसरथहि देखी। मुदित नगर नर नारि बिसेषी॥
सुमन बरिसि सुर हनहिं निसाना। नाकनटी नाचहिं करि गाना
सतानंद अरु बिप्र सचिव गन। मागध सूत बिदुष बंदीजन॥
सहित बरात राउ सनमाना। आयसु मागि फिरे अगवाना
प्रथम बरात लगन ते आई। ताते पुर प्रमोदु अधिकाई॥
ब्रह्मानंदु लोग सब लहहीं। बढ़हु दिवस निसि बिधि सन कहहीं
रामु सीय सोभा अवधि सुकृत अवधि दोउ राज।
जहँ जहँ पुरजन कहहिं अस मिलि नर नारि समाज
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
satguru-satykikhoj.blogspot.com
जनक सुकृत मूरति बैदेही। दसरथ सुकृत रामु धरें देही॥
इन्ह सम काहु न सिव अवराधे। काहि न इन्ह समान फल लाधे
इन्ह सम कोउ न भयउ जग माहीं। है नहिं कतहू होनेउ नाहीं॥
हम सब सकल सुकृत कै रासी। भए जग जनमि जनकपुर बासी
जिन्ह जानकी राम छबि देखी। को सुकृती हम सरिस बिसेषी॥
पुनि देखब रघुबीर बिआहू। लेब भली बिधि लोचन लाहू
कहहिं परसपर कोकिलबयनीं। एहि बिआह बड़ लाभु सुनयनीं॥
बड़ें भाग बिधि बात बनाई। नयन अतिथि होइहहिं दोउ भाई
बारहिं बार सनेह बस जनक बोलाउब सीय।
लेन आइहहिं बंधु दोउ कोटि काम कमनीय
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
satguru-satykikhoj.blogspot.com
बिबिध भाँति होइहि पहुनाई। प्रिय न काहि अस सासुर माई॥
तब तब राम लखनहि निहारी। होइहहिं सब पुर लोग सुखारी
सखि जस राम लखनकर जोटा। तैसेइ भूप संग दुइ ढोटा॥
स्याम गौर सब अंग सुहाए। ते सब कहहिं देखि जे आए
कहा एक मैं आजु निहारे। जनु बिरंचि निज हाथ संवारे॥
भरतु रामही की अनुहारी। सहसा लखि न सकहिं नर नारी
लखनु सत्रुसूदनु एकरूपा। नख सिख ते सब अंग अनूपा॥
मन भावहिं मुख बरनि न जाहीं। उपमा कहु त्रिभुवन कोउ नाहीं
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
satguru-satykikhoj.blogspot.com
उपमा न कोउ कह दास तुलसी कतहु कबि कोबिद कहैं।
बल बिनय बिद्या सील सोभा सिंधु इन्ह से एइ अहैं॥
पुर नारि सकल पसारि अंचल बिधिहि बचन सुनावहीं॥
ब्याहिअहु चारिउ भाइ एहिं पुर हम सुमंगल गावहीं॥
कहहिं परस्पर नारि बारि बिलोचन पुलक तन।
सखि सबु करब पुरारि पुन्य पयोनिधि भूप दोउ
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
satguru-satykikhoj.blogspot.com
एहि बिधि सकल मनोरथ करहीं। आनंद उमगि उमगि उर भरहीं॥
जे नृप सीय स्वयंबर आए। देखि बंधु सब तिन्ह सुख पाए
कहत राम जसु बिसद बिसाला। निज निज भवन गए महिपाला॥
गए बीति कुछ दिन एहि भांती। प्रमुदित पुरजन सकल बराती
मंगल मूल लगन दिनु आवा। हिम रितु अगहनु मासु सुहावा॥
ग्रह तिथि नखतु जोगु बर बारू। लगन सोधि बिधि कीन्ह बिचारू
पठै दीन्हि नारद सन सोई। गनी जनक के गनकन्ह जोई॥
सुनी सकल लोगन्ह यह बाता। कहहिं जोतिषी आहिं बिधाता
धेनुधूरि बेला बिमल सकल सुमंगल मूल।
बिप्रन्ह कहेउ बिदेह सन जानि सगुन अनुकूल
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
satguru-satykikhoj.blogspot.com
उपरोहितहि कहेउ नरनाहा। अब बिलंब कर कारनु काहा॥
सतानंद तब सचिव बोलाए। मंगल सकल साजि सब ल्याए॥
संख निसान पनव बहु बाजे। मंगल कलस सगुन सुभ साजे॥
सुभग सुआसिनि गावहिं गीता। करहिं बेद धुनि बिप्र पुनीता
लेन चले सादर एहि भाँती। गए जहाँ जनवास बराती॥
कोसलपति कर देखि समाजू। अति लघु लाग तिन्हहि सुरराजू
भयउ समउ अब धारिअ पाऊ। यह सुनि परा निसानहिं घाऊ॥
गुरहि पूछि करि कुल बिधि राजा। चले संग मुनि साधु समाजा॥
भाग्य बिभव अवधेस कर देखि देव ब्रह्मादि।
लगे सराहन सहस मुख जानि जनम निज बादि
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
satguru-satykikhoj.blogspot.com
सुरन्ह सुमंगल अवसरु जाना। बरषहिं सुमन बजाइ निसाना॥
सिव ब्रह्मादिक बिबुध बरूथा। चढ़े बिमानन्हि नाना जूथा
प्रेम पुलक तन हृदय उछाहू। चले बिलोकन राम बिआहू॥
देखि जनकपुरु सुर अनुरागे। निज निज लोक सबहिं लघु लागे॥
चितवहिं चकित बिचित्र बिताना। रचना सकल अलौकिक नाना॥
नगर नारि नर रूप निधाना। सुघर सुधरम सुसील सुजाना॥
तिन्हहि देखि सब सुर सुरनारीं। भए नखत जनु बिधु उजिआरीं॥
बिधिहि भयह आचरजु बिसेषी। निज करनी कछु कतहु न देखी
सिव समुझाए देव सब जनि आचरज भुलाहु।
हृदय बिचारहु धीर धरि सिय रघुबीर बिआहु
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
satguru-satykikhoj.blogspot.com
जिन्ह कर नामु लेत जग माहीं। सकल अमंगल मूल नसाहीं॥
करतल होहिं पदारथ चारी। तेइ सिय रामु कहेउ कामारी
एहि बिधि संभु सुरन्ह समुझावा। पुनि आगें बर बसह चलावा॥
देवन्ह देखे दसरथु जाता। महामोद मन पुलकित गाता
साधु समाज संग महिदेवा। जनु तनु धरे करहि सुख सेवा॥
सोहत साथ सुभग सुत चारी। जनु अपबरग सकल तनुधारी
मरकत कनक बरन बर जोरी। देखि सुरन्ह भै प्रीति न थोरी॥
पुनि रामहि बिलोकि हिय हरषे। नृपहि सराहि सुमन तिन्ह बरषे
राम रूपु नख सिख सुभग बारहिं बार निहारि।
पुलक गात लोचन सजल उमा समेत पुरारि
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
satguru-satykikhoj.blogspot.com
केकि कंठ दुति स्यामल अंगा। तड़ित बिनिंदक बसन सुरंगा॥
ब्याह बिभूषन बिबिध बनाए। मंगल सब सब भाँति सुहाए
सरद बिमल बिधु बदनु सुहावन। नयन नवल राजीव लजावन॥
सकल अलौकिक सुंदरताई। कहि न जाइ मनही मन भाई
बंधु मनोहर सोहहिं संगा। जात नचावत चपल तुरंगा॥
राजकुअँर बर बाजि देखावहिं। बंस प्रसंसक बिरिद सुनावहिं
जेहि तुरंग पर रामु बिराजे। गति बिलोकि खगनायक लाजे॥
कहि न जाइ सब भाँति सुहावा। बाजि बेषु जनु काम बनावा
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
satguru-satykikhoj.blogspot.com
जनु बाजि बेषु बनाइ मनसिजु राम हित अति सोहई।
आपनें बय बल रूप गुन गति सकल भुवन बिमोहई॥
जगमगत जीनु जराव जोति सुमोति मनि मानिक लगे।
किंकिनि ललाम लगामु ललित बिलोकि सुर नर मुनि ठगे॥
प्रभु मनसहिं लयलीन मनु चलत बाजि छबि पाव।
भूषित उड़गन तड़ित घनु जनु बर बरहि नचाव
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
satguru-satykikhoj.blogspot.com
जेहिं बर बाजि रामु असवारा। तेहि सारदउ न बरनै पारा॥
संकरु राम रूप अनुरागे। नयन पंचदस अति प्रिय लागे
हरि हित सहित रामु जब जोहे। रमा समेत रमापति मोहे॥
निरखि राम छबि बिधि हरषाने। आठइ नयन जानि पछिताने
सुर सेनप उर बहुत उछाहू। बिधि ते डेवढ़ लोचन लाहू॥
रामहि चितव सुरेस सुजाना। गौतम श्रापु परम हित माना
देव सकल सुरपतिहि सिहाहीं। आजु पुरंदर सम कोउ नाहीं॥
मुदित देवगन रामहि देखी। नृपसमाज दुहु हरषु बिसेषी॥
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
satguru-satykikhoj.blogspot.com
अति हरषु राजसमाज दुहु दिसि दुंदुभीं बाजहिं घनी।
बरषहिं सुमन सुर हरषि कहि जय जयति जय रघुकुलमनी॥
एहि भाँति जानि बरात आवत बाजने बहु बाजहीं।
रानि सुआसिनि बोलि परिछनि हेतु मंगल साजहीं॥
सजि आरती अनेक बिधि मंगल सकल सँवारि।
चलीं मुदित परिछनि करन गजगामिनि बर नारि
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
satguru-satykikhoj.blogspot.com
बिधुबदनी सब सब मृगलोचनि। सब निज तन छबि रति मदु मोचनि॥
पहिरें बरन बरन बर चीरा। सकल बिभूषन सजे सरीरा॥
सकल सुमंगल अंग बनाए। करहिं गान कलकंठि लजाए॥
कंकन किंकिनि नूपुर बाजहिं। चालि बिलोकि काम गज लाजहिं
बाजहिं बाजने बिबिध प्रकारा। नभ अरु नगर सुमंगलचारा॥
सची सारदा रमा भवानी। जे सुरतिय सुचि सहज सयानी
कपट नारि बर बेष बनाई। मिली सकल रनिवासहि जाई॥
करहिं गान कल मंगल बानी। हरष बिबस सब काहु न जानी॥
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
satguru-satykikhoj.blogspot.com
को जान केहि आनंद बस सब ब्रह्मु बर परिछन चली।
कल गान मधुर निसान बरषहिं सुमन सुर सोभा भली॥
आनंदकंदु बिलोकि दूलहु सकल हिय हरषित भई॥
अंभोज अंबक अंबु उमगि सुअंग पुलकावलि छई॥
जो सुख भा सिय मातु मन देखि राम बर बेषु।
सो न सकहिं कहि कलप सत सहस सारदा सेषु
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
satguru-satykikhoj.blogspot.com
नयन नीरु हटि मंगल जानी। परिछनि करहिं मुदित मन रानी॥
बेद बिहित अरु कुल आचारू। कीन्ह भली बिधि सब ब्यवहारू॥
पंच सबद धुनि मंगल गाना। पट पाँवड़े परहिं बिधि नाना॥
करि आरती अरघु तिन्ह दीन्हा। राम गमनु मंडप तब कीन्हा॥
दसरथु सहित समाज बिराजे। बिभव बिलोकि लोकपति लाजे॥
समय समय सुर बरषहिं फूला। सांति पढ़हिं महिसुर अनुकूला
नभ अरु नगर कोलाहल होई। आपनि पर कछु सुनइ न कोई॥
एहि बिधि रामु मंडपहिं आए। अरघु देइ आसन बैठाए॥
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
satguru-satykikhoj.blogspot.com
बैठारि आसन आरती करि निरखि बरु सुखु पावहीं॥
मनि बसन भूषन भूरि वारहिं नारि मंगल गावहीं॥
ब्रह्मादि सुरबर बिप्र बेष बनाइ कौतुक देखहीं।
अवलोकि रघुकुल कमल रबि छबि सुफल जीवन लेखहीं॥
नाऊ बारी भाट नट राम निछावरि पाइ।
मुदित असीसहिं नाइ सिर हरष न हृदय समाइ॥
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
satguru-satykikhoj.blogspot.com
मिले जनकु दसरथु अति प्रीती। करि बैदिक लौकिक सब रीती॥
मिलत महा दोउ राज बिराजे। उपमा खोजि खोजि कबि लाजे
लही न कतहु हारि हिय मानी। इन्ह सम एइ उपमा उर आनी॥
सामध देखि देव अनुरागे। सुमन बरषि जसु गावन लागे
जगु बिरंचि उपजावा जब तें। देखे सुने ब्याह बहु तब तें॥
सकल भाँति सम साजु समाजू। सम समधी देखे हम आजू
देव गिरा सुनि सुंदर साँची। प्रीति अलौकिक दुहु दिसि माची॥
देत पाँवड़े अरघु सुहाए। सादर जनकु मंडपहिं ल्याए
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
satguru-satykikhoj.blogspot.com
मंडपु बिलोकि बिचित्र रचना रुचिरता मुनि मन हरे॥
निज पानि जनक सुजान सब कहु आनि सिंघासन धरे॥
कुल इष्ट सरिस बसिष्ट पूजे बिनय करि आसिष लही।
कौसिकहि पूजत परम प्रीति कि रीति तौ न परै कही॥
बामदेव आदिक रिषय पूजे मुदित महीस।
दिए दिब्य आसन सबहि सब सन लही असीस॥
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
satguru-satykikhoj.blogspot.com
बहुरि कीन्ह कोसलपति पूजा। जानि ईस सम भाउ न दूजा॥
कीन्ह जोरि कर बिनय बड़ाई। कहि निज भाग्य बिभव बहुताई
पूजे भूपति सकल बराती। समधी सम सादर सब भाँती॥
आसन उचित दिए सब काहू। कहौं काह मूख एक उछाहू
सकल बरात जनक सनमानी। दान मान बिनती बर बानी॥
बिधि हरि हरु दिसिपति दिनराऊ। जे जानहिं रघुबीर प्रभाऊ
कपट बिप्र बर बेष बनाए। कौतुक देखहिं अति सचु पाए॥
पूजे जनक देव सम जानें। दिए सुआसन बिनु पहिचानें
पहिचान को केहि जान सबहिं अपान सुधि भोरी भई।
आनंद कंदु बिलोकि दूलहु उभय दिसि आनंद मई॥
सुर लखे राम सुजान पूजे मानसिक आसन दए।
अवलोकि सीलु सुभाउ प्रभु को बिबुध मन प्रमुदित भए॥
रामचंद्र मुख चंद्र छबि लोचन चारु चकोर।
करत पान सादर सकल प्रेमु प्रमोदु न थोर॥
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
satguru-satykikhoj.blogspot.com
समउ बिलोकि बसिष्ठ बोलाए। सादर सतानंदु सुनि आए॥
बेगि कुअँरि अब आनहु जाई। चले मुदित मुनि आयसु पाई
रानी सुनि उपरोहित बानी। प्रमुदित सखिन्ह समेत सयानी॥
बिप्र बधू कुलबृद्ध बोलाई। करि कुल रीति सुमंगल गाई
नारि बेष जे सुर बर बामा। सकल सुभाय सुंदरी स्यामा॥
तिन्हहि देखि सुखु पावहिं नारी। बिनु पहिचानि प्रानहु ते प्यारी
बार बार सनमानहिं रानी। उमा रमा सारद सम जानी॥
सीय संवारि समाजु बनाई। मुदित मंडपहिं चली लवाई
चलि ल्याइ सीतहि सखी सादर सजि सुमंगल भामिनी।
नवसप्त साजे सुंदरी सब मत्त कुंजर गामिनी॥
कल गान सुनि मुनि ध्यान त्यागहि काम कोकिल लाजही।
मंजीर नूपुर कलित कंकन ताल गती बर बाजही॥
सोहति बनिता बृंद महु सहज सुहावनि सीय।
छबि ललना गन मध्य जनु सुषमा तिय कमनीय॥
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
satguru-satykikhoj.blogspot.com
सिय सुंदरता बरनि न जाई। लघु मति बहुत मनोहरताई॥
आवत दीखि बरातिन्ह सीता॥रूप रासि सब भाँति पुनीता
सबहि मनहिं मन किए प्रनामा। देखि राम भए पूरनकामा॥
हरषे दसरथ सुतन्ह समेता। कहि न जाइ उर आनंदु जेता
सुर प्रनामु करि बरसहिं फूला। मुनि असीस धुनि मंगल मूला॥
गान निसान कोलाहलु भारी। प्रेम प्रमोद मगन नर नारी॥
एहि बिधि सीय मंडपहिं आई। प्रमुदित सांति पढ़हिं मुनिराई॥
तेहि अवसर कर बिधि ब्यवहारू। दुहु कुलगुर सब कीन्ह अचारू
आचारु करि गुर गौरि गनपति मुदित बिप्र पुजावहीं।
सुर प्रगटि पूजा लेहिं देहिं असीस अति सुखु पावहीं॥
मधुपर्क मंगल द्रब्य जो जेहि समय मुनि मन महु चहैं।
भरे कनक कोपर कलस सो सब लिएहिं परिचारक रहैं
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
satguru-satykikhoj.blogspot.com
कुल रीति प्रीति समेत रबि कहि देत सबु सादर कियो।
एहि भाँति देव पुजाइ सीतहि सुभग सिंघासनु दियो॥
सिय राम अवलोकनि परसपर प्रेम काहु न लखि परै॥
मन बुद्धि बर बानी अगोचर प्रगट कबि कैसें करै॥
होम समय तनु धरि अनलु अति सुख आहुति लेहिं।
बिप्र बेष धरि बेद सब कहि बिबाह बिधि देहिं॥
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
satguru-satykikhoj.blogspot.com
जनक पाटमहिषी जग जानी। सीय मातु किमि जाइ बखानी॥
सुजसु सुकृत सुख सुदंरताई। सब समेटि बिधि रची बनाई
समउ जानि मुनिबरन्ह बोलाई। सुनत सुआसिनि सादर ल्याई॥
जनक बाम दिसि सोह सुनयना। हिमगिरि संग बनि जनु मयना
कनक कलस मनि कोपर रूरे। सुचि सुंगध मंगल जल पूरे॥
निज कर मुदित राय अरु रानी। धरे राम के आगे आनी
पढ़हिं बेद मुनि मंगल बानी। गगन सुमन झरि अवसरु जानी॥
बरु बिलोकि दंपति अनुरागे। पाय पुनीत पखारन लागे
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
satguru-satykikhoj.blogspot.com
लागे पखारन पाय पंकज प्रेम तन पुलकावली।
नभ नगर गान निसान जय धुनि उमगि जनु चहु दिसि चली॥
जे पद सरोज मनोज अरि उर सर सदैव बिराजहीं।
जे सकृत सुमिरत बिमलता मन सकल कलि मल भाजहीं
जे परसि मुनिबनिता लही गति रही जो पातकमई।
मकरंदु जिन्ह को संभु सिर सुचिता अवधि सुर बरनई॥
करि मधुप मन मुनि जोगिजन जे सेइ अभिमत गति लहै।
ते पद पखारत भाग्यभाजनु जनकु जय जय सब कहै
बर कुअंरि करतल जोरि साखोचारु दोउ कुलगुर करै।
भयो पानिगहनु बिलोकि बिधि सुर मनुज मुनि आनंद भरै॥
सुखमूल दूलहु देखि दंपति पुलक तन हुलस्यो हियो।
करि लोक बेद बिधानु कन्यादानु नृपभूषन कियो
हिमवंत जिमि गिरिजा महेसहि हरिहि श्री सागर दई।
तिमि जनक रामहि सिय समरपी बिस्व कल कीरति नई॥
क्यों करै बिनय बिदेहु कियो बिदेहु मूरति सांवरी।
करि होम बिधिवत गांठि जोरी होन लागी भांवरी
जय धुनि बंदी बेद धुनि मंगल गान निसान।
सुनि हरषहिं बरषहिं बिबुध सुरतरु सुमन सुजान
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
satguru-satykikhoj.blogspot.com
कुअँरु कुअँरि कल भांवरि देही। नयन लाभु सब सादर लेही॥
जाइ न बरनि मनोहर जोरी। जो उपमा कछु कहौं सो थोरी
राम सीय सुंदर प्रतिछाही। जगमगात मनि खंभन माही ।
मनहु मदन रति धरि बहु रूपा। देखत राम बिआहु अनूपा
दरस लालसा सकुच न थोरी। प्रगटत दुरत बहोरि बहोरी॥
भए मगन सब देखनिहारे। जनक समान अपान बिसारे
प्रमुदित मुनिन्ह भांवरी फेरी। नेगसहित सब रीति निबेरी॥
राम सीय सिर सेंदुर देही। सोभा कहि न जाति बिधि केही
अरुन पराग जलजु भरि नीके। ससिहि भूष अहि लोभ अमी के॥
बहुरि बसिष्ठ दीन्ह अनुसासन। बरु दुलहिनि बैठे एक आसन
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
satguru-satykikhoj.blogspot.com
बैठे बरासन रामु जानकि मुदित मन दसरथु भए ।
तनु पुलक पुनि पुनि देखि अपनें सुकृत सुरतरु फल नए॥
भरि भुवन रहा उछाहु राम बिबाहु भा सबहीं कहा।
केहि भांति बरनि सिरात रसना एक यहु मंगलु महा
तब जनक पाइ बसिष्ठ आयसु ब्याह साज संवारि कै।
मांडवी श्रुतिकीरति उरमिला कुअँरि लई हँकारि के॥
कुसकेतु कन्या प्रथम जो गुन सील सुख सोभामई।
सब रीति प्रीति समेत करि सो ब्याहि नृप भरतहि दई
जानकी लघु भगिनी सकल सुंदरि सिरोमनि जानि कै।
सो तनय दीन्ही ब्याहि लखनहि सकल बिधि सनमानि कै॥
जेहि नामु श्रुतकीरति सुलोचनि सुमुखि सब गुन आगरी।
सो दई रिपुसूदनहि भूपति रूप सील उजागरी
अनुरुप बर दुलहिनि परस्पर लखि सकुच हिय हरषही।
सब मुदित सुंदरता सराहहिं सुमन सुर गन बरषही॥
सुंदरी सुंदर बरन्ह सह सब एक मंडप राजही।
जनु जीव उर चारिउ अवस्था बिभुन सहित बिराजही
मुदित अवधपति सकल सुत बधुन्ह समेत निहारि।
जनु पाए महिपाल मनि क्रियन्ह सहित फल चारि॥
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
satguru-satykikhoj.blogspot.com
जसि रघुबीर ब्याह बिधि बरनी। सकल कुंअर ब्याहे तेहिं करनी॥
कहि न जाइ कछु दाइज भूरी। रहा कनक मनि मंडपु पूरी
कंबल बसन बिचित्र पटोरे। भाँति भाँति बहु मोल न थोरे॥
गज रथ तुरग दास अरु दासी। धेनु अलंकृत कामदुहा सी
बस्तु अनेक करिअ किमि लेखा। कहि न जाइ जानहिं जिन्ह देखा॥
लोकपाल अवलोकि सिहाने। लीन्ह अवधपति सबु सुखु माने
दीन्ह जाचकन्हि जो जेहि भावा। उबरा सो जनवासेहिं आवा॥
तब कर जोरि जनकु मृदु बानी। बोले सब बरात सनमानी
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
satguru-satykikhoj.blogspot.com
सनमानि सकल बरात आदर दान बिनय बड़ाइ कै।
प्रमुदित महा मुनि बृंद बंदे पूजि प्रेम लड़ाइ कै॥
सिरु नाइ देव मनाइ सब सन कहत कर संपुट किए।
सुर साधु चाहत भाउ सिंधु कि तोष जल अंजलि दिए
कर जोरि जनकु बहोरि बंधु समेत कोसलराय सों।
बोले मनोहर बयन सानि सनेह सील सुभाय सों॥
सबंध राजन रावरे हम बड़े अब सब बिधि भए।
एहि राज साज समेत सेवक जानिबे बिनु गथ लए
ए दारिका परिचारिका करि पालिबीं करुना नई।
अपराधु छमिबो बोलि पठए बहुत हौं ढीटयो कई॥
पुनि भानुकुलभूषन सकल सनमान निधि समधी किए।
कहि जाति नहिं बिनती परस्पर प्रेम परिपूरन हिए
बृंदारका गन सुमन बरिसहिं राउ जनवासेहि चले।
दुंदुभी जय धुनि बेद धुनि नभ नगर कौतूहल भले॥
तब सखी मंगल गान करत मुनीस आयसु पाइ कै।
दूलह दुलहिनिन्ह सहित सुंदरि चलीं कोहबर ल्याइ कै
पुनि पुनि रामहि चितव सिय सकुचति मनु सकुचै न।
हरत मनोहर मीन छबि प्रेम पिआसे नैन॥
मासपारायण, ग्यारहवां विश्राम
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
satguru-satykikhoj.blogspot.com
स्याम सरीरु सुभाय सुहावन। सोभा कोटि मनोज लजावन॥
जावक जुत पद कमल सुहाए। मुनि मन मधुप रहत जिन्ह छाए
पीत पुनीत मनोहर धोती। हरति बाल रबि दामिनि जोती॥
कल किंकिनि कटि सूत्र मनोहर। बाहु बिसाल बिभूषन सुंदर
पीत जनेउ महाछबि देई। कर मुद्रिका चोरि चितु लेई॥
सोहत ब्याह साज सब साजे। उर आयत उरभूषन राजे
पिअर उपरना काखासोती। दुहु आंचरन्हि लगे मनि मोती॥
नयन कमल कल कुंडल काना। बदनु सकल सौंदर्ज निधाना
सुंदर भृकुटि मनोहर नासा। भाल तिलकु रुचिरता निवासा॥
सोहत मौरु मनोहर माथे। मंगलमय मुकुता मनि गाथे॥
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
satguru-satykikhoj.blogspot.com
गाथे महामनि मौर मंजुल अंग सब चित चोरहीं।
पुर नारि सुर सुंदरीं बरहि बिलोकि सब तिन तोरहीं॥
मनि बसन भूषन वारि आरति करहिं मंगल गावहिं।
सुर सुमन बरिसहिं सूत मागध बंदि सुजसु सुनावहीं
कोहबरहिं आने कुंअर कुंअर सुआसिनिन्ह सुख पाइ कै।
अति प्रीति लौकिक रीति लागीं करन मंगल गाइ कै॥
लहकौरि गौरि सिखाव रामहि सीय सन सारद कहैं।
रनिवासु हास बिलास रस बस जन्म को फलु सब लहैं
निज पानि मनि महु देखिअति मूरति सुरूपनिधान की।
चालति न भुजबल्ली बिलोकनि बिरह भय बस जानकी॥
कौतुक बिनोद प्रमोदु प्रेमु न जाइ कहि जानहिं अलीं।
बर कुअंर सुंदर सकल सखीं लवाइ जनवासेहि चलीं
तेहि समय सुनिअ असीस जहँ तहँ नगर नभ आनंदु महा।
चिरु जिअहु जोरी चारु चारयो मुदित मन सबहीं कहा॥
जोगीन्द्र सिद्ध मुनीस देव बिलोकि प्रभु दुंदुभि हनी।
चले हरषि बरषि प्रसून निज निज लोक जय जय जय भनी
सहित बधूटिन्ह कुंअर सब तब आए पितु पास।
सोभा मंगल मोद भरि उमगेउ जनु जनवास
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
satguru-satykikhoj.blogspot.com
पुनि जेवनार भई बहु भांती। पठए जनक बोलाइ बराती॥
परत पांवड़े बसन अनूपा। सुतन्ह समेत गवन कियो भूपा
सादर सबके पाय पखारे। जथाजोगु पीढ़न्ह बैठारे॥
धोए जनक अवधपति चरना। सीलु सनेहु जाइ नहिं बरना
बहुरि राम पद पंकज धोए। जे हर हृदय कमल महु गोए॥
तीनिउ भाई राम सम जानी। धोए चरन जनक निज पानी
आसन उचित सबहि नृप दीन्हे। बोलि सूपकारी सब लीन्हे॥
सादर लगे परन पनवारे। कनक कील मनि पान संवारे
सूपोदन सुरभी सरपि सुंदर स्वादु पुनीत।
छन महु सब के परुसि गे चतुर सुआर बिनीत
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
satguru-satykikhoj.blogspot.com
पंच कवल करि जेवन लअगे। गारि गान सुनि अति अनुरागे॥
भाँति अनेक परे पकवाने। सुधा सरिस नहिं जाहिं बखाने
परुसन लगे सुआर सुजाना। बिंजन बिबिध नाम को जाना॥
चारि भाँति भोजन बिधि गाई। एक एक बिधि बरनि न जाई
छरस रुचिर बिंजन बहु जाती। एक एक रस अगनित भांती॥
जेवत देहिं मधुर धुनि गारी। लै लै नाम पुरुष अरु नारी
समय सुहावनि गारि बिराजा। हसत राउ सुनि सहित समाजा॥
एहि बिधि सबहीं भोजन कीन्हा। आदर सहित आचमनु दीन्हा
देइ पान पूजे जनक दसरथु सहित समाज।
जनवासेहि गवने मुदित सकल भूप सिरताज॥
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
satguru-satykikhoj.blogspot.com
नित नूतन मंगल पुर माहीं। निमिष सरिस दिन जामिनि जाहीं॥
बड़े भोर भूपतिमनि जागे। जाचक गुन गन गावन लागे
देखि कुंअर बर बधुन्ह समेता। किमि कहि जात मोदु मन जेता॥
प्रातक्रिया करि गे गुरु पाही। महाप्रमोदु प्रेमु मन माही
करि प्रनाम पूजा कर जोरी। बोले गिरा अमिअ जनु बोरी॥
तुम्हरी कृपा सुनहु मुनिराजा। भयउ आजु मैं पूरन काजा
अब सब बिप्र बोलाइ गोसाई। देहु धेनु सब भाँति बनाई॥
सुनि गुर करि महिपाल बड़ाई। पुनि पठए मुनि बृंद बोलाई
बामदेउ अरु देवरिषि बालमीकि जाबालि।
आए मुनिबर निकर तब कौसिकादि तपसालि॥

कोई टिप्पणी नहीं:

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...