शनिवार, मई 15, 2010

अयोध्याकाण्ड 5

tulasi das .. Ram Charit Manas..ramayan
story of the lord rama..king of ayodhya
by...rajeev kumar kulshrestha
कृपासिंधु बोले मुसकाई। सोइ करु जेहि तव नाव न जाई।।
वेगि आनु जल पाय पखारू। होत बिलंबु उतारहि पारू।।
जासु नाम सुमरत एक बारा। उतरहिं नर भवसिंधु अपारा।।
सोइ कृपालु केवटहि निहोरा। जेहिं जगु किय तिहु पगहु ते थोरा।।
पद नख निरखि देवसरि हरषी। सुनि प्रभु बचन मोह मति करषी।।
केवट राम रजायसु पावा। पानि कठवता भरि लेइ आवा।।
अति आनंद उमगि अनुरागा। चरन सरोज पखारन लागा।।
बरषि सुमन सुर सकल सिहाहीं। एहि सम पुन्यपुंज कोउ नाहीं।।
पद पखारि जलु पान करि आपु सहित परिवार।
पितर पारु करि प्रभुहि पुनि मुदित गयउ लेइ पार
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
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उतरि ठाड़ भए सुरसरि रेता। सीयराम गुह लखन समेता।।
केवट उतरि दंडवत कीन्हा। प्रभुहि सकुच एहि नहिं कछु दीन्हा।।
पिय हिय की सिय जाननिहारी। मनि मुदरी मन मुदित उतारी।।
कहेउ कृपाल लेहि उतराई। केवट चरन गहे अकुलाई।।
नाथ आजु मैं काह न पावा। मिटे दोष दुख दारिद दावा।।
बहुत काल मैं कीन्हि मजूरी। आजु दीन्ह बिधि बनि भलि भूरी।।
अब कछु नाथ न चाहिअ मोरें। दीनदयाल अनुग्रह तोरें।।
फिरती बार मोहि जे देबा। सो प्रसादु मैं सिर धरि लेबा।।
बहुत कीन्ह प्रभु लखन सिय नहिं कछु केवटु लेइ।
बिदा कीन्ह करुनायतन भगति बिमल बरु देइ
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
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तब मज्जनु करि रघुकुलनाथा। पूजि पारथिव नायउ माथा।।
सिय सुरसरिहि कहेउ कर जोरी। मातु मनोरथ पुरउबि मोरी।।
पति देवर संग कुसल बहोरी। आइ करौं जेहिं पूजा तोरी।।
सुनि सिय बिनय प्रेम रस सानी। भइ तब बिमल बारि बर बानी।।
सुनु रघुबीर प्रिया बैदेही। तव प्रभाउ जग बिदित न केही।।
लोकप होहिं बिलोकत तोरे। तोहि सेवहिं सब सिधि कर जोरे।।
तुम्ह जो हमहि बड़ि बिनय सुनाई। कृपा कीन्हि मोहि दीन्हि बड़ाई।।
तदपि देबि मैं देबि असीसा। सफल होपन हित निज बागीसा।।
प्राननाथ देवर सहित कुसल कोसला आइ।
पूजहि सब मनकामना सुजसु रहिहि जग छाइ
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
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गंग बचन सुनि मंगल मूला। मुदित सीय सुरसरि अनुकुला।।
तब प्रभु गुहहि कहेउ घर जाहू। सुनत सूख मुखु भा उर दाहू।।
दीन बचन गुह कह कर जोरी। बिनय सुनहु रघुकुलमनि मोरी।।
नाथ साथ रहि पंथु देखाई। करि दिन चारि चरन सेवकाई।।
जेहिं बन जाइ रहब रघुराई। परनकुटी मैं करबि सुहाई।।
तब मोहि कह जसि देब रजाई। सोइ करिहउ रघुबीर दोहाई।।
सहज सनेह राम लखि तासु। संग लीन्ह गुह हृदय हुलासू।।
पुनि गुह ग्याति बोलि सब लीन्हे। करि परितोषु बिदा तब कीन्हे।।
तब गनपति सिव सुमिरि प्रभु नाइ सुरसरिहि माथ।|
सखा अनुज सिया सहित बन गवनु कीन्ह रधुनाथ
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
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तेहि दिन भयउ बिटप तर बासू। लखन सखा सब कीन्ह सुपासू।।
प्रात प्रातकृत करि रधुसाई। तीरथराजु दीख प्रभु जाई।।
सचिव सत्य श्रध्दा प्रिय नारी। माधव सरिस मीतु हितकारी।।
चारि पदारथ भरा भँडारु। पुन्य प्रदेस देस अति चारु।।
छेत्र अगम गढ़ु गाढ़ सुहावा। सपनेहु नहिं प्रतिपच्छिन्ह पावा।।
सेन सकल तीरथ बर बीरा। कलुष अनीक दलन रनधीरा।।
संगमु सिंहासनु सुठि सोहा। छत्रु अखयबटु मुनि मनु मोहा।।
चवँर जमुन अरु गंग तरंगा। देखि होहिं दुख दारिद भंगा।।
सेवहिं सुकृति साधु सुचि पावहिं सब मनकाम।|
बंदी बेद पुरान गन कहहिं बिमल गुन ग्राम
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
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को कहि सकइ प्रयाग प्रभाऊ। कलुष पुंज कुंजर मृगराऊ।।
अस तीरथपति देखि सुहावा। सुख सागर रघुबर सुखु पावा।।
कहि सिय लखनहि सखहि सुनाई। श्रीमुख तीरथराज बड़ाई।।
करि प्रनामु देखत बन बागा। कहत महातम अति अनुरागा।।
एहि बिधि आइ बिलोकी बेनी। सुमिरत सकल सुमंगल देनी।।
मुदित नहाइ कीन्हि सिव सेवा। पुजि जथाबिधि तीरथ देवा।।
तब प्रभु भरद्वाज पहिं आए। करत दंडवत मुनि उर लाए।।
मुनि मन मोद न कछु कहि जाइ। ब्रह्मानंद रासि जनु पाई।।
दीन्हि असीस मुनीस उर अति अनंदु अस जानि।
लोचन गोचर सुकृत फल मनहु किए बिधि आनि
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
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कुसल प्रस्न करि आसन दीन्हे। पूजि प्रेम परिपूरन कीन्हे।।
कंद मूल फल अंकुर नीके। दिए आनि मुनि मनहु अमी के।।
सीय लखन जन सहित सुहाए। अति रुचि राम मूल फल खाए।।
भए बिगतश्रम रामु सुखारे। भरव्दाज मृदु बचन उचारे।।
आजु सुफल तपु तीरथ त्यागू। आजु सुफल जप जोग बिरागू।।
सफल सकल सुभ साधन साजू। राम तुम्हहि अवलोकत आजू।।
लाभ अवधि सुख अवधि न दूजी। तुम्हारें दरस आस सब पूजी।।
अब करि कृपा देहु बर एहू। निज पद सरसिज सहज सनेहू।।
करम बचन मन छाड़ि छलु जब लगि जनु न तुम्हार।
तब लगि सुखु सपनेहु नहीं किए कोटि उपचार।।
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
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सुनि मुनि बचन रामु सकुचाने। भाव भगति आनंद अघाने।।
तब रघुबर मुनि सुजसु सुहावा। कोटि भाँति कहि सबहि सुनावा।।
सो बड सो सब गुन गन गेहू। जेहि मुनीस तुम्ह आदर देहू।।
मुनि रघुबीर परसपर नवहीं। बचन अगोचर सुखु अनुभवहीं।।
यह सुधि पाइ प्रयाग निवासी। बटु तापस मुनि सिद्ध उदासी।।
भरद्वाज आश्रम सब आए। देखन दसरथ सुअन सुहाए।।
राम प्रनाम कीन्ह सब काहू। मुदित भए लहि लोयन लाहू।।
देहिं असीस परम सुखु पाई। फिरे सराहत सुंदरताई।।
राम कीन्ह बिश्राम निसि प्रात प्रयाग नहाइ।
चले सहित सिय लखन जन मुददित मुनिहि सिरु नाइ
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
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राम सप्रेम कहेउ मुनि पाहीं। नाथ कहिअ हम केहि मग जाहीं।।
मुनि मन बिहसि राम सन कहहीं। सुगम सकल मग तुम्ह कहु अहहीं।।
साथ लागि मुनि सिष्य बोलाए। सुनि मन मुदित पचासक आए।।
सबन्हि राम पर प्रेम अपारा। सकल कहहि मगु दीख हमारा।।
मुनि बटु चारि संग तब दीन्हे। जिन्ह बहु जनम सुकृत सब कीन्हे।।
करि प्रनामु रिषि आयसु पाई। प्रमुदित हृदय चले रघुराई।।
ग्राम निकट जब निकसहि जाई। देखहि दरसु नारि नर धाई।।
होहि सनाथ जनम फलु पाई। फिरहि दुखित मनु संग पठाई।।
बिदा किए बटु बिनय करि फिरे पाइ मन काम।
उतरि नहाए जमुन जल जो सरीर सम स्याम
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
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सुनत तीरवासी नर नारी। धाए निज निज काज बिसारी।।
लखन राम सिय सुन्दरताई। देखि करहिं निज भाग्य बड़ाई।।
अति लालसा बसहिं मन माहीं। नाउं गाउं बूझत सकुचाहीं।।
जे तिन्ह महु बयबिरिध सयाने। तिन्ह करि जुगुति रामु पहिचाने।।
सकल कथा तिन्ह सबहि सुनाई। बनहि चले पितु आयसु पाई।।
सुनि सबिषाद सकल पछिताहीं। रानी राय कीन्ह भल नाहीं।।
तेहि अवसर एक तापसु आवा। तेजपुंज लघुबयस सुहावा।।
कवि अलखित गति बेषु बिरागी। मन क्रम बचन राम अनुरागी।।
सजल नयन तन पुलकि निज इष्टदेउ पहिचानि।
परेउ दंड जिमि धरनितल दसा न जाइ बखानि
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
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राम सप्रेम पुलकि उर लावा। परम रंक जनु पारसु पावा।।
मनहु प्रेमु परमारथु दोऊ। मिलत धरे तन कह सबु कोऊ।।
बहुरि लखन पायन्ह सोइ लागा। लीन्ह उठाइ उमगि अनुरागा।।
पुनि सिय चरन धूरि धरि सीसा। जननि जानि सिसु दीन्हि असीसा।।
कीन्ह निषाद दंडवत तेही। मिलेउ मुदित लखि राम सनेही।।
पिअत नयन पुट रूपु पियूषा। मुदित सुअसनु पाइ जिमि भूखा।।
ते पितु मातु कहहु सखि कैसे। जिन्ह पठए बन बालक ऐसे।।
राम लखन सिय रूपु निहारी। होहिं सनेह बिकल नर नारी।।
तब रघुबीर अनेक बिधि सखहि सिखावनु दीन्ह।
राम रजायसु सीस धरि भवन गवनु तेइ कीन्ह
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
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पुनि सिय राम लखन कर जोरी। जमुनहि कीन्ह प्रनामु बहोरी।।
चले ससीय मुदित दोउ भाई। रबितनुजा कइ करत बड़ाई।।
पथिक अनेक मिलहिं मग जाता। कहहिं सप्रेम देखि दोउ भ्राता।।
राज लखन सब अंग तुम्हारे। देखि सोच अति हृदय हमारे।।
मारग चलहु पयादेहि पाए। ज्योतिष झूठ हमारे भाए।।
अगमु पंथ गिरि कानन भारी। तेहि मह साथ नारि सुकुमारी।।
करि केहरि बन जाइ न जोई। हम संग चलहि जो आयसु होई।।
जाब जहाँ लगि तहँ पहुँचाई। फिरब बहोरि तुम्हहि सिरु नाई।।
एहि बिधि पूछहिं प्रेम बस पुलक गात जलु नैन।
कृपासिंधु फेरहि तिन्हहि कहि बिनीत मृदु बैन
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
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जे पुर गाँव बसहि मग माही। तिन्हहि नाग सुर नगर सिहाही।।
केहि सुकृती केहि घरी बसाए। धन्य पुन्यमय परम सुहाए।।
जहँ जहँ राम चरन चलि जाही। तिन्ह समान अमरावति नाही।।
पुन्यपुंज मग निकट निवासी। तिन्हहि सराहहि सुरपुर बासी।।
जे भरि नयन बिलोकहिं रामहि। सीता लखन सहित घनस्यामहि।।
जे सर सरित राम अवगाहहि। तिन्हहि देव सर सरित सराहहि।।
जेहि तरु तर प्रभु बैठहिं जाई। करहिं कलपतरु तासु बड़ाई।।
परसि राम पद पदुम परागा। मानति भूमि भूरि निज भागा।।
छाँह करहि घन बिबुधगन बरषहि सुमन सिहाहिं।
देखत गिरि बन बिहग मृग रामु चले मग जाहिं
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
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सीता लखन सहित रघुराई। गाँव निकट जब निकसहिं जाई।।
सुनि सब बाल बृद्ध नर नारी। चलहिं तुरत गृहकाजु बिसारी।।
राम लखन सिय रूप निहारी। पाइ नयनफलु होहि सुखारी।।
सजल बिलोचन पुलक सरीरा। सब भए मगन देखि दोउ बीरा।।
बरनि न जाइ दसा तिन्ह केरी। लहि जनु रंकन्ह सुरमनि ढेरी।।
एकन्ह एक बोलि सिख देही। लोचन लाहु लेहु छन एही।।
रामहि देखि एक अनुरागे। चितवत चले जाहिं सँग लागे।।
एक नयन मग छबि उर आनी। होहिं सिथिल तन मन बर बानी।।
एक देखि बट छांह भलि डासि मृदुल तृन पात।
कहहि गवांइअ छिनुकु श्रमु गवनब अबहि कि प्रात
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
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एक कलस भरि आनहि पानी। अचइअ नाथ कहहि मृदु बानी।।
सुनि प्रिय बचन प्रीति अति देखी। राम कृपाल सुसील बिसेषी।।
जानी श्रमित सीय मन माही। घरिक बिलंबु कीन्ह बट छाही।।
मुदित नारि नर देखहिं सोभा। रूप अनूप नयन मनु लोभा।।
एकटक सब सोहहिं चहु ओरा। रामचंद्र मुख चंद चकोरा।।
तरुन तमाल बरन तनु सोहा। देखत कोटि मदन मनु मोहा।।
दामिनि बरन लखन सुठि नीके। नख सिख सुभग भावते जी के।।
मुनिपट कटिन्ह कसे तूनीरा। सोहहिं कर कमलिनि धनु तीरा।।
जटा मुकुट सीसनि सुभग उर भुज नयन बिसाल।
सरद परब बिधु बदन बर लसत स्वेद कन जाल
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
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बरनि न जाइ मनोहर जोरी। सोभा बहुत थोरि मति मोरी।।
राम लखन सिय सुंदरताई। सब चितवहिं चित मन मति लाई।।
थके नारि नर प्रेम पिआसे। मनहु मृगी मृग देखि दिआ से।।
सीय समीप ग्रामतिय जाही। पूछत अति सनेह सकुचाही।।
बार बार सब लागहि पाए। कहहि बचन मृदु सरल सुभाए।।
राजकुमारि बिनय हम करहीं। तिय सुभाय कछु पूछत डरही।
स्वामिनि अबिनय छमबि हमारी। बिलगु न मानब जानि गंवारी।।
राजकुअँर दोउ सहज सलोने। इन्ह ते लही दुति मरकत सोने।।
स्यामल गौर किसोर बर सुंदर सुषमा ऐन।
सरद सर्बरीनाथ मुखु सरद सरोरुह नैन
मासपारायण, सोलहवा विश्राम
नवान्हपारायणचौथा विश्राम
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
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कोटि मनोज लजावनिहारे। सुमुखि कहहु को आहिं तुम्हारे।।
सुनि सनेहमय मंजुल बानी। सकुची सिय मन महु मुसुकानी।।
तिन्हहि बिलोकि बिलोकति धरनी। दुहु सकोच सकुचित बरबरनी।।
सकुचि सप्रेम बाल मृग नयनी। बोली मधुर बचन पिकबयनी।।
सहज सुभाय सुभग तन गोरे। नामु लखनु लघु देवर मोरे।।
बहुरि बदनु बिधु अंचल ढांकी। पिय तन चितइ भौंह करि बांकी।।
खंजन मंजु तिरीछे नयननि। निज पति कहेउ तिन्हहि सिय सयननि।।
भइ मुदित सब ग्रामबधूटी। रंकन्ह राय रासि जनु लूटी।।
अति सप्रेम सिय पाय परि बहुबिधि देहि असीस।
सदा सोहागिनि होहु तुम्ह जब लगि महि अहि सीस
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
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पारबती सम पतिप्रिय होहू। देबि न हम पर छाड़ब छोहू।।
पुनि पुनि बिनय करिअ कर जोरी। जौ एहि मारग फिरिअ बहोरी।।
दरसनु देब जानि निज दासी। लखी सीय सब प्रेम पिआसी।।
मधुर बचन कहि कहि परितोषीं। जनु कुमुदिनी कौमुदी पोषी।।
तबहि लखन रघुबर रुख जानी। पूछेउ मगु लोगन्हि मृदु बानी।।
सुनत नारि नर भए दुखारी। पुलकित गात बिलोचन बारी।।
मिटा मोदु मन भए मलीने। बिधि निधि दीन्ह लेत जनु छीने।।
समुझि करम गति धीरज कीन्हा। सोधि सुगम मगु तिन्ह कहि दीन्हा।।
लखन जानकी सहित तब गवनु कीन्ह रघुनाथ।
फेरे सब प्रिय बचन कहि लिए लाइ मन साथ
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
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फिरत नारि नर अति पछिताही। देअहि दोषु देहि मन माही।।
सहित बिषाद परसपर कहही। बिधि करतब उलटे सब अहही।।
निपट निरंकुस निठुर निसंकू। जेहिं ससि कीन्ह सरुज सकलंकू।।
रूख कलपतरु सागरु खारा। तेहिं पठए बन राजकुमारा।।
जौ पे इन्हहि दीन्ह बनबासू। कीन्ह बादि बिधि भोग बिलासू।।
ए बिचरहिं मग बिनु पदत्राना। रचे बादि बिधि बाहन नाना।।
ए महि परहिं डासि कुस पाता। सुभग सेज कत सृजत बिधाता।।
तरुबर बास इन्हहि बिधि दीन्हा। धवल धाम रचि रचि श्रमु कीन्हा।।
जौ ए मुनि पट धर जटिल सुंदर सुठि सुकुमार।
बिबिध भाँति भूषन बसन बादि किए करतार
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
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जौ ए कंद मूल फल खाही। बादि सुधादि असन जग माही।।
एक कहहिं ए सहज सुहाए। आपु प्रगट भए बिधि न बनाए।।
जहँ लगि बेद कही बिधि करनी। श्रवन नयन मन गोचर बरनी।।
देखहु खोजि भुअन दस चारी। कह अस पुरुष कहाँ असि नारी।।
इन्हहि देखि बिधि मनु अनुरागा। पटतर जोग बनावै लागा।।
कीन्ह बहुत श्रम ऐक न आए। तेहिं इरिषा बन आनि दुराए।।
एक कहहिं हम बहुत न जानहिं। आपुहि परम धन्य करि मानहिं।।
ते पुनि पुन्यपुंज हम लेखे। जे देखहिं देखिहहिं जिन्ह देखे।।
एहि बिधि कहि कहि बचन प्रिय लेहिं नयन भरि नीर।
किमि चलिहहि मारग अगम सुठि सुकुमार सरीर
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
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नारि सनेह बिकल बस होही। चकई साँझ समय जनु सोही।।
मृदु पद कमल कठिन मगु जानी। गहबरि हृदय कहहिं बर बानी।।
परसत मृदुल चरन अरुनारे। सकुचति महि जिमि हृदय हमारे।।
जौ जगदीस इन्हहि बनु दीन्हा। कस न सुमनमय मारगु कीन्हा।।
जौ मागा पाइअ बिधि पाही। ए रखिअहिं सखि आँखिन्ह माही।।
जे नर नारि न अवसर आए। तिन्ह सिय रामु न देखन पाए।।
सुनि सुरुप बूझहिं अकुलाई। अब लगि गए कहाँ लगि भाई।।
समरथ धाइ बिलोकहिं जाई। प्रमुदित फिरहिं जनमफल पाई।।
अबला बालक बृद्ध जन कर मीजहिं पछिताहि।।
होहि प्रेमबस लोग इमि रामु जहाँ जह जाहि
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
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गाँव गाँव अस होइ अनंदू। देखि भानुकुल कैरव चंदू।।
जे कछु समाचार सुनि पावहि। ते नृप रानिहि दोस लगावहि।।
कहहिं एक अति भल नरनाहू। दीन्ह हमहि जोइ लोचन लाहू।।
कहहि परस्पर लोग लोगाई। बातें सरल सनेह सुहाई।।
ते पितु मातु धन्य जिन्ह जाए। धन्य सो नगरु जहाँ ते आए।।
धन्य सो देसु सैलु बन गाऊ। जहँ जहँ जाहिं धन्य सोइ ठाऊ।।
सुख पायउ बिरंचि रचि तेही। ए जेहि के सब भाँति सनेही।।
राम लखन पथि कथा सुहाई। रही सकल मग कानन छाई।।
एहि बिधि रघुकुल कमल रबि मग लोगन्ह सुख देत।
जाहिं चले देखत बिपिन सिय सौमित्रि समेत
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
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आगे रामु लखनु बने पाछे। तापस बेष बिराजत काछे।।
उभय बीच सिय सोहति कैसे। ब्रह्म जीव बिच माया जैसे।।
बहुरि कहउ छबि जसि मन बसई। जनु मधु मदन मध्य रति लसई।।
उपमा बहुरि कहउ जिय जोही। जनु बुध बिधु बिच रोहिनि सोही।।
प्रभु पद रेख बीच बिच सीता। धरति चरन मग चलति सभीता।।
सीय राम पद अंक बराए। लखन चलहिं मगु दाहिन लाए।।
राम लखन सिय प्रीति सुहाई। बचन अगोचर किमि कहि जाई।।
खग मृग मगन देखि छबि होहीं। लिए चोरि चित राम बटोहीं।।
जिन्ह जिन्ह देखे पथिक प्रिय सिय समेत दोउ भाइ।
भव मगु अगमु अनंदु तेइ बिनु श्रम रहे सिराइ
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
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अजहु जासु उर सपनेहु काऊ। बसहु लखनु सिय रामु बटाऊ।।
राम धाम पथ पाइहि सोई। जो पथ पाव कबहु मुनि कोई।।
तब रघुबीर श्रमित सिय जानी। देखि निकट बटु सीतल पानी।।
तहँ बसि कंद मूल फल खाई। प्रात नहाइ चले रघुराई।।
देखत बन सर सैल सुहाए। बालमीकि आश्रम प्रभु आए।।
राम दीख मुनि बासु सुहावन। सुंदर गिरि काननु जलु पावन।।
सरनि सरोज बिटप बन फूले। गुंजत मंजु मधुप रस भूले।।
खग मृग बिपुल कोलाहल करहीं। बिरहित बैर मुदित मन चरहीं।।
सुचि सुंदर आश्रमु निरखि हरषे राजिवनेन।
सुनि रघुबर आगमनु मुनि आगें आयउ लेन
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
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मुनि कहु राम दंडवत कीन्हा। आसिरबादु बिप्रबर दीन्हा।।
देखि राम छबि नयन जुड़ाने। करि सनमानु आश्रमहिं आने।।
मुनिबर अतिथि प्रानप्रिय पाए। कंद मूल फल मधुर मगाए।।
सिय सौमित्रि राम फल खाए। तब मुनि आश्रम दिए सुहाए।।
बालमीकि मन आनंदु भारी। मंगल मूरति नयन निहारी।।
तब कर कमल जोरि रघुराई। बोले बचन श्रवन सुखदाई।।
तुम्ह त्रिकाल दरसी मुनिनाथा। बिस्व बदर जिमि तुम्हरे हाथा।।
अस कहि प्रभु सब कथा बखानी। जेहि जेहि भाँति दीन्ह बनु रानी।।
तात बचन पुनि मातु हित भाइ भरत अस राउ।
मो कहु दरस तुम्हार प्रभु सबु मम पुन्य प्रभाउ
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
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देखि पाय मुनिराय तुम्हारे। भए सुकृत सब सुफल हमारे।।
अब जह राउर आयसु होई। मुनि उदबेगु न पावै कोई।।
मुनि तापस जिन्ह ते दुखु लहहीं। ते नरेस बिनु पावक दहहीं।।
मंगल मूल बिप्र परितोषू। दहइ कोटि कुल भूसुर रोषू।।
अस जिय जानि कहिअ सोइ ठाऊ। सिय सौमित्रि सहित जहँ जाऊ।।
तहँ रचि रुचिर परन तृन साला। बासु करौ कछु काल कृपाला।।
सहज सरल सुनि रघुबर बानी। साधु साधु बोले मुनि ग्यानी।।
कस न कहहु अस रघुकुलकेतू। तुम्ह पालक संतत श्रुति सेतू।।
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
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श्रुति सेतु पालक राम तुम्ह जगदीस माया जानकी।
जो सृजति जगु पालति हरति रूख पाइ कृपानिधान की।।
जो सहससीसु अहीसु महिधरु लखनु सचराचर धनी।
सुर काज धरि नरराज तनु चले दलन खल निसिचर अनी।।
राम सरुप तुम्हार बचन अगोचर बुद्धिपर।
अबिगत अकथ अपार नेति नित निगम कह

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