शनिवार, मई 15, 2010

बालकाण्ड 7

tulasi das .. Ram Charit Manas..ramayan
story of the lord rama..king of ayodhya
by...rajeev kumar kulshrestha
सुनु मृदु गूढ़ रुचिर बर रचना। कृपासिंधु बोले मृदु बचना॥
जो कछु रुचि तुम्हरे मन माहीं। मैं सो दीन्ह सब संसय नाहीं॥
मातु बिबेक अलौकिक तोरे। कबहु न मिटिहि अनुग्रह मोरे ॥
बंदि चरन मनु कहेउ बहोरी। अवर एक बिनती प्रभु मोरी
सुत बिषइक तव पद रति होऊ। मोहि बड़ मूढ़ कहै किन कोऊ॥
मनि बिनु फनि जिमि जल बिनु मीना। मम जीवन तिमि तुम्हहि अधीना
अस बरु मागि चरन गहि रहेऊ। एवमस्तु करुनानिधि कहेऊ॥
अब तुम्ह मम अनुसासन मानी। बसहु जाइ सुरपति रजधानी॥
तहँ करि भोग बिसाल तात गए कछु काल पुनि।
होइहहु अवध भुआल तब मैं होब तुम्हार सुत॥
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
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इच्छामय नरबेष संवारे। होइहउ प्रगट निकेत तुम्हारे॥
अंसन्ह सहित देह धरि ताता। करिहउ चरित भगत सुखदाता
जे सुनि सादर नर बड़भागी। भव तरिहहिं ममता मद त्यागी॥
आदिसक्ति जेहिं जग उपजाया। सोउ अवतरिहि मोरि यह माया
पुरउब मैं अभिलाष तुम्हारा। सत्य सत्य पन सत्य हमारा॥
पुनि पुनि अस कहि कृपानिधाना। अंतरधान भए भगवाना
दंपति उर धरि भगत कृपाला। तेहि आश्रम निवसे कछु काला॥
समय पाइ तनु तजि अनयासा। जाइ कीन्ह अमरावति बासा
यह इतिहास पुनीत अति उमहि कही बृषकेतु।
भरद्वाज सुनु अपर पुनि राम जनम कर हेतु
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मासपारायणपाँचवा विश्राम
सुनु मुनि कथा पुनीत पुरानी। जो गिरिजा प्रति संभु बखानी॥
बिस्व बिदित एक कैकय देसू। सत्यकेतु तहँ बसइ नरेसू
धरम धुरंधर नीति निधाना। तेज प्रताप सील बलवाना॥
तेहि के भए जुगल सुत बीरा। सब गुन धाम महा रनधीरा
राज धनी जो जेठ सुत आही। नाम प्रतापभानु अस ताही॥
अपर सुतहि अरिमर्दन नामा। भुजबल अतुल अचल संग्रामा
भाइहि भाइहि परम समीती। सकल दोष छल बरजित प्रीती ॥
जेठे सुतहि राज नृप दीन्हा। हरि हित आपु गवन बन कीन्हा
जब प्रतापरबि भयउ नृप फिरी दोहाई देस।
प्रजा पाल अति बेदबिधि कतहु नहीं अघ लेस॥
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नृप हितकारक सचिव सयाना। नाम धरमरुचि सुक्र समाना॥
सचिव सयान बंधु बलबीरा। आपु प्रतापपुंज रनधीरा
सेन संग चतुरंग अपारा। अमित सुभट सब समर जुझारा॥
सेन बिलोकि राउ हरषाना। अरु बाजे गहगहे निसाना
बिजय हेतु कटकई बनाई। सुदिन साधि नृप चलेउ बजाई॥
जँह तहँ परी अनेक लराईं। जीते सकल भूप बरिआईं
सप्त दीप भुजबल बस कीन्हे। लै लै दंड छाड़ि नृप दीन्हें॥
सकल अवनि मंडल तेहि काला। एक प्रतापभानु महिपाला
स्वबस बिस्व करि बाहुबल निज पुर कीन्ह प्रबेसु।
अरथ धरम कामादि सुख सेवइ समयँ नरेसु॥
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भूप प्रतापभानु बल पाई। कामधेनु भै भूमि सुहाई॥
सब दुख बरजित प्रजा सुखारी। धरमसील सुंदर नर नारी
सचिव धरमरुचि हरि पद प्रीती। नृप हित हेतु सिखव नित नीती॥
गुर सुर संत पितर महिदेवा। करइ सदा नृप सब कै सेवा॥
भूप धरम जे बेद बखाने। सकल करइ सादर सुख माने॥
दिन प्रति देह बिबिध बिधि दाना। सुनहु सास्त्र बर बेद पुराना
नाना बापीं कूप तड़ागा। सुमन बाटिका सुंदर बागा॥
बिप्रभवन सुरभवन सुहाए। सब तीरथन्ह बिचित्र बनाए
जहँ लगि कहे पुरान श्रुति एक एक सब जाग।
बार सहस्र सहस्र नृप किए सहित अनुराग॥
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हृदय न कछु फल अनुसंधाना। भूप बिबेकी परम सुजाना॥
करइ जे धरम करम मन बानी। बासुदेव अर्पित नृप ग्यानी
चढ़ि बर बाजि बार एक राजा। मृगया कर सब साजि समाजा॥
बिंध्याचल गभीर बन गयऊ। मृग पुनीत बहु मारत भयऊ
फिरत बिपिन नृप दीख बराहू। जनु बन दुरेउ ससिहि ग्रसि राहू॥
बड़ बिधु नहि समात मुख माहीं। मनहु क्रोधबस उगिलत नाहीं
कोल कराल दसन छबि गाई। तनु बिसाल पीवर अधिकाई॥
घुरुघुरात हय आरौ पाए। चकित बिलोकत कान उठाए
नील महीधर सिखर सम देखि बिसाल बराहु।
चपरि चलेउ हय सुटुकि नृप हांकि न होइ निबाहु॥
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आवत देखि अधिक रव बाजी। चलेउ बराह मरुत गति भाजी॥
तुरत कीन्ह नृप सर संधाना। महि मिलि गयउ बिलोकत बाना
तकि तकि तीर महीस चलावा। करि छल सुअर सरीर बचावा॥
प्रगटत दुरत जाइ मृग भागा। रिस बस भूप चलेउ संग लागा
गयउ दूरि घन गहन बराहू। जहँ नाहिन गज बाजि निबाहू॥
अति अकेल बन बिपुल कलेसू। तदपि न मृग मग तजइ नरेसू
कोल बिलोकि भूप बड़ धीरा। भागि पैठ गिरिगुहा गभीरा॥
अगम देखि नृप अति पछिताई। फिरेउ महाबन परेउ भुलाई
खेद खिन्न छुद्धित तृषित राजा बाजि समेत।
खोजत ब्याकुल सरित सर जल बिनु भयउ अचेत॥
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फिरत बिपिन आश्रम एक देखा। तहँ बस नृपति कपट मुनिबेषा॥
जासु देस नृप लीन्ह छड़ाई। समर सेन तजि गयउ पराई
समय प्रतापभानु कर जानी। आपन अति असमय अनुमानी॥
गयउ न गृह मन बहुत गलानी। मिला न राजहि नृप अभिमानी
रिस उर मारि रंक जिमि राजा। बिपिन बसइ तापस कें साजा॥
तासु समीप गवन नृप कीन्हा। यह प्रतापरबि तेहि तब चीन्हा
राउ तृषित नहिं सो पहिचाना। देखि सुबेष महामुनि जाना॥
उतरि तुरग तें कीन्ह प्रनामा। परम चतुर न कहेउ निज नामा
भूपति तृषित बिलोकि तेहिं सरबरु दीन्ह देखाइ।
मज्जन पान समेत हय कीन्ह नृपति हरषाइ
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गै श्रम सकल सुखी नृप भयऊ। निज आश्रम तापस लै गयऊ॥
आसन दीन्ह अस्त रबि जानी। पुनि तापस बोलेउ मृदु बानी
को तुम्ह कस बन फिरहु अकेले। सुंदर जुबा जीव परहेले॥
चक्रबर्ति के लच्छन तोरे। देखत दया लागि अति मोरे॥
नाम प्रतापभानु अवनीसा। तासु सचिव मैं सुनहु मुनीसा॥
फिरत अहेरे परेउ भुलाई। बडे भाग देखउ पद आई
हम कहँ दुर्लभ दरस तुम्हारा। जानत हौं कछु भल होनिहारा॥
कह मुनि तात भयउ अंधियारा। जोजन सत्तर नगर तुम्हारा
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निसा घोर गम्भीर बन पंथ न सुनहु सुजान।
बसहु आजु अस जानि तुम्ह जाएहु होत बिहान॥
तुलसी जसि भवतब्यता तैसी मिलइ सहाइ।
आपुनु आवइ ताहि पहिं ताहि तहाँ लै जाइ॥
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भलेहिं नाथ आयसु धरि सीसा। बांधि तुरग तरु बैठ महीसा॥
नृप बहु भांति प्रसंसेउ ताही। चरन बंदि निज भाग्य सराही
पुनि बोले मृदु गिरा सुहाई। जानि पिता प्रभु करउ ढिठाई॥
मोहि मुनीस सुत सेवक जानी। नाथ नाम निज कहहु बखानी
तेहि न जान नृप नृपहि सो जाना। भूप सुहृद सो कपट सयाना॥
बैरी पुनि छत्री पुनि राजा। छल बल कीन्ह चहइ निज काजा
समुझि राजसुख दुखित अराती। अवां अनल इव सुलगइ छाती॥
सरल बचन नृप के सुनि काना। बयर संभारि हृदय हरषाना
कपट बोरि बानी मृदुल बोलेउ जुगुति समेत।
नाम हमार भिखारि अब निर्धन रहित निकेत॥
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कह नृप जे बिग्यान निधाना। तुम्ह सारिखे गलित अभिमाना॥
सदा रहहि अपनपौ दुराए। सब बिधि कुसल कुबेष बनाए॥
तेहि ते कहहि संत श्रुति टेरे। परम अकिंचन प्रिय हरि केरे॥
तुम्ह सम अधन भिखारि अगेहा। होत बिरंचि सिवहि संदेहा
जोसि सोसि तव चरन नमामी। मो पर कृपा करिअ अब स्वामी॥
सहज प्रीति भूपति कै देखी। आपु बिषय बिस्वास बिसेषी
सब प्रकार राजहि अपनाई। बोलेउ अधिक सनेह जनाई॥
सुनु सतिभाउ कहउ महिपाला। इहाँ बसत बीते बहु काला
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अब लगि मोहि न मिलेउ कोउ मैं न जनावउ काहु।
लोकमान्यता अनल सम कर तप कानन दाहु
तुलसी देखि सुबेषु भूलहिं मूढ़ न चतुर नर।
सुंदर केकिहि पेखु बचन सुधा सम असन अहि
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ताते गुपुत रहउ जग माहीं। हरि तजि किमपि प्रयोजन नाही॥
प्रभु जानत सब बिनहिं जनाए। कहहु कवनि सिधि लोक रिझाए
तुम्ह सुचि सुमति परम प्रिय मोरे। प्रीति प्रतीति मोहि पर तोरे॥
अब जौ तात दुरावउ तोही। दारुन दोष घटइ अति मोही
जिमि जिमि तापसु कथइ उदासा। तिमि तिमि नृपहि उपज बिस्वासा॥
देखा स्वबस कर्म मन बानी। तब बोला तापस बगध्यानी
नाम हमार एकतनु भाई। सुनि नृप बोलेउ पुनि सिरु नाई॥
कहहु नाम कर अरथ बखानी। मोहि सेवक अति आपन जानी
आदिसृष्टि उपजी जबहि तब उतपति भै मोरि।
नाम एकतनु हेतु तेहि देह न धरी बहोरि॥
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
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जनि आचरजु करहु मन माहीं। सुत तप ते दुर्लभ कछु नाहीं॥
तपबल ते जग सृजइ बिधाता। तपबल बिष्नु भए परित्राता॥
तपबल संभु करहिं संघारा। तप ते अगम न कछु संसारा॥
भयउ नृपहि सुनि अति अनुरागा। कथा पुरातन कहै सो लागा
करम धरम इतिहास अनेका। करइ निरूपन बिरति बिबेका॥
उदभव पालन प्रलय कहानी। कहेसि अमित आचरज बखानी
सुनि महीप तापस बस भयऊ। आपन नाम कहन तब लयऊ॥
कह तापस नृप जानउ तोही। कीन्हेहु कपट लाग भल मोही
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सुनु महीस असि नीति जहँ तहँ नाम न कहहिं नृप।
मोहि तोहि पर अति प्रीति सोइ चतुरता बिचारि तव
नाम तुम्हार प्रताप दिनेसा। सत्यकेतु तव पिता नरेसा॥
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गुर प्रसाद सब जानिअ राजा। कहिअ न आपन जानि अकाजा॥
देखि तात तव सहज सुधाई। प्रीति प्रतीति नीति निपुनाई॥
उपजि परी ममता मन मोरे। कहउ कथा निज पूछे तोरे
अब प्रसन्न मैं संसय नाहीं। मागु जो भूप भाव मन माहीं॥
सुनि सुबचन भूपति हरषाना। गहि पद बिनय कीन्हि बिधि नाना
कृपासिंधु मुनि दरसन तोरे। चारि पदारथ करतल मोरे॥
प्रभुहि तथापि प्रसन्न बिलोकी। मागि अगम बर होउ असोकी
जरा मरन दुख रहित तनु समर जितै जनि कोउ।
एकछत्र रिपुहीन महि राज कलप सत होउ॥
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कह तापस नृप ऐसेइ होऊ। कारन एक कठिन सुनु सोऊ॥
कालउ तुअ पद नाइहि सीसा। एक बिप्रकुल छाड़ि महीसा
तपबल बिप्र सदा बरिआरा। तिन्ह के कोप न कोउ रखवारा॥
जौ बिप्रन्ह बस करहु नरेसा। तौ तुअ बस बिधि बिष्नु महेसा
चल न ब्रह्मकुल सन बरिआई। सत्य कहउ दोउ भुजा उठाई॥
बिप्र श्राप बिनु सुनु महिपाला। तोर नास नहि कवनेहु काला
हरषेउ राउ बचन सुनि तासू। नाथ न होइ मोर अब नासू॥
तव प्रसाद प्रभु कृपानिधाना। मो कहु सर्ब काल कल्याना
एवमस्तु कहि कपटमुनि बोला कुटिल बहोरि।
मिलब हमार भुलाब निज कहहु त हमहि न खोरि
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
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ताते मैं तोहि बरजउ राजा। कहे कथा तव परम अकाजा॥
छठे श्रवन यह परत कहानी। नास तुम्हार सत्य मम बानी॥
यह प्रगटे अथवा द्विजश्रापा। नास तोर सुनु भानुप्रतापा॥
आन उपाय निधन तव नाहीं। जौ हरि हर कोपहि मन माहीं
सत्य नाथ पद गहि नृप भाषा। द्विज गुर कोप कहहु को राखा॥
राखइ गुर जौ कोप बिधाता। गुर बिरोध नहिं कोउ जग त्राता॥
जौ न चलब हम कहे तुम्हारे। होउ नास नहिं सोच हमारे॥
एकहि डर डरपत मन मोरा। प्रभु महिदेव श्राप अति घोरा॥
होहिं बिप्र बस कवन बिधि कहहु कृपा करि सोउ।
तुम्ह तजि दीनदयाल निज हितू न देखउ कोउ॥
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
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सुनु नृप बिबिध जतन जग माहीं। कष्टसाध्य पुनि होहिं कि नाहीं॥
अहइ एक अति सुगम उपाई। तहाँ परंतु एक कठिनाई
मम आधीन जुगुति नृप सोई। मोर जाब तव नगर न होई॥
आजु लगे अरु जब ते भयउ । काहू के गृह ग्राम न गयऊ
जौ न जाउ तव होइ अकाजू। बना आइ असमंजस आजू॥
सुनि महीस बोलेउ मृदु बानी। नाथ निगम असि नीति बखानी॥
बड़े सनेह लघुन्ह पर करहीं। गिरि निज सिरनि सदा तृन धरहीं॥
जलधि अगाध मौलि बह फेनू। संतत धरनि धरत सिर रेनू
अस कहि गहे नरेस पद स्वामी होहु कृपाल।
मोहि लागि दुख सहिअ प्रभु सज्जन दीनदयाल॥
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
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जानि नृपहि आपन आधीना। बोला तापस कपट प्रबीना॥
सत्य कहउ भूपति सुनु तोही। जग नाहिन दुर्लभ कछु मोही
अवसि काज मैं करिहउ तोरा। मन तन बचन भगत तै मोरा॥
जोग जुगुति तप मंत्र प्रभाऊ। फलइ तबहिं जब करिअ दुराऊ
जौ नरेस मैं करौं रसोई। तुम्ह परुसहु मोहि जान न कोई॥
अन्न सो जोइ जोइ भोजन करई। सोइ सोइ तव आयसु अनुसरई
पुनि तिन्ह के गृह जेवइ जोऊ। तव बस होइ भूप सुनु सोऊ॥
जाइ उपाय रचहु नृप एहू। संबत भरि संकलप करेहू
नित नूतन द्विज सहस सत बरेहु सहित परिवार।
मैं तुम्हरे संकलप लगि दिनहिं करिब जेवनार॥
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
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एहि बिधि भूप कष्ट अति थोरे। होइहहिं सकल बिप्र बस तोरे॥
करिहहिं बिप्र होम मख सेवा। तेहिं प्रसंग सहजेहिं बस देवा॥
और एक तोहि कहऊ लखाऊ। मैं एहि बेष न आउब काऊ॥
तुम्हरे उपरोहित कहु राया। हरि आनब मैं करि निज माया
तपबल तेहि करि आपु समाना। रखिहउ इहाँ बरष परबाना॥
मैं धरि तासु बेषु सुनु राजा। सब बिधि तोर सँवारब काजा
गै निसि बहुत सयन अब कीजे। मोहि तोहि भूप भेंट दिन तीजे॥
मैं तपबल तोहि तुरग समेता। पहुँचेहउ सोवतहि निकेता
मैं आउब सोइ बेषु धरि पहिचानेहु तब मोहि।
जब एकांत बोलाइ सब कथा सुनावौं तोहि॥
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
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सयन कीन्ह नृप आयसु मानी। आसन जाइ बैठ छलग्यानी॥
श्रमित भूप निद्रा अति आई। सो किमि सोव सोच अधिकाई
कालकेतु निसिचर तहँ आवा। जेहिं सूकर होइ नृपहि भुलावा॥
परम मित्र तापस नृप केरा। जानइ सो अति कपट घनेरा॥
तेहि के सत सुत अरु दस भाई। खल अति अजय देव दुखदाई॥
प्रथमहि भूप समर सब मारे। बिप्र संत सुर देखि दुखारे
तेहिं खल पाछिल बयरु सँभारा। तापस नृप मिलि मंत्र बिचारा॥
जेहि रिपु छय सोइ रचेन्हि उपाऊ। भावी बस न जान कछु राऊ
रिपु तेजसी अकेल अपि लघु करि गनिअ न ताहु।
अजहु देत दुख रबि ससिहि सिर अवसेषित राहु॥
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
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तापस नृप निज सखहि निहारी। हरषि मिलेउ उठि भयउ सुखारी॥
मित्रहि कहि सब कथा सुनाई। जातुधान बोला सुख पाई
अब साधेउ रिपु सुनहु नरेसा। जौ तुम्ह कीन्ह मोर उपदेसा॥
परिहरि सोच रहहु तुम्ह सोई। बिनु औषध बिआधि बिधि खोई
कुल समेत रिपु मूल बहाई। चौथे दिवस मिलब मैं आई॥
तापस नृपहि बहुत परितोषी। चला महाकपटी अतिरोषी
भानुप्रतापहि बाजि समेता। पहुँचाएसि छन माझ निकेता॥
नृपहि नारि पहिं सयन कराई। हयगृह बांधेसि बाजि बनाई
राजा के उपरोहितहि हरि लै गयउ बहोरि।
लै राखेसि गिरि खोह महु माया करि मति भोरि
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
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आपु बिरचि उपरोहित रूपा। परेउ जाइ तेहि सेज अनूपा॥
जागेउ नृप अनभए बिहाना। देखि भवन अति अचरजु माना
मुनि महिमा मन महु अनुमानी। उठेउ गवहि जेहि जान न रानी॥
कानन गयउ बाजि चढ़ि तेही। पुर नर नारि न जानेउ केही
गए जाम जुग भूपति आवा। घर घर उत्सव बाज बधावा॥
उपरोहितहि देख जब राजा। चकित बिलोकि सुमिरि सोइ काजा
जुग सम नृपहि गए दिन तीनी। कपटी मुनि पद रह मति लीनी॥
समय जानि उपरोहित आवा। नृपहि मते सब कहि समुझावा
नृप हरषेउ पहिचानि गुरु भ्रम बस रहा न चेत।
बरे तुरत सत सहस बर बिप्र कुटुंब समेत
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
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उपरोहित जेवनार बनाई। छरस चारि बिधि जसि श्रुति गाई॥
मायामय तेहिं कीन्ह रसोई। बिंजन बहु गनि सकइ न कोई
बिबिध मृगन्ह कर आमिष रांधा। तेहि महु बिप्र मांसु खल सांधा॥
भोजन कहु सब बिप्र बोलाए। पद पखारि सादर बैठाए
परुसन जबहिं लाग महिपाला। भै अकासबानी तेहि काला॥
बिप्रबृंद उठि उठि गृह जाहू। है बड़ि हानि अन्न जनि खाहू
भयउ रसोई भूसुर मांसू। सब द्विज उठे मानि बिस्वासू॥
भूप बिकल मति मोह भुलानी। भावी बस न आव मुख बानी
बोले बिप्र सकोप तब नहिं कछु कीन्ह बिचार।
जाइ निसाचर होहु नृप मूढ़ सहित परिवार
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
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छत्रबंधु तैं बिप्र बोलाई। घाले लिए सहित समुदाई॥
ईस्वर राखा धरम हमारा। जैहसि तैं समेत परिवारा
संबत मध्य नास तव होऊ। जलदाता न रहिहि कुल कोऊ॥
नृप सुनि श्राप बिकल अति त्रासा। भै बहोरि बर गिरा अकासा
बिप्रहु श्राप बिचारि न दीन्हा। नहिं अपराध भूप कछु कीन्हा॥
चकित बिप्र सब सुनि नभबानी। भूप गयउ जहँ भोजन खानी
तहँ न असन नहिं बिप्र सुआरा। फिरेउ राउ मन सोच अपारा॥
सब प्रसंग महिसुरन्ह सुनाई। त्रसित परेउ अवनीं अकुलाई
भूपति भावी मिटइ नहिं जदपि न दूषन तोर।
किए अन्यथा होइ नहिं बिप्रश्राप अति घोर
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
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अस कहि सब महिदेव सिधाए। समाचार पुरलोगन्ह पाए॥
सोचहिं दूषन दैवहि देहीं। बिरचत हंस काग किय जेहीं
उपरोहितहि भवन पहुँचाई। असुर तापसहि खबरि जनाई॥
तेहिं खल जहँ तहँ पत्र पठाए। सजि सजि सेन भूप सब धाए
घेरेन्हि नगर निसान बजाई। बिबिध भाँति नित होइ लराई॥
जूझे सकल सुभट करि करनी। बंधु समेत परेउ नृप धरनी
सत्यकेतु कुल कोउ नहिं बांचा। बिप्रश्राप किमि होइ असांचा॥
रिपु जिति सब नृप नगर बसाई। निज पुर गवने जय जसु पाई
भरद्वाज सुनु जाहि जब होइ बिधाता बाम।
धूरि मेरुसम जनक जम ताहि ब्यालसम दाम
राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ
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काल पाइ मुनि सुनु सोइ राजा। भयउ निसाचर सहित समाजा॥
दस सिर ताहि बीस भुजदंडा। रावन नाम बीर बरिबंडा
भूप अनुज अरिमर्दन नामा। भयउ सो कुंभकरन बलधामा॥
सचिव जो रहा धरमरुचि जासू। भयउ बिमात्र बंधु लघु तासू
नाम बिभीषन जेहि जग जाना। बिष्नुभगत बिग्यान निधाना॥
रहे जे सुत सेवक नृप केरे। भए निसाचर घोर घनेरे
कामरूप खल जिनस अनेका। कुटिल भयंकर बिगत बिबेका॥
कृपा रहित हिंसक सब पापी। बरनि न जाहिं बिस्व परितापी
उपजे जदपि पुलस्त्यकुल पावन अमल अनूप।
तदपि महीसुर श्राप बस भए सकल अघरूप

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